मुंबई के पास बसे खूबसूरत कसारा में कैंपिंग-राफ्टिंग के मजेदार किस्से

ट्रेकिंग और कैंपिंग में जाने से पहले लोगों के मन में कई सवाल आते हैं। जाने का मन तो होता है पर कई तरह के डर और सवाल आपको जाने से रोक देते हैं। ऐसा मेरे साथ भी कई बार हुआ है। इसीलिए मैंने सोचा क्यों न इस बार अपनी कैंपिंग की यात्रा साझा करूं और आपके मन के कई सवाल दूर कर सकूं।

मैं आज से डेढ़ साल पहले लखनऊ से मुंबई आई थी। तबसे लेकर अब तक कई जगहों को घूम चुकी हूं। इन दिनों मुंबई में काफी गर्मी पड़ रही है। हाल ही में तीन दिन की छुट्टी पड़ी थी। मेरी नेट की सर्फिंग बढ़ी और मैं खोजने लगी कि इस हफ्ते कहां जा सकती हूं। मुंबई में आस पास घूमने के लिए कई जगहें और हिल स्टेशन हैं। लोनावला, खंडाला, महाबलेश्वर तो मैंने घूम लिया था। इस बार कुछ एडवेंचर करने का मन हुआ तो मैं और मेरी दोस्त ने कैंपिंग का प्लान बनाया।

कुछ अलग करने की चाहत

मिस्चीफ ट्रेक्स नाम की एक संस्था है जो हर हफ्ते ट्रेकिंग और कैंपिंग करवाती है। उसी के जरिए हमने अपनी बुकिंग कर ली। मात्र 1450 रुपए में हमें नाइट कैंपिंग, डिनर, बोनफायर और पिक ड्रॉप की सुविधा मिली। नीले आकाश और टिमटिमाते तारों की बीच रात गुजारने का अपना अलग ही मजा है। साथ में अगर ठंडी हवाओं के बीच बोन फायर मिल जाए तो भाई क्या कहने।

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शनिवार की सुबह हमने 9ः53 पर दादर से कसारा की ट्रेन पकड़ी। रास्ते में पहाड़, हरियाली, ट्रेन में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की और तमाम एक्साइटमेंट लिए करीब 12ः05 पर कसारा पहुंच गए। वहां हमारी मुलाकात उस ग्रुप से हुई जिसके साथ हमें आगे की यात्रा करनी थी। वहां से हमें जीप से सफर करना था। लगभग 15 मिनट की दूरी पर बाबा दा ढाबा पड़ा। जहां हमने अपनी भूख शांत की। यहां सोलकढ़ी बहुत ही बेहतरीन मिलती है। अगर आप भी कभी उस रास्ते से गुजरें तो बाबा दा ढाबा जरूर जाएं।

राफ्टिंग-कयाकिंग

वहां से हमने आगे का सफर शुरू किया। लगभग 1 घंटे के सफर के बाद हम पहुंच चुके थे उस जगह। जहां सिर्फ हरियाली, पहाड़ और एक झील दिखाई दे रही थी। वही झील, जहां हमें वॉटर स्पोर्ट्स करना था। जिसे देखकर हमारी सारी थकान दूर हो गई। हमने कपड़े बदले और सीथे लाइफ जैकेट के साथ उतर गए पानी में। वहां हमने कयाकिंग और राफ्टिंग की। आपको राफ्टिंग और कयाकिंग में बेसिक फर्क बता देती हूं, राफ्टिंग में थोड़ी बड़ी नाव होती है और उसमें ज्यादातर नदी की धारा नाव को आगे बढ़ाने का काम करती है, चप्पू का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर करना पड़ता है, वहीं कयाकिंग में छोटी नाव को अकेले ही चप्पू चलाते हुए खेल में बने रहना पड़ता है।

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कयाकिंग का मेरा ये पहला अनुभव था। जिसमें मुझे काफी मेहनत लगी। हमने राफ्टिंग भी की और पानी के बीचोबीच पहुंच गए। जहां से लौटने का मन ही नहीं कर रहा था। खैर लौटना तो था ही। हम लौटे और अब नाश्ते का वक्त हो चला था। अब तक हमें टेंट मिल चुके थे। हमें अंदाजा नहीं था कि जहां सुबह से दोपहर तक गर्मी से पसीना टपक रहा था। वहां रात में इतनी ठंडी हो जाएगी कि कंबल भी कम पड़ जाएगा। खैर, मेरी दोस्त ने कंबल लिया था, जिसने रात में साथ दिया।

टिमटिमाते तारों के बीच

टेंट में कुछ आराम और के बाद अब खेल का वक्त था। जहां हमने पूरे ग्रुप को जानने का मौका मिला। अलग-अलग जगह और प्रोफेशन के लोग थे। हमने अंताक्षरी खेली, अपना अपना इंट्रो दिया और साथ में सबसे वियर्ड चीज बतानी थी। सबके अनुभव सुनकर हम सब खूब हंसे। हमने डिनर किया और फिर बोन फायर के पास बैठ गए।

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जहां कुछ लोगों ने भूतों की कहानी सुनाई तो कुछ ने मुझसे लखनऊ के कुछ हिंदी और खास शब्द सीखे। हमने एक दूसरे की खूब टांग-खिंचाई की और टेंट में जाकर सो गए। सुबह-सुबह हमने तीरंदाजी और शूटिंग की और फिर ग्रुप-फोटो लेकर सब अपने अपने घर को रवाना हो गए।

टिप्स

  • कभी भी ऐसे किसी ग्रुप के साथ जाएं तो पहले उनका प्रोफाइल और सोशल मीडिया अच्छे से देख लें।
  • पहले ट्रिप के भी फोटोज देखें।
  • खाने पीने का सामान लेकर जाएं, प्लम केक, पानी, जूस जरूर रखें।


ये तमाम बातें हमें लिख भेजी हैं शालू अवस्थी ने। शालू पत्रकार हैं। शालू बताती हैं कि अब तो हर वीकेंड निकल लेती हैं कहीं न कहीं घूमने। धुन सवार है कि जितना घूम सकें उतना घूम डालें, बस घूम डालें। स्वादिष्ट व्यंजनों में जान बसती है। फोटो खिंचवाना पसंदीदा शगल है। चाहती हैं कि इस ब्रह्मांड के सभी लोग झोला उठाकर घूमने निकल पड़ें।


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