कश्मीर 5ः इतनी प्यारी मेहमाननवाजी मैंने जिंदगी में कहीं नहीं देखी

(ये इस यात्रा का पांचवा भाग है, पहले हिस्से यहां पढ़ें)

बारामूला में मैं अपनी एक दोस्त के पास ही जा रही थी। उनसे मेरी जान-पहचान ट्रिप के पहले ही हुई थी, हालांकि अब हम अच्छे दोस्त हैं। मेरी दोस्त लगातार फोन के जरिए मेरे संपर्क थी कि हम कहां पहुंचे? वर्कशॉप में हिस्सा लेने की वजह से हम थोड़ा लेट हो चुके थे और वो हमें लेने के लिए सूमो स्टैंड पहुंच चुकी थी। बारामूला जाने के दौरान रास्ते में पहाड़, धान के खेत, बड़े-बड़े चीड़ के पेड़, खेतों में काम करते लोग, सब कुछ बेहद सामान्य सा लग रहा था।

कश्मीर में धान की कटाई हो चुकी थी। बिहार की तरह ही यहां भी लोग चावल ज्यादा खाते हैं। हमारे यहां चावल को भात कहते हैं, कश्मीर में लोग इसे ‘भाता’ कहते हैं। डेढ़ बजे के आस-पास हम बारामूला पहुंच गए थे। वहां पर मेरी दोस्त हमें लेने के लिए पहले से मौजूद थी। मिलते ही गले लगाकर पहले तो उन्होंने गालों को चूमा फिर हमें साथ लेकर अपने ननिहाल पहुंची।

खातिदरदारी का दौर

उनका ननिहाल मेन मार्केट में था इसलिए वो हमें यहां रखना चाहती थीं। ननिहाल पहुंचते ही सबसे पहले हमारा स्वागत वहां मौजूद 6-7 बच्चों ने किया। सब मिलकर हमें एक बड़े से गेस्ट रूम में ले गए। बेहद ही तरीके से सजा हुआ रूम था, जहां पर्दे, कालीन, दीवार फोटोफ्रेम के रूप में टंगे कुछ ऊर्दू शब्द। तीन दिन में मुझे समझ आ गया था कि कश्मीर का हर घर कालीन, पर्दा से सजा होता है। कालीन के पीछे की वजह शायद वहां पड़ने वाली ठंड है।

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थोड़ी ही देर में हमारे सामने जूस, मेवा और चिप्स की ट्रे के साथ घर की एक सदस्य आती हैं। बेहद प्यार से गले मिलकर गालों को चूमती हैं (ये एक शानदार रिवाज है)। एक-एक करके घर के सभी सदस्य हमसे मिलने आ रहे थे। मेल-मिलाप के दौरान घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य की रूम में एंट्री होती है। उनके साथ होते हैं उनके बड़े बेटे। उन्होंने हमसे हमारा नाम पूछने के बाद कहा आप हिंदू हो? हमारा जवाब था, जी। तभी बुजुर्ग सदस्य ने कहा कि हमें हिंदुओं से बेहद प्यार है।

फिर शुरू हुआ हमारे खातिरदारी का दौर, जिसके लिए हम पिछले दो दिन से तरस रहे थे। बेहद प्यार से हमारे सामने दस्तरखान (हमारे यहां डाइनिंग टेबल क्लॉथ कहते होंगे) बिछाया गया। उसमें भी कश्मीरियत की झलक थी। दस्तरखान बिछाने के बाद घर की एक छोटी सदस्य एक छोटा सा टब और मग में पानी लेकर आती है, हमारे हाथ धुलाती है। इन सारी चीजों को मैं बेहद हैरानी से देख रही थी क्योंकि ऐसी मेहमाननवाजी मैंने पहली बार देखी थी।

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हाथ धोने के बाद हमारे सामने नॉनवेज और वेज की अलग-अलग डिश परोसी गई। जिसमें अलग तरह का ऑमलेट, वाजवान की दो डिश, डोसा से मिलती-जुलती कोई रोटी, पनीर, काबुली चने की सब्जी और भाता (चावल) था। हमारे यहां खाने में दाल के लिए अलग कटोरी, सब्जी के लिए अलग सा छोटा प्लेट होता है। यहां पर वैसा कुछ नहीं है। यहां पर एक छोटा सा प्लेट होता है जो गोल और थोड़ा गहरा होता है। लेकिन आपके सामने जो डिश लाई जाती है वो अलग-अलग बर्तन (डिनर सेट जैसा कुछ)में होता है। आप उनमें से निकाल कर अपने प्लेट मे रख सकते हैं।

खाना खाने के बाद फिर से हमारा हाथ टब में धुलाया गया और हाथ पोंछने के लिए तौलिया दिया गया। उसके बाद मेरी दोस्त हमें लेकर उरी दिखाने निकल पड़ी। उन्होंने अपनी गाड़ी से हमें उरी का पूरा इलाका दिखाया, झेलम नदी को दिखाया। उस दौरान हमने कुछ ऐसी जगह भी देखीं जो फेमस तो नहीं है लेकिन बेहद खूबसूरत हैं। शाम में लौटते वक्त हमें वहां के एक कैफे में गए। कैफे ओनर मेरी दोस्त का दोस्त था। वहां भी हमारी मेहमान-नवाजी चलती रही।

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(आगे की यात्रा के बारे में यहां पढ़ें)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।


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