कश्मीर 4ः बारामूला में सेब के बागीचे में जन्नत ने अपने होने का एहसास कराया

(ये इस यात्रा का चौथा भाग है, इससे पहले का विवरण यहां पढ़ें)

श्रीनगर में दो दिन बिताने के दौरान, हर दो कदम बाद जवानों को भारी-भरकम हथियार और गेट अप के साथ देखकर हर बार हमारे दिमाग में एक अजीब सा सवाल आता। इन्हें कैसा लगता होगा एक ऐसी जगह पर खड़े होकर दिन-रात बिताना, जहां कोई इन्हें पसंद नहीं करता। मतलब मैं वैसी जगह पागल हो जाऊंगी, जहां मुझे कोई पसंद नहीं करता और वहां रहना पड़े। आप 24 घंटे वहां पर सुरक्षा दे रहे हो, जहां कोई आपको पसंद नहीं करता। जहां लोगों को आपकी मौजूदगी नहीं चाहिए। खैर कश्मीर में रहने पर आप हर पहलू पर सोचने के लिए मजबूर होते हैं।

मार्केट घूमने के बाद फिर से फैज हमें लेने आए और हम सब साथ में विंटरफेल कैफे (गेम्स ऑफ थ्रोन्स की थीम पर बना कैफे) गए। वहां पर हमें एक युवा नेता मिले जो इस बार के पंचायत चुनाव में निर्दलीय खड़े थे (अब वो जीत चुके हैं)। उनसे हमारी कश्मीर के मुद्दे पर लंबी बात हुई। बहुत सारी जगह हम एक-दूसरे से सहमत-असहमत हुए लेकिन चर्चा का निष्कर्ष यही निकला कि हथियार कभी भी समस्या का हल नहीं हो सकता है, चाहे वो इधर से हो या उधर से।

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फिर हम सबने एक ढाबे में खाना खाया और दोस्तों ने हमें जॉस्टल ड्रॉप किया। हां इस दो दिन में मैं और मेरी दोस्त ये शिकायत करते रहे कि हमें कश्मीरी खाना खाना है। अभी तक हम वही खा रहे थे जो दिल्ली में खाते हैं।

अगला पड़ाव- बारामूला

हम दोनों जॉस्टल पहुंचे और सारा सामान पैक किया, जॉस्टल का हिसाब किया क्योंकि हमें सुबह नार्थ कश्मीर के लिए निकलना था। तीसरे दिन की सुबह फैज हमें लेने आ गए हमने जॉस्टल में सबको बाय बोला और बारामूला के लिए निकल गए। श्रीनगर से बारामूला हमें फैज और गुलजार के साथ जाना था। वो दोनों एक वर्कशॉप के लिए पाटन जा रहे थे। वहां तक हम इनके साथ थे उसके बाद पाटन से बारामूला तक का सफर हमें खुद पूरा करना था।

पाटन पहुंचने पर गुलजार ने हमें अपने वर्कशॉप का हिस्सा बनाया। वहां मौजूद लड़के-लड़कियों से हमारा परिचय कराया। मैं यहां बताना चाहूंगी कि गुलजार जैसे बहुत से पढ़े-लिखे युवा हैं, जो ग्राउंड पर वहां के यूथ के लिए काम कर रहे हैं। अलग-अलग एनजीओ के साथ जुड़कर कश्मीर के यूथ को जागरूक कर रहे हैं। सवाल-जवाब के दौरान वर्कशॉप में मौजूद बच्चों ने हमसें ये पूछा कि कश्मीर कैसा लगा? उनके सवालों के जवाब देकर हम बारामूला के लिए निकल गए।

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हमें बारामूला पहुंचाने की जिम्मेदारी बिलाल ने ली। बिलाल एक कैब ड्राइवर है। गाड़ी में बैठने के बाद हमने कश्मीर के हालात पर थोड़ी बातचीत शुरू की। बातचीत के दौरान बिलाल कहते हैं, ‘हमें इंडियन आर्मी परेशान नहीं करती। हम तो सबसे ज्यादा जम्मू-कश्मीर पुलिस से परेशान हैं। ये लोग हमारे साथ छोटी-छोटी बात पर बदतमीजी करते हैं। सच बोलूं तो अगर इंडियन आर्मी से कोई मरता है तो हमें दुख होता है। लेकिन जम्मू-कश्मीर पुलिस से कोई मरता है तो हम खुश होते हैं।’ उसकी बातें सुन कर मैं और मेरी दोस्त चुप थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि यहां चल क्या रहा है?

सेब का बगीचा

रास्ते में हमें एक सेब का बगीचा दिख गया। बिलाल ने हमारी उत्सुकता को देखते हुए गाड़ी रोक दी और कहा, आप उतरकर फोटो खींच लो। हम दोनों गाड़ी से उतरे और फोटो खींचने लगे। तभी बगीचे के मालिक भी आ जाते हैं। उन्होंने हमारे साथ फोटो खिंचाने की इच्छा जाहिर की। फोटो लेने के बाद हमने उन्हें अलविदा कहा। लेकिन जाने से पहले वो मेरा हाथ पकड़कर दूसरी तरफ के बगीचे में ले गए। हमारा बैग मांगा और वो उसमें सेब भरने लगे।

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सेब का बगीचा और वो सेल्फी।

हम दोनों के बैग में जगह नहीं थी, फिर भी उन्होंने उसमें हर जगह से कोशिश करके सेब रखे। उनकी तरफ से मिल रहे प्यार को देखकर हम दोनों खुशी से एक-दूसरे की तरफ मुड़े और साथ में कहा यार इतनी खूबसूरत जगह को क्या बना दिया गया है? अलविदा कहने के बाद बिलाल ने हमें बारामुला हाइवे पर दूसरी कैब में बिठाया। बिलाल ने अपना नंबर हमें दिया कि अगर रास्ते में कोई दिक्कत हो तो उसे कॉल कर लें।

(इससे भी आगे की यात्रा यहां पढ़ें)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।

 


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