थूबोन जी: आज से नौ सौ साल पहले पारस पत्थर से बने मंदिर

थूबोन जी, बारहवीं शताब्दी में निर्मित करीब बीस छोटे-छोटे मंदिरों की एक श्रृंखला। थुबोन जी, मध्य प्रदेश में चंदेरी से अशोक नगर को जा रही सड़क पर 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इससे जुड़ी दंतकथा कुछ इस तरह है। नौ सौ वर्ष पहले पाड़ाशाह नाम का एक सेठ हुआ। वह पाड़ों (नर भैंस) पर व्यापार करता था। मतलब जैसे व्यापारी अपने व्यापार के लिए घोड़े या खच्चरों का इस्तेमाल करते हैं, वे पाड़ों का इस्तेमाल करते थे।

एक बार वे अपने पाड़ों के साथ बजरंगढ़ से होकर गुजर रहे थे। बजरंगढ़ गुना से सात किलोमीटर एक स्थान है, जहां अब एक किले के खंडहर हैं, एक सूखती सी नदी है। इस किले से राजपूत राजा, अकबर के काल में चंदेरी के शासक, राजा जय सिंह और सिंधिया आदि की कहानियां जुड़ी हैं। अब बजरंगढ़ एक गांव भर रह गया है।

पाड़ाशाह जब अपने पाड़ों को बांधकर विश्राम कर रहा था तब उनका एक पाड़ा कहीं भाग गया। ढूंढने पर वह बजरंगढ़ के आसपास कहीं एक गुफा में मिला। जब वे उसके पास गए तो पाया कि उसके गले में बंधी हुई सांकल (लोहे की चेन) सोने की हो गई है। जब उन्होंने इसका रहस्य खोजा तो उन्हें वहां एक पारस पत्थर मिला। कहते हैं पारस पत्थर के छूने से लोहा भी सोना बन जाता है।

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पाड़ाशाह को जब वह पत्थर मिला तो उन्होंने उसका प्रयोग धार्मिक और सामाजिक कार्यों में किया। मंदिर बनवाए, जिनमें थूबोन जी, सोनागिरि जी, आहार जी, पपोरा जी के अलावा बुंदेलखंड और आज के मध्यप्रदेश में कई मंदिर बनवाए। इन मंदिरों में विराजित प्रतिमाएं, उनकी आकृति और मंदिरों की आकृति एक समान मिलती है। इसके अलावा पाड़ाशाह ने स्कूल, आश्रम, अस्पताल आदि बनवाए। जो अब अस्तित्व में नहीं क्योंकि यह करीब नौ सौ साल पुरानी बात है।

पारस पत्थर वाली कथा में कितनी सच्चाई मैं नहीं जानती लेकिन उनके द्वारा बनाए गए मंदिरों में गजब का आकर्षण हैं। उन प्रतिमाओं को देख लगता है यहीं बैठे रहो। लगभग सभी मंदिर जंगलों या पहाड़ों पर बने।कभी इस ओर आएं तो इन मंदिरों को जरूर देखें। इतिहास से मिलना सुखद होता है। फिर वह किसी भी धर्म का हो।


चंदेरी के इस कोने के बारे में हमें लिख भेजा है अंकिता जैन ने। अंकिता हिंदी भाषा की लेखिका हैं। इनकी दो किताबें ‘ऐसी वैसी औरतें’, ‘मैं से मां तक’ काफी हिट रही हैं। एक गंभीर लेखिका होने के साथ-साथ अंकिता एक बेफिक्र यायावर भी हैं। देश-विदेश में तमाम लैंडमार्क ये अपने नाम के साथ मार्क कर चुकी हैं। अंकिता अपने जीवनसाथी के साथ वैदिक वाटिका नाम की एक जैविक प्रयोगशाला भी चलाती हैं, जहां पर दोनों साथ में कृषि के तरीकों में आधुनिक किंतु पर्यावरण के लिए अनुकूल प्रयोग करते रहते हैं। 


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