शनिवार वाड़ा: मराठाओं का शान रहा ये किला कैसे बन गया भूतिया

पुणे एक अच्छा शहर है, यहां दो जगहें बहुत मशहूर हैं। पहला कोरेगांव, जहां आचार्य रजनीश (ओशो) का इंटरनेशनल आश्रम है। और दूसरा है शनिवार पेठ के व्यस्त बाजार के बीचों बीच बना शनिवार वाड़ा। हालांकि जब शनिवार वाड़ा बना होगा तब इसके चारों तरफ ये सब भीड़-भाड़ न रही होगी। और आज आलम यह है कि इसके चारों तरफ गाड़ी-मोटर घूम दौड़ कर अपना काला धुआं इस ऐतिहासिक धरोहर पर फेंक रही हैं। इसको बदसूरत और बीमार सा बनाए दे रही हैं। जाने क्यों प्रशासन को इसकी फिक्र सी नहीं है।

इतिहास के पन्नों से शनिवार वाड़ा

भला हो बाजीराव मस्तानी फिल्म का जो उत्तर भारत के लोगों को पेशवा बाजीराव जैसे वीर के बारे में पता चला। तो उन्हीं पेशवा बाजीराव ने 10 जनवरी 1730, दिन शनिवार को इस भव्य किले की नींव रखी थी। इसलिए इसका नाम शनिवार वाड़ा पड़ा, नाम के बारे में जानकारी यही मिलती है। इस किले का उद्घाटन 22 जनवरी 1932 में हुआ। तस्वीर में जो द्वार दिखाई दे रहा है, इस किले का मुख्य दरवाजा है, जो उत्तर दिशा की ओर है, जिस तरफ अपनी दिल्ली है, इसीलिए इस दरवाजे का नाम दिल्ली दरवाजा है।

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बाकी 4 या 5 दरवाजे और भी हैं, उनके नाम भी हैं। अब याद नहीं। और पक्का भी नहीं कि सूचना ठीक भी है कि नहीं, जैसे एक दरवाजे को मस्तानी दरवाजा कहा गया है कहीं, जहां से मस्तानी आती जाती थीं, उसी दरवाजे को अलीबहादुर दरवाजा भी कहा गया है। खैर अपन को मुख्य दरवाजे से मतलब था, जहां से प्रवेश किया जाता है। इसलिए उसी का नाम लिखा।

27 फरवरी 1828 को किले में किन्हीं अज्ञात कारणों से आग लग गई थी। आग पर पूरी तरह से काबू पाने में 7 दिन लग गए, कई महत्वपूर्ण इमारतें स्वाहा हो गईं, बाकी आग के काले निशान आज भी देखे जा सकते हैं कहीं-कहीं। इस किले के संग कुछ ऐसी घटनाएं जुड़ी हैं जिसके चलते इस किले को भूतिया स्थानों में विशेष दर्जा हासिल है।

किले से जुड़ा सबसे रोचक किस्सा

एक थे नारायण राव जी, उम्र 16 बरस में उनको मराठा साम्राज्य का पांचवा पेशवा बना दिया गया। इनके काका रघुनाथ राव (राघोबा) और काकी (राघोबा की पत्नी) को ये सब पसंद न आया। राघोबा खुद को पेशवा की गद्दी के हकदार समझते थे। इस बात का अंदेशा बालक नारायण राव को भी था। बालक पेशवा ने अपने काका को इसी किले में नजरबंद करवा दिया। इससे बात बिगड़ गई और राघोबा ने इस सबसे छुटकारा पाने के लिए गार्दीयों (लड़ाका भील जाति) को पत्र लिखा कि ‘नारायण राव ला धरा’ (नारायण राव को बंदी बनाओ)। इस पत्र के संग काकी मने राघोबा की पत्नी खेल खेल गईं और एक अक्षर की हेर फेर से अर्थ ही बदल दिया, पुराने पत्र में नया आदेश था ‘नारायण राव ला मारा’।

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जब लड़ाके गार्दीयों ने रात के अंधेरे में किले में घुस कर बालक पेशवा को मारने के लिए दौड़ाया तो बालक अपने काका के कमरे की तरफ चिल्लाते हुए भागा “काका माला वचाव” (चाचा मुझे बचाओ)।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि नारायण राव पेशवा अपने काका राघोबा के कक्ष तक पहुंच न पाए और उससे पहले ही गार्दीयों ने उनके छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए। कुछ बताते हैं कि राघोबा के कक्ष में ही इस हत्या को अंजाम दिया गया और काका देखते रहे। उसी रात नारायण राव पेशवा की लाश के टुकड़ों को नदी में बहा दिया गया। उन्हीं बालक पेशवा के अंतिम वाक्य ‘काका माला वचाव’ आज भी सुनाई देते हैं लोगों को।

कभी जाना हो पुणे तो इस भव्य किले को अवश्य देखिये, बालक पेशवा के अंतिम वाक्य सुनाई दें न दें, मराठाओं के इतिहास के बारे में, उस काल के बारे में बहुत कुछ पता चलेगा।


मराठा इतिहास के इस अतिमहत्वपूर्ण अध्याय के बारे में लिख भेजा है रणविजय सिंह रवि ने। ये घूमते खूब हैं, इनकी फेसबुक टाइमलाइन भरी रहती है अलग-अलग जगहों की तस्वीरों से। लेकिन लिखने के मामले में बड़े आलसी हैं। हमसे बोला है कि थोड़ी खिंचाई कर देना कम लिखने के लिए, ताकि हमारे साथ-साथ ऐसे ही और आलसी घुमक्कड़ों की कलम चल पड़े। हमने कहा, बिल्कुल चलेगी। हम सब मिलकर घूमेंगे और खूब लिखेंगे। 


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