Travel VS Tourism: क्या आप भी गलत तरीके से घूम रहे?

Travel VS Tourism | अभिनेता पंकज त्रिपाठी अपने किसी इंटरव्यू में कहते हैं ‘मेरा मानना है कि हर बच्चे को दसवीं या बारहवीं करके अपना देश घूमना चाहिए। इस तरह से हम अपने देश को और अच्छे से समझ पाते हैं। भारत में घूमना, रहना बड़ा सस्ता है। कम से कम खर्च में भी अपना देश अच्छे से घूमा जा सकता है।’ इस तरह की महीन बातें हर कोई नहीं बता सकता।

हमारे चार धाम भारत के चार अलग-अलग कोने में हैं। तमाम शक्तिपीठ, ज्योतिर्लिंग के दर्शन में ही सम्पूर्ण भारत यात्रा हो सकती है। अयोध्या से निकले श्रीराम चित्रकूट, दण्डकारण्य, पंचवटी, ऋष्यमूक, रामेश्वरम, धनुषकोटि की पदयात्रा कर श्रीलंका पहुंचे, तब मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। बरसों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूमकर ही पांडव कुरुक्षेत्र में अजेय हुए। शंकराचार्य की यात्राओं ने उन्हें आदि गुरू शंकराचार्य बनाया। मोहनदास करमचंद गांधी भारतभ्रमण कर देश की आत्मा को समझ महात्मा कहलाए। अनेक उदाहरण हैं। देशाटन, तीर्थाटन, पर्यटन, भ्रमण सब एक साधन है अपने देश की विविध संस्कृति को समझने का। भारतभूमि की प्राकृतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक सम्पदा विशाल है और इन्हें समझने के लिए यात्राएं किताबों को पढ़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

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अब यात्राएं भी दो तरह से हो सकती हैं। आप दो महीने पहले एयर टिकट ले लीजिए, होटल की बुकिंग पहले हो चुकी है, डेस्टिनेशन पर पहुंचते ही टैक्सी लेनी है, उसी से शहर नाप देना है। शाम को खूब शॉपिंग करनी है, रेस्तरां में खाना है और रूम में आकर वीडियो कॉल करके सबको अपना लैविश सुइट दिखाना है। खैर यह तरीका भी कानूनी अपराध नहीं है। पर इसमें आप भ्रमण के मर्म को कहां समझ पाते हैं! आप तो पार्सल की तरह गए और पार्सल की तरह वापस आ गए।

घूमना मैनेजमेंट भी सिखा सकता है। कम से कम संसाधनों में हम बेहतर कैसे करें। रामजी चाहते तो अयोध्या से चतुरंगिणी सेना बुलवाकर लंका पर तुरत चढ़ाई कर सकते थे। पर नहीं। उन्होंने बंदर, भालू, रीछ आदि का सहारा लिया। विपरीत स्वभाव, अलग भाषा, असमान वर्ग के बीच सामंजस्य स्थापित किया और लंका जीतकर लौटे। भ्रमण हमें देश की भिन्न संस्कृति, भिन्न भाषा के बीच सामंजस्य बिठाना सिखाती है।

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प्रिय दोस्तों! घरों से निकलिए। अपने देश को देखिए, समझिए। एग्जाम देने के बहाने, अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ने के बहाने भिन्न स्थान व वहां के लोगों को समझने की कोशिश कीजिए। जनरल बोगी में बैठकर जाइए, ऑटो-ट्रैकर में बैठकर स्थानीय लोगों के साथ घूमिए, धर्मशाला-गुरुद्वारों में ठहरिए, छोटी जगहों की छोटी-छोटी टपरियों पर खाकर देखिए। बहुत स्वाद आएगा। बहुत कुछ जानने, सीखने, समझने को मिलेगा। लोगों को सुनाने के लिए बहुत-सी कहानियां , खूब सारे खट्टे-मीठे अनुभव होंगे आपके पास और भारतभर में दोस्त। वीकेंड में गोवा, शिमला, मनाली जाकर हिप्पी हो जाना ही पर्यटन नहीं है। अर्थपूर्ण घुमक्कड़ी का आनंद ही अलग है, उसका भी स्वाद चखकर देखिए।


Travel VS Tourismये छोटी मगर मोटी बातें हमें लिखकर भेजी हैं अमन आकाश ने। अमन फिलहाल हिमाचल प्रदेश सेंट्रल यूनिवर्सिटी, धर्मशाला से मास कम्युनिकेशन में पीएचडी कर रहे हैं। उनके मुताबिक वो पढ़ने के नाम पर अभी तक बांकेलाल और चाचा चौधरी पढ़ते हैं, लिखने के नाम पर बस फेसबुक के पन्ने रंगते हैं। पूरा देश अपनी नजरों से देखने की इनकी दिली तमन्ना है, जब भी मौका मिले अपने इस सपने को पूरा करने की पुरजोर कोशिश करते हैं।


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