उदयपुर: राजपूती आन-बान-शान देखना चाहते हैं तो जरूर आएं

उदयपुर | राजस्थान में घुमक्कड़ी के दौरान एक सुबह हम एक जीप में सवार होकर उदयपुर की ओर चल पड़े। बस दिन में ही उदयपुर के कुछ आकर्षणों की सैर करनी थी। जीप से उतरते ही हमने उदयपुर भ्रमण के लिये एक ऑटो वाले से बात की तो उसने बताया कि 500 रुपए में मुख्य सात आठ प्वाइंट घुमाएगा जिसमें करीब पांच घंटे का समय लगेगा। थोड़े मोलभाव के बाद सौदा 400 रुपए में तय हुआ।

इतिहास के पन्नों में उदयपुर

महाराणा उदयसिंह ने सन् 1559 ई. में उदयपुर नगर की स्थापना की। लगातार मुगलों के आक्रमणों से सुरक्षित स्थान पर राजधानी स्थानान्तरित किये जाने की योजना से इस नगर की स्थापना हुई। उदयपुर शहर राजस्थान में स्थित है। यहां का किला अन्य इतिहास को समेटे हुये है। इसके संस्थापक बप्पा रावल थे, जो कि सिसोदिया राजवंश के थे। आठवीं शताब्दी में सिसोदिया राजपूतों ने उदयपुर (मेवाड़) रियासत की स्थापना की थी।

उदयपुर मेवाड़ के महाराणा प्रताप के पिता सूर्यवंशी नरेश महाराणा उदयसिंह के द्वारा 16वीं सदी में बसाया गया था। मेवाड़ की प्राचीन राजधानी चित्तौड़गढ़ थी। मेवाड़ के नरेशों ने मुगलों का आधिपत्य कभी स्वीकार नहीं किया था। महाराणा राजसिंह जो औरंगजेब से निरन्तर युद्ध करते रहे थे, महाराणा प्रताप के पश्चात मेवाड़ के राणाओं में सर्वप्रमुख माने जाते हैं। उदयपुर के पहले ही चित्तौड़ का नाम भारतीय शौर्य के इतिहास में अमर हो चुका था।

उदयपुर में पिछोला झील में बने महलों तथा सहेलियों का बाग नामक स्थान उल्लेखनीय हैं।

सूर्योदय का शहर: उदयपुर

उदयपुर को सूर्योदय का शहर कहा जाता है, जिसको 1568 में महाराणा उदयसिंह द्वारा चित्तौड़गढ़ विजय के बाद उदयपुर रियासत की राजधानी बनाया गया था। प्राचीर से घिरा हुआ उदयपुर शहर एक पर्वतश्रेणी पर स्थित है, जिसके शीर्ष पर महाराणा जी का महल है। सन् 1570 ई. में बनना आरंभ हुआ था।

उदयपुर के पश्चिम में पिछोला झील है, जिस पर दो छोटे द्वीप और संगमरमर से बने महल हैं, इनमें से एक में मुगल शहंशाह शाहजहां (शासनकाल 1628-58 ई.) ने तख्त पर बैठने से पहले अपने पिता जहांगीर से विद्रोह करके शरण ली थी।

सन 1572 ई. में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र प्रताप का राज्याभिषेक हुआ था। उन दिनों एक मात्र यही ऐसे शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता नहीं स्वीकारी थी। महाराणा प्रताप एवं मुगल सम्राट अकबर के बीच हुआ हल्‍दीघाटी का घमासान युद्ध प्रसिद्ध है। यह युद्ध किसी धर्म, जाति अथवा साम्राज्य विस्तार की भावना से नहीं, बल्कि स्वाभिमान एवं मातृभूमि के गौरव की रक्षा के लिए ही हुआ।

इसे देखने में समय व्यर्थ ना करें

भरी दोपहरी में जब हाथ कुछ नहीं लगा

दोपहर करीब एक बजे हम लोगों ने अपना उदयपुर भ्रमण प्रारंभ किया। दोपहर का समय था और तेज धूप थी। कहा जा सकता है की गर्मी अपने चरम पर थी। उदयपुर की थोड़ी बहुत जानकारी मैं भी इंटरनेट से लेकर गया था।

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अपनी जानकारी के आधार पर हमने ओटो वाले से सबसे पहले गुलाब बाग ले जाने के लिये कहा लेकिन गुलाब बाग पहुंचकर हमें निराशा ही हाथ लगी, जैसा गुलाब बाग के बारे में पढ़ा था वैसा वहां कुछ नहीं मिला। लंबे चौड़े एरिया में फैला यह बाग लगभग सुखा था। कहीं हरियाली नहीं दिखाई दे रही थी।

हां, कुछ गुलाब के पौधे जरूर थे लेकिन उस तरह के गुलाब के पौधों के झुंड आम तौर पर किसी भी गार्डन में देखे जा सकते हैं। यहां कुछ फोटोग्राफर राजस्थान की पारंपरिक ड्रेस में फोटो खींच रहे थे। अत हमने भी वहां रुक कर कुछ फोटो खिंचवाए और अपने अगले पड़ाव पिछोला झील की ओर चल दिये।

पिछोला झील

शाहजहां भी जिस जगह से दूर न रह पाए

पिछोला झील उदयपुर शहर की सबसे प्रसिद्ध झील है। यह सबसे सुन्दर है। इसके बीच में जगदीश मन्दिर और जग निवास महल है जिनका प्रतिबिम्ब झील में दिखता है। इसका निर्माण 14वीं शताब्दी के अन्त में राणा लाखा के शासनकाल में एक बंजारे ने कराया था और बाद में राजा उदयसिंह ने इसे ठीक कराया।

बादशाह बनने से पहले शाहजहां भी इस झील के महलों में आकर ठहरे थे। इस झील में स्थित दो टापुओं पर जग मंदिर और जग निवास दो सुंदर महल बने हैं। अब इन महलों को एक पांच-सितारा होटल (लेक पैलेस होटल) में बदल दिया गया है। जिसे राजस्थान, उदयपुर के भूतपूर्व राणा भगवन्त सिंह चलाते हैं।

विशाल सिटी पैलेस

जहां राजाओं को सोने में तोला जाता था

पिछोला झील को देखने के बाद अब हम उदयपुर के प्रसिद्ध सिटी पैलेस महल को निहारने के लिये चल दिये। सिटी पैलेस कॉम्‍पलेक्‍स उदयपुर का सबसे आकर्षक पर्यटन स्थल माना जाता है। उदयपुर में सिटी पैलेस की स्‍थापना 16वीं शताब्‍दी में आरम्‍भ हुई। सिटी पैलेस को स्‍थापित करने का विचार एक संत ने राणा उदयसिंह को दिया था। इस प्रकार यह परिसर 400 वर्षों में बने भवनों का समूह है।

यह एक भव्‍य परिसर है। इसे बनाने में 22 राजाओं का योगदान था। इसमें सात आर्क हैं। ये आर्क उन सात स्‍मरणोत्‍सवों का प्रतीक हैं जब राजा को सोने और चाँदी से तौला गया था तथा उनके वजन के बराबर सोना-चांदी को गरीबों में बाँट दिया गया था। इसके सामने की दीवार ‘अगद’ कहलाती है। यहाँ पर हाथियों की लड़ाई का खेल होता था।

मोर रंग का अनोखा चौक

परिसर में प्रवेश करते ही आपको भव्‍य ‘त्रिपोलिया गेट’ दिखेगा। यहां बालकनी, क्यूपोला और बड़ी-बड़ी मीनारें इस महल से झीलों को एक सुंदर दृश्‍य के रूप में दर्शाती हैं। सूरज गोखड़ा एक ऐसा स्‍थान है जहां से महाराणा जनता की बातें सुनते थे, मुख्‍यत: कठिन परिस्थितियों में रहने वाले लोगों का उत्‍साह बढ़ाने के लिए उनसे बातें किया करते थे।

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मोर चौक, एक ऐसा अन्‍य स्‍थान है जिसकी दीवारों को मोर के कांच से बने विविध नीले रंग के टुकड़ों से सजाया गया है। इससे आगे दक्षिण दिशा में ‘फतह प्रकाश भ्‍ावन’ तथा ‘शिव निवास भवन’ है। वर्तमान में दोनों को होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। इसी परिसर का एक भाग सिटी पैलेस संग्रहालय है। इसे अब सरकारी संग्रहालय घोषित कर दिया गया है। वर्तमान में शम्‍भू निवास राजपरिवार का निवास स्‍थान है। इस परिसर में प्रवेश के लिए टिकट लगता है। टिकट लेकर आप इस परिसर में प्रवेश कर सकते हैं।

तपती गर्मी में यहां मिली हमें राहत

इस मंदिर में कई हाथियों से औरंगजेब ने कराए हमले

सिटी पेलेस के बाद अब हम उदयपुर के प्रसिद्ध जगदीश मंदिर की ओर चल पड़े। जगदीश मंदिर में भगवान विष्णु तथा जगन्नाथ जी की मूर्तियां स्‍थापित हैं। महाराणा जगतसिंह ने सन् 1652 ई. में इस भव्य मंदिर का निर्माण किया था। यह मंदिर एक ऊंचे स्थान पर निर्मित है।

इसके बाह्य हिस्सों में चारों तरफ अत्यन्त सुन्दर नक्काशी का काम किया गया है। औरंगजेब की चढ़ाई के समय कई हाथी तथा बाहरी द्वार के पास का कुछ भाग आक्रमणकारियों ने तोड़ डाला था, जो फिर नया बनाया गया। मंदिर में खंडित हाथियों की पंक्ति में भी नये हाथियों को यथास्थान लगा दिया गया है।

कठपुतलियों का नाच

कठपुतलियों ने फिर याद दिलाया बचपन

जगदीश मंदिर के बाद अब ओटो वाला हमें लेकर गया लोक कला मंडल संग्रहालय। यहां पर हमें भारत के विभीन्न प्रांतों की लोककला की झांकियां देखने को मिलीं। यहां पर दस मिनट का कठपुतली का खेल (पपेट शो) भी दिखाया जाता है जिसका आनंद हमने भी उठाया।

सहेलियों की बाड़ी

जब राजा ने दिया रानी को अंग्रेजी फव्वारा

और अब बारी थी सहेलियों की बाड़ी की, यह उदयपुर में स्थित एक बाग है। इस बाग में कमल के तालाब, फव्वारे, संगमरमर के हाथी बने हुए हैं। इस उद्यान का मुख्य आकर्षण यहां के फव्वारे हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें इंग्लैण्ड से मंगवाया गया था। श्रावण मास की अमावस्या के अवसर पर इस बाड़ी में नगर निवासियों का एक बड़ा मेला भी लगता है।

सहेलियों की बाड़ी का निर्माण राणा संग्राम सिंह द्वारा शाही महिलाओं के लिए 18वीं सदी में करवाया गया था। उद्यान के बारे में यह कहा जाता है कि राणा ने इस सुरम्य उद्यान को स्वयं तैयार किया था और अपनी रानी को भेंट किया था। ‘फतेह सागर झील’ के किनारे पर स्थित यह जगह अपने ख़ूबसूरत झरनें, हरे-भरे बगीचे और संगमरमर के काम के लिए विख्यात है।

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इस उद्यान के मुख्य आकर्षण फव्वारे हैं, जो इंग्लैण्ड से आयात किए गए थे। सभी फव्वारे पक्षियों की चोंच के आकार की आकृति से पानी निकलते हुये बने हैं। फव्वारे के चारों ओर काले पत्थर का बना रास्ता है। बगीचे में एक छोटा सा संग्रहालय है, जहां शाही परिवार की वस्तओं का एक विशाल संग्रह प्रदर्शित है। संग्रहालय के अलावा यहाँ एक गुलाब के फूलों का बगीचा और कमल के तालाब हैं। उद्यान रोज सुबह नौ बजे से शाम के छ: बजे के बीच तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है।

सहेलियों की बाड़ी के फव्वारों में भीगने से गर्मी से बहुत राहत मिल रही थी, यहां एक विदेशी कपल भी घुम रहा था जिनसे हमारी बात भी हुई लेकिन उनके टूर गाइड के माध्यम से क्योंकि वे किसी गैर अंग्रेजी देश से थे। उस विदेशी महिला ने हमारे साथ फ़व्वारों में भीगने का बहुत लुत्फ़ उठाया।

सुखाड़िया सर्कल

यहां से शाम और खूबसूरत लगती है

और अब हमें हमारे ओटो वाले ने अपने अन्तिम पड़ाव यानी सुखाड़िया सर्कल पर छोड़ दिया। यह भी उदयपुर की एक बड़ी खुबसूरत जगह है। यहां पर हमने अपना बचा हुआ समय पेडल बोटिंग करने तथा यहां की खुबसूरती को निहारने में बिताया।

शाम करीब सात बजे हम लोग उदयपुर के एक नामी होटल नटराज में खाना खाकर रेलवे स्टेशन की ओर पैदल ही चल दिए क्योंकि यह होटल से बहुत करीब था और इस तरह हमारी उदयपुर की यह यात्रा संपन्न हुई।


मैकेनिकल इंजीनियरों के बोरिंग टाइप होने और ऐसे ही जितने भी स्टीरियोटाइप हैं, मुकेश भासले उन्हें तोड़ डालते हैं। मस्त घूमते हैं, बीवी-बच्चों को भी संग संग घुमाते हैं। सालों से अपना ट्रैवेल ब्लॉग भी चला रहे हैं। पूछो तो बताते हैं कि ये महादेव के बड़े वाले भक्त हैं, हर साल एक ज्योतिर्लिंग पर जाने का प्रण ले रखा है। अभी ये हम लोगों को झीलों के शहर उदयपुर घुमाने ले जाना चाहते हैं, लेट्स गो।


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