बनारस की वो चीज जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग खिंचे चले आते हैं

बनारस की गंगा आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। दुनियाभर से लोग बनारस के घाटों को देखने आते हैं। वैसे गंगा के कई घाटों पर आरती होती है लेकिन राजेन्द्र घाट पर होने वाली संध्या आरती बहुत शानदार होती है। आरती देखने के लिए देशी-विदेशी पर्यटकों के साथ वीवीआईपी, सेलिब्रेटीज भी आते हैं। आरती के शुरू होने से अंत होने तक एक अलौकिक वातावरण सा बंध जाता है। आरती खत्म होने पर लोग गंगा से एक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।


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गंगा-वरुणा के संगम पर बनी एक मजार, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं

बनारस में गंगा-घाटों के बारे में सबने बहुत सुना है। गंगा के पहले घाट ‘आदिकेशव’ के पास है चंदन सयैद की मजार। वहां आने वाले लोगों का मानना है  कि चंदन सयैद ने मजहब और मानवता के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी है। इस जगह के बारे में बहुत कम लोगों को ही जानकारी है। यहां जो जोड़ी कव्वाली गायी जाती है उसका तो जवाब नहीं। आवाज ऐसी कि रूह छू जाए। इस जुगलबंदी को सुनकर कई लोग तो अपने आंसू रोक ही नहीं पा रहे थे।


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गंगा को तो बचा लिया, वरुणा का क्या?

गंगा को स्वच्छ रखने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। सरकार नई योजनाएं भी ला रही है। उन योजनाओं पर कितना अमल होता है, किसे पता? गंगा को बचाने के लिए कई संस्थान भी लगे हुए हैं। पर उन नदियों का क्या जो गंगा को इतना विशाल बनाए रखने में सहायता करती है। वरुणा भी एक ऐसी ही नदी है। बनारस में गंगा के पहले घाट ‘आदिकेशव’ पर ही गंगा और वरुणा का मिलन देखने को मिलता है। गंगा तो दिखती है पर वरूणा कहीं भी नजर नहीं आती। वरुणा आपकी नजरों के सामने होगा और आप उसे पहचान नहीं पाएंगे। नाला समझकर आगे बढ़ जाएंगे।


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उत्तर प्रदेश राज्य अपने में हर रंग समेटे हुए है। धार्मिक सद्भावना का एक रंग हमें देखने को मिला उन्नाव और रायबरेली के बीच में स्थित तकिया नाम की एक जगह में। वहां पर मोहब्बत शाह बाबा की मजार और सहस्त्र लिंगेश्वर मंदिर एक ही साथ एक ही जगह पर हैं। इन दोनों की मोहब्बत का जश्न है यहां पर लगने वाला मेला। हिंदू-मुस्लिम एकता और सदभाव का प्रतीक बन चुका तकिया मेला लोगों के लिए मिसाल है। यहां आने वाले हर वर्ग के लोग दोनों ही जगह दर्शन करने आते हैं। मेले में आया हर नागरिक पहले बाबा मोहब्बतशाह व उनके शिष्य न्यामतशाह की मजार पर चादर चढ़ाता है फिर सहस्त्र लिंगेश्वर महादेव मंदिर में पूजा अर्चना करता है।


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बनारस में होने वाली सूर्योदय आरती है भारत में सबसे अलग

बनारस में सूर्योदय की आरती अस्सी घाट पर होती है। यहां होने वाली आरती भारत में होने वाली सभी आरतियों से अलग है। यहां मंत्रोच्चारण लड़कियां करती है। पाणिनि कन्या महाविद्यालय की अध्यापिका इस आरती का नेतृत्व करती हैं। इन्हीं की निगरानी में सुबह का यज्ञ भी होता है। लड़कियों की मीठी आवाज से रोज सुबह सूर्य को आवाह्न दिया जाता है।


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बनारस की गलियों में बसा कोरियन कुजीन

बनारस में बनने वाले व्यंजनों को तो कई लोगों ने चखा ही होगा। पर ऐसे कई विदेशी कुजीन है जो बनारस में उतने ही लोकप्रिय हैं जितना की यहां का लिट्टी चोखा और ठंडई। गंगा घाट की गलियों में आपको कई रेस्टोरेंट मिल जाएंगे जहां आप कोरियाई खाने का मजा ले सकेंगे। इन रेस्टोरेंट को बनारस के ही लोग चला रहे हैं, जो कोरियन भाषा में भी बात करते हैं।


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लखनऊ आएं तो राहुल के ठेले पर आना न भूलें

लखनऊ के चौक पर जाइए। वहां से पास में ही है अकबरी गेट। तीन गलियां आगे जाकर मिलेगा आपको राहुल का ठेला। जहां आपकी नवाजिश की जाती है सात मसाले वाले गोल गप्पे से। हींग से लेकर सौंफ वाले मसालों के गोल गप्पे.. आहा! वैसे तो ये छोटा सा ठेला है पर यहां आने वाले ग्राहकों की कमी नहीं। चटोरपंथी का एक ही ईमान है और वो है मजेदार स्वाद।


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मगहरः जहां कबीर ने लाया सभी धर्मों को एक जगह

मेरा शहर या कहूं एक छोटा सा कस्बा मगहर। कबीर का शहर मगहर, साम्प्रदायिक सौहार्द का नगर मगहर, अपना हम सबका प्यारा घर मगहर। तुम्हें पता है मित्र, जब सुबह की बांग देते मुर्गों के बीच हमें अजान, घंट-घडियाल और कबीर के दोहों का मिश्रित धुन सुनाई देता है, मां कसम पूरा दिन बन जाता है। इस बने हुए दिन को मीठा बनाती है कुमार हलवाई की लबालब चासनी से भरी जलेबी,बशर्ते इसके लिए तुम्हे बहुत मशक्कत करनी पड़ सकती है। मित्र,कुमार हलवाई की जलेबी इतनी फेमस है कि भोर से ही लम्बी लाइन लग जाती है। बाकी दिन के इस मीठे आगाज़ को खूबसूरत अंजाम देने के लिए हमारा ‘कबीर चौरा’ है ही।

कबीर चौरा, जहां पर प्रसिद्ध फक्कड़ संत कबीर दास ने निर्वाण प्राप्त किया था। बताते हैं कि कबीर के समय यह मिथक प्रचलित था कि जो बनारस में मरता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है, वहीं जो मगहर में मरता है वह नरक को जाता है। कबीर, जो आडम्बर, पाखंडों और मिथकों को तोड़ने वाले माने जाते थे, ने इस मिथक को भी तोड़ने का संकल्प लिया और अपने जीवन का अंतिम कुछ समय मगहर में ही बिताया।

“क्या काशी क्या उसर मगहर, जो पाई राम बस मोरा,

जो काशी तन तजै कबीरा, रामहि कौन निहोरा।”

आमी नदी

आमी नदी

कबीर-चौरा, आमी नदी के तट पर स्थित एक विशाल सा प्रांगण, जहां पर कबीर दास की गुफा स्थित है। यहाँ एक तरफ शिव मंदिर है तो दूसरी तरफ जामा मस्जिद भी, एक तरफ कबीर की समाधि भी है, तो दूसरी तरफ मजार भी।अपने इन विशिष्ट स्थापत्यों के लिए कबीर-चौरा पूरे क्षेत्र में साम्प्रदायिक सौहार्द का एक अद्भुत प्रतीक माना जाता है।

कबीर की समाधि

बस्ती! नाम तो सुना ही होगा

बस्ती, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा लेकिन ऐतिहासिक और पौराणिक नजरिए से काफी जरूरी जगह है. भारत के छोटे से कोने के बारे में बड़ी-बड़ी बातें जानते हैं.