Uttarakhand Musical Instrument: ढोल-दमाऊ

हर राज्य की अपनी संस्कृति होती है जिसमें शामिल होता है उनका खान-पान, पहनावा, गीत, नृत्य और भोजन। इसी संस्कृति में गीत-संगीत को धुन देने वाल musical instrument भी शामिल होते है। जिस तरह हर राज्य के अपने लोक गीतों में अपने folk musical instrument का बड़ा महत्व होता है। ठीक उसी तरह देवभूमि Uttarakhand Musical Instrument में ‘ढोल- दमाऊ’ का बड़ा महत्व है।

ढोल- दमाऊ एक ऐसा musical instrument है जो उत्तराखंड के लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है। कहते हैं कि ढोल- दमाऊ की विभिन्न तालें सांकेतिक वार्तलाप करती है और इन्ही तालों को ‘ढोल सागर’ भी कहा जाता है। ढोल- दमाऊ बजाने वाले कलाकारों को ‘औजी‘ नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यता यह भी है कि ढोल- दमाऊ का उपयोग युद्ध क्षेत्र में योध्दाओं का उत्साहवर्धन करने के लिए किया जाता था और वहीं से धीरे – धीरे इनका प्रयोग सांस्कृतिक गतिविधियों में भी किया जाने लगा।

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Uttarakhand musical instrument: Dhol-Damau
Uttarakhand musical instrument: Dhol-Damau

Uttarakhand Musical Instrument की तालें

ढोल सागर में लगभग 1200 श्लोक का वर्णन माना जाता है। इन्ही तालों के माध्यम से औजी अपने संदेशों का आदान – प्रदान भी किया करते हैं। अलग- अलग अवसर के लिए निर्धारित तालों का इस्तेमाल किया जाता है। जिनको सुनते ही यह पता लग जाता है कि कौन सा संस्कार चल रहा है।

Uttarakhand Musical Instrument का इतिहास में वर्णन

इतिहासकारों का मनना है कि ढोल- दमाऊ पश्चिमी एशियाई मूल से 15 वीं शताब्दी में भारत लाया गया और 16 वीं शताब्दी से इसका उपयोग उत्तराखंड में किया जाने लगा। ढोल – दमाऊ का उल्लेख किसी भी प्राचीन संगीत पुस्तकों में नहीं मिलता, केवल 1800 वीं सदी रचित ‘संगीतसार’ में ढोल- दमाऊ का पहली बार वर्णन हुआ है। इससे पहले आईने अकबरी में ही इसका वर्णन मिलता है।

Utarakhand Musical Instrument का पौराणिक महत्व

देवभूमि उत्तराखंड में ढोल- दमाऊ की दैवीय मान्यता काफि प्रचलित है। कहते हैं कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में देवी- देवताओं के आवाहन के लिए ‘मांगल बधाई ताल’ बजाई जाती है। दंतकथाओं के अनुसार ढोल – दमाऊ की उत्पत्ति भगवान शिव के डमरू से हुई है। जिसे भगवान शिव ने सर्वप्रथम माता पार्वती को सुनाया था।

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सांस्कृतिक विरासत होने के बाद भी ढोल – दमाऊ का प्रचलन अब केवल गांव में ही रह गया है। शहरों में आधुनिकीकरण के चलते लोगों ने ‘डी.जे.’ को महत्व देना शुरू कर दिया है। जिसके चलते औजीयों का रोजगार का एकलौता साधन अब खत्म होता जा रहा है। विलुप्त होती इस कला ने न सिर्फ संस्कृति को खतरे में डाला है बल्कि कलाकारों की आजीविका को भी खत्म कर दिया है।

लेकिन इन सब से परे अब भी कुछ ऐसे युवा हैं जो इस संस्कृति की संरक्षणा के लिए बहुत से प्रयास कर रहे हैं। और इनका प्रचार भी कर रहें हैं।


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