वो लोकसंगीत जो आज भी भारत, बांग्लादेश को एक कर सकता है

बाउल संगीत, बंगाल की आत्मा है। बाउल गायक ज्यादातर बंगाल के बोलपुर में पाए जाते हैं। शांतिनिकेतन भी बोलपुर में ही है। रवींद्रनाथ टैगोर भी बाउल के मुरीद थे। हर साल अपने घर पर होने वाली कवि सम्मेलन में बाउल गायकों जरूर बुलाया करते थे। बाउल को यूनेस्को ने खतरे में पड़ी विरासत की सूची में डाला है। इतनी महान कला के साधक मुफलिसी में जी रहे हैं। हम अपनी परंपराओं, कलाओं के प्रति इतना उदासीन कैसे हो सकते हैं? फिर लापरवाही के साथ ये भी कहते हैं, इस देश में रखा ही क्या है।


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