वैशाली का गणतंत्र: दुनिया के सबसे पुरानी संसद भारत में ही थी

वैशाली के लोकतंत्र में किसी विषय पर मतदान के वक़्त व्हिप जारी नहीं होता था। हर कोई अपने विवेक के अनुसार मतदान कर सकता था। हर किसी को मतदान से पहले अपनी राय रखने का अवसर दिया जाता था।

हालांकि जो सदस्य अपनी राय से उलट मतदान करते थे, उनका मत रद्द भी कर दिया जाता था। छोटे से लिच्छवी राज में 7707 सदस्य विचार, बहस और मतदान में भाग लेते थे, सभी राजा कहे जाते थे। इन राजाओं का चुनाव उनके क्षेत्र में अमूमन सर्वसम्मति से होता था।

बुद्ध इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने कहा था कि जब तक लिच्छवी गणतंत्र बुजुर्गों और ज्ञानियों का सम्मान करता रहेगा, इसका अस्तित्व कायम रहेगा।

राजा विशाल के गढ़ के पास ही, पीछे जो संरचना दिख रही है, वही विश्व के सबसे पुराने परिषद(संसद) की बैठक है

वैशाली, जो अपने जमाने के सबसे सम्पन्न नगरों में से एक था, का वैभव एक ऐसे राजकुमार नाभाग की वजह से था जिसने एक वैश्य स्त्री के प्रेम में राज सत्ता को छोड़ कर कृषक का पेशा अपना लिया था। कहते हैं उसी वैश्य स्त्री की वजह से वैशाली का नाम पड़ा। यह पहले वैश्याली था, जो वैशाली हो गया। उसके पुत्र ने राज तंत्र को गणतंत्र में बदला। बाद में इसी वंश में राजा विशाल भी हुए।

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लिच्छवी गणतंत्र का पतन एक विजातीय प्रेम को अस्वीकार करने की वजह से हुआ। लिच्छवियों ने मगध के शासक बिम्बिसार के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने से सिर्फ इसलिये इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें छोटी जाति का माना जाता था। बिम्बिसार ने तो जबरन अपनी प्रेमिका से विवाह कर ही लिया और उसके पुत्र, लिच्छवियों के नाती अजातशत्रु ने छल से वैशाली का राज हड़प लिया। दुनिया के पहले गणतंत्र का इस तरह पतन हो गया।


ये रोचक बातें हमें लिख भेजी हैं पुष्यमित्र ने। पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। फैंसी, ग्लॉसी टाइप की मीडियागिरी से परे पुष्यमित्र जमीनी मुद्दों को बारहा उठाते रहते हैं, तफ्सील से लोगों को बताते रहते हैं। इनकी किताबें ‘नील का दाग मिटा: चम्पारण 1917’ और ‘रेडियो कोसी’ भी खासी चर्चित हैं। इन सब के अलावा पुष्य प्रेम, कविता, उत्सव के बारे में भी खूब बतियाते हैं।


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