पैसेंजर ट्रेन में पहली बार यात्रा करने के बाद भारत के बारे में मेरी समझ और बढ़ गई है

वाराणसी से अब विदा लेने का समय आ गया था। जाते वक्त बार-बार पलट कर हमारी नजरें गंगा घाटों पर ही लगी हुई थी। किसी शहर से इतना जुड़ाव मैंने पहली बार महसूस किया था। जाने का मन ही नहीं कर रहा था। किसी तरह मैंने दिल को समझाते हुए स्टेशन की तरफ रुख किया। ट्रेन का सफर हमेशा से मुझे बस और फ्लाइट से ज्यादा पसंद है। पहली बार मैं लोकल ट्रेन में सफर करने जा रही थी। काउंटर पर पहुंच कर टिकट लिया। काउंटर से कुछ ही दूर गई थी कि मैने टिकट को ध्यान से देखा। उसमें ट्रेन का नाम और नंबर लिखा ही नहीं था। मैं डर गई। ये कैसा टिकट है। ट्रेन का टाइम भी हो रहा था।

मैं काउंटर पर दोबारा भाग कर गई और ट्रेन के बारे में पूछने लगी। वो मुझसे बार-बार यही कह रही थी कि प्लेटफार्म में जा कर पता चलेगा। मैंने सोचा, क्या पागल लोग हैं, बिना ट्रेन के बारे में पता किए कैसे पहुंचेंगे। फिर हम दूसरे काउंटर पर गए तो पता चला, लोकल ट्रेन की ऐसी ही टिकट होती है। ये टिकट सब ट्रेनों के लोकल डब्बे में चलती है। अब अपनी बेवकूफी पर बड़ी हंसी आई। मैं 26 साल की हो गई हूं और मुझे लोकल ट्रेन के बारे में कुछ पता नहीं था। पर कोई नहीं अब टाइम था इसके बारे में जानने का।

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चार लोगों के लिए बनी सीट पर बैठे 8 लोग

बीस की जगह पर 80 लोगों का जमावड़ा

प्लेटफार्म पर खचाखच भीड़ थी। लोग ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। अमृतसर मेल आने वाली थी। ट्रेन आते ही लोग डिब्बों पर चढ़ने के लिए दौड़ने लगे। तभी हमारी नजर लेडीज डिब्बे पर पड़ी। हमने देखा डिब्बा बहुत ही छोटा था। जिसमें दो कॉलम थे सिर्फ 20 लोगों के लिए। हमें किसी तरह दो सीटें मिल गईं। डिब्बे में 2-4 पुरुष भी थे जो डिब्बे से उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ट्रेन में जरा सी भी खाली हर जगह पर लोग बैठने के लिए कोशिश कर रहे थे।

इस डिब्बे में लोगों से ज्यादा तो लोगों का सामान था। पैर रखने की जगह तक नहीं थी। सीटों से लेकर फर्श पर लोग बैठे हुए थे। स्टेशन आने पर भीड़ बढ़ती जाती थी। कुछ ही देर में 20 लोगों वाले डिब्बे में 80 लोग थे। ऊपर से हर इंसान के पास 5-7 बड़े बड़े बैग थे जैसे हमेशा के लिए दूसरे शहर में शिफ्ट हो रहे हों।

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चलता फिरता चांदनी चौक

जब हम पर बरसी चांदनी

लोगों का सब्र हर स्टेशन के बाद कम होता जा रहा था। हर नए पैसेंजर के साथ लोग लड़ने पर उतर आते थे। वो भी क्या करते, नए लोगों के लिए जगह ही नहीं थी और लोग आते ही जा रहे थे। हमारे बगल में एक औरत थी जिसके तीन बच्चे थे। बच्चों में काफी कम अंतर था। एक तो 4 महीने का ही था। पता नहीं क्यों लोग इतने छोटे बच्चों के साथ सफर करते हैं। पूरे रास्ते बच्चे रोते ही रहे। मां की सेहत भी बहुत अच्छी नहीं थी। एक बच्चे ने तो मेरी दोस्त पर सूसू कर दिया। लोगों की बदबू, बच्चों का रोना और लोगों के झगड़े के बीच सफर कट रहा था। तभी एक चमचमाती हुई साड़ी पहने एक महिला आईं। उनको देख कर तो ऐसा ही लग रहा था कि चांदनी चौक खुद चल कर आ रहा हो। तपाक से वो हमारी सीट के ऊपर बनी जगह पर बैठ गई। हर बार उनके हिलने पर उनके साड़ी की कुछ चांदनी हमारे ऊपर गिर जाती थी। वैसे ही सफर इतना तकलीफदेह था ऊपर से ये साड़ी।छः घंटे का सफर तय कर के हम लखनऊ पहुंचे। हमेशा के लिए कसम खाई कि कभी लेडीज डिब्बे में सफर नहीं करूंगी। यहां लोग कम और सामान ज्यादा होता है। ऊपर से लोग उतरने के टाइम जगह भी नहीं देते थे। मेरी पहली लोकल ट्रेन का सफर मुझे हमेशा याद रहेगा। मैं तो छः घंटों में परेशान हो गई पता नहीं  लोग कैसे 14-16 घंटों का सफर इसमें तय करते हैं। मजबूरी है उनकी, रेलवे के टिकट इतने मंहगे हैं कि उन्हें स्लीपर से कई गुना कम दाम में लोकल डिब्बे का टिकट लेना पड़ता है। मैं तो दिन ही दिन में ट्रेन से निकल गई, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जिस डिब्बे में बैठने तक की जगह नहीं उसमें लोग रात कैसे गुजारेंगे। लोकल डिब्बे में सफर करके जनसंख्या विस्फोट का असली मतलब समझ आता है।

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2 thoughts on “पैसेंजर ट्रेन में पहली बार यात्रा करने के बाद भारत के बारे में मेरी समझ और बढ़ गई है”

  1. Comment: मोनिका जी अफसोस है कि आपने कम घंटे का ही सफर किया ा थोड़ा और एडवेंचरस रहतीं , तो आपको पूर्ण अनुभव होता ा एक सुझाव है एक दो अन्य साथियों के साथ में सफर कीजिए ा पैसेंजर ट्रेन का यही लुत्फ होता है ा प्रत्येक स्टेशन पर रुकते हुए वहां के चाय पकौड़ी का मजा उठाएं ा

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    • बहुत शुक्रिया. अगली बार पक्का करेंगे. और अनुभव साझा करेंगे.

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