लखनऊ घूमें तो ‘नई’ तारेवाली कोठी का भव्य रिनोवेशन जरूर देखें

लखनऊ के इतिहास में तारेवाली कोठी की बड़ी महिमा है। अब्दुल हलीम शरर के मुताबिक इसे सन् 1832 में बादशाह नसीरुद्दीन हैदर ने बनवाया था। बादशाह को सितारों में बेहद दिलचस्पी थी। सितारों के दर्शन, चाल और स्थिति वगैराह के अध्ययन के लिए एक वेधशाला के बतौर तारेवाली कोठी को बनवाया गया था।

इसमें देश-विदेश के बेहतरीन यंत्र लगवाए गए थे। इसकी दूरबीनें दूर-दूर तक मशहूर थी और बादशाह ने मशहूर नक्षत्र विज्ञानी कर्नल विलकॉक्स को इसका प्रभार सौंपा था। ये वेधशाला अपनी पूरी तबो-ताब के साथ कई साल तक कायम रही। लेकिन जान-ए-आलम वाजिद अली शाह का दौर शुरू होते ही इसकी रौनक को ग्रहण लग गया। उन्होंने इसकी तरफ से मुंह फेर लिया। इसके रख-रखाव पर होने वाले तमाम खर्च बंद कर दिए और इसकी दूरबीनें अपने करीबी लोगों को तोहफे में दे दीं। 1857 तक ये वेधशाला लखनऊ में कायम तो थी मगर ढलती दसहरी की तरह।

लखनऊ के तारेवाली कोठी की महत्ता का दूसरा दौरः

1857 की क्रांति के वक्त इसकी महत्ता का दूसरा दौर शुरू हुआ। जब क्रांतिकारी योद्धा मौलवी अहमदुल्ला शाह उर्फ डंका शाह फैजाबाद से लड़ते हुए लखनऊ आए। लखनऊ में आकर डंकाशाह ने तारेवाली कोठी को ही अपना अड्डा बनाया और यहीं रहकर क्रांतिकारियों के साथ तमाम मंसूबाबंदी की।

लखनऊ
लखनऊ की तारेवाली कोठी में शाम का समय

ये जगह रेजीडेंसी मोती महल, मकबरा सआदत अली खां जैसी तमाम अहम इमारतों के पास थी। लखनऊ में क्रांति की शुरुआत में ये जगह इंकलाब के मरकज के तौर पर मशहूर हो गयी। जंग आगे बढ़ने पर लखनऊ में वो अफरा-तफरी मची कि ये जगह बलवाइयों ने तबाह और बर्बाद कर डाली।

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लखनऊ में बैंक ऑफ बंगाल की स्थापनाः

क्रांति के बाद अंग्रेजों ने लखनऊ में भीषण दमन चक्र चलाया। इस दौरान लंबे वक्त तक तारेवाली कोठी में धूल उड़ती रही। आखिर 17 मार्च 1863 को इसके दिन बहुरे जब यहां बैंक ऑफ बंगाल की लखनऊ शाखा स्थापित हुई। अब इस कोठी को अपना खोया हुआ वैभव दोबारा मिल गया। 1935 में बैंक ऑफ बंगाल, इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया में रूपांतरित हो गया। 1 जुलाई 1955 को इसी तारेवाली कोठी में भारतीय स्टेट बैंक की लखनऊ मुख्य शाखा स्थापित हुई और आज तक कायम है।

लखनऊ की हैरिटेज गैलरी है तारेवाली कोठीः

आज 18 मई 2020 का दिन तारेवाली कोठी के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण दिन है। आम लोगों में बहुत समय से ये सिर्फ बैंक के रूप में पहचानी जा रही थी। आज से ये अपने सम्पूर्ण सांस्कृतिक वैभव के साथ जलवानुमा होगी। आज ये बिल्कुल नए रंग रूप में सामने आ रही है। खबर ये है कि पिछले कई महीनों से इस प्रसिध्द इमारत का वृहद स्तर पर रिनोवेशन हो रहा था और अब ये पूरा हो गया है। खास बात ये है कि इस रिनोवेशन को लखनवी तहजीब की थीम पर किया गया है। इसका कायाकल्प करके इसे गुजरे हुए जमाने की रौनक बख्शी जा रही है। जितनी सुंदर ये पहले दिखती थी उससे ज्यादा सुंदर ये अब दिखेगी।

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तारेवाली कोठी का भीतरी दृश्य

तारेवाली कोठी को भव्य रेनोवेशन संपन्न हुआः

बैंक के ग्राहकों के अलावा आम निवासी एवं पर्यटक भी यहां आएं। इसके लिए बहुत से आकर्षण यहां हैं। यहां तारेवाली कोठी का विस्तृत इतिहास है। लखनऊ के शायरों का लखनऊ पर कहा गया ढेर सारा कलाम है। कवियों की कविताएं हैं। अवधी, हिंदी और उर्दू साहित्यकारों की तस्वीरें हैं। खूबसूरत लाइटें हैं। हॉल के प्रवेश द्वार पर खास लखनऊ का आर्ट वर्क है। लखनऊ के मशहूर खिलाड़ियों को समर्पित एक पूरा हिस्सा है। लखनऊ में बैंकिंग के इतिहास से जुड़ी एक हेरिटेज गैलरी है। दीवारों  पर लखनऊ की मशहूर इमारतें नजर आती हैं। फर्नीचर पर लखनवी तर्ज की नक्काशी है। लेकिन सबसे खास बात ये है कि आज से तारेवाली कोठी में एक लाइब्रेरी भी शुरू हो रही है। यानी लखनऊ शहर को एक नया पुस्तकालय और साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए एक नई जगह मिल रही है। इस नई लाइब्रेरी का नाम भी बहुत सुंदर है,अदब अंजुमन।

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तारेवाली कोठी की ओर जाती सड़क

जब हमको पहली बार इस भव्य रिनोवेशन प्रोजेक्ट के बारे में पता चला था तो हमको बहुत खुशी हुई थी। यकीन नहीं हो रहा था कि बैंक जैसी घोर कमर्शल और रूखी जगह पर ये हो सकता है। लखनऊ की तारीख और तहजीब को लेकर इतना बड़ा और संजीदा काम किया जा सकता है। लेकिन आज जब ये काम पूरा हो चुका है और इसका लोकार्पण है तो दिल पहले से भी ज्यादा खुश है। अफसोस सिर्फ एक बात का है। अगर कोरोना न होता तो पूरा लखनऊ इस तारेवाली कोठी के नए रूप को पास आकर देखता। लेकिन कोई बात नहीं। यार जिन्दा सोहबत बाकी बहरहाल इस बड़े और महत्वपूर्ण काम के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सभी लोगों खासतौर पर नीलेश द्विवेदी जी को बहुत बधाई और शुक्रिया।

इतना सब लिखने की वजह सिर्फ ये है कि लखनऊ के हों या बाहर के स्थिति सामान्य होने पर जब मौका मिले तारेवाली कोठी का दर्शन जरूर करें। ये लखनऊ की अति महत्वपूर्ण जगह है।

(ये ब्लॉग ‘चलत मुसाफ़िर’ के साथ इंटर्नशिप कर रहीं शिल्पी ने संपादित किया है)


लखनऊ के इस खास कोने के बारे में लिखा है हिमांशु बाजपेयी ने। हिमांशु ख्यातिलब्ध दास्तानगो हैं। लखनऊ पर एक खूबसूरत किताब ‘किस्सा किस्सा लखनऊवा’ के रचयिता हैं।


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