साबरमती आश्रम: जिसने एक वकील को महात्मा बना दिया

एक चश्मा, एक लाठी, एक चरखा और कभी न खत्म होने वाली हिम्मत। इन सभी चीजों को जोड़ा जाए तो मन में एक ही नाम आता है, मोहनदास करमचंद गांधी। हम आपको ले चल रहे हैं गांधी जी की कर्मभूमि, गुजरात के काम-काज वाली जगह अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में।

गांधी
साबरमती आश्रम का प्रवेशद्वार

गांधी जी वो हैं, जिनके कामों ने उन्हें आम से खास बना दिया। जिन्होंने धर्म-जाति से ऊपर उठ कर लोगों को एकजुट होकर रहना सिखाया।आज हम बात करेंगे उस आश्रम की, जिसने एक वकील को महात्मा बना दिया। साबरमती भारत में गांधी जी का पहला आश्रम है। जो 1917 में साबरमती तट पर बना था।

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आश्रम से दिखती साबरमती नदी

यहां आश्रम बनाने का उनका मुख्य उद्देश्य था, जीवनशैली में बदलाव। गांधी जी एक ऐसा जीवन चाहते थे । जिसमें वो खेती, गो पालन और खादी से जुड़े रह सके। ये आश्रम 1917- 1930 तक गांधी जी का घर रहा है।

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इस चरखे पर कमलम्मजी ने 1924 में सबसे बारीक सूत की कताई की

गांधी की दांडी यात्रा:

ये गांधी जी के स्वतंत्रता पाने के संघर्ष को बताता है। 12 मार्च 1930 में यहीं से गांधी जी ने दांडी यात्रा शुरू कि थी। ये यात्रा 241 मील दूर दांडी के तट पर खत्म हुई थी। ये यात्रा उस नियम के खिलाफ थी, जो भारतीयों को नमक बनाने से रोकता था और जताता था कि भारतीयों की छोटी से छोटी चीज पर अंग्रेजों का अधिकार है।

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कस्तूरबा गांधी का कमरा

इस सत्याग्रह ने अंग्रेजों को भारतीयों की ताकत दिखा दी थी। कुल 60 हजार से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। अंग्रेजों ने भविष्य के खतरों को भांपते हुए गांधी जी को आश्रम खाली करने का आदेश दिया था। लेकिन उससे पहले गांधी जी वचन ले चुके थे कि जब तक भारत को आजादी नहीं मिलती। गांधी आश्रम में कदम नहीं रखेंगे पर मुमकिन नहीं हो पाया क्योंकि 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी तो मिली पर 1948 में उनकी हत्या कर दी गई।

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प्रार्थनाभूमि

साबरमती हमेशा के लिए गांधी जी के स्पर्श से वंचित हो गया। आज कल साबरमती स्वतंत्रता संघर्ष का स्मारक बन गया है। यहां रोज हजारों लोग आते हैं। सत्याग्रह के कुछ चिन्ह ढूंढते हैं और कुछ यादें ले जाते हैं। कुछ आजादी की तो कुछ महात्मा गांधी की।

(ये ब्लॉग ‘चलत मुसाफ़िर’ के साथ इंटर्नशिप कर रहीं शिल्पी ने संपादित किया है)


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