बस्तर 11: और अब तक तो बस्तर से मोहब्बत हो चुकी है

अब मैं अपने इस बस्तर डिवीजन सफर के आखिरी पड़ाव पर थी। इतने दिनों में यहां की अप्रतिम प्रकृति ने एकदम अपना बना लिया था। अब ये जंगल तिलिस्मी नहीं बल्कि घर से लगने लगे थे। यहां के लोगों की नासमझी वाली समझदारी पर प्यार आने लगा था। उनके भात-झोल वाले खाने, महुआ और ताड़ी की खुशबू दिमाग में छाने लगी थी।

मैं बस्तर डिवीजन के बस्तर जिले में पहुंच गई थी। यहां की 70 प्रतिशत आबादी जनजातीय है। जिनमें गोंड, मारिया, मूरिया और हल्बा प्रमुख है। बस्तर को सात विकासखण्ड जगदलपुर, बस्तर, दरभा, तोकापाल, बकावंड, बास्तानार और लोहण्डीगुड़ा में बांटा गया है।

अब से पहले बस्तर का मतलब ही आतंक, नफरत और धोखाधड़ी था। लेकिन अब मैं जब बस्तर के इतने करीब थी तो सोच रही थी। बेचारा बस्तर केवल और केवल राजनैतिक साजिशों का शिकार है। बस्तर, श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी वाली वही डेमोक्रेसी रूपी कुतिया है, जिसे कोई भी लात मारकर निकल जाता है।

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बाहर वाले नक्सल, घर वाले नक्सल, अर्बन नक्सल, रूरल नक्सल, ये वाली सरकार, वो वाली सरकार सबके सब बस्तर को दोहन करते हैं और जीभ मटकाकर निकल जाते हैं। मैं शायद जज्बाती हो रही हूं। शायद ऐसा इसलिए भी हो रहा था क्योंकि यहां ये मेरा आखिरी दिन था। मैं चाहती हूं कि बस्तर के मूल निवासियों के लिए जो चिंता और लाड़ मुझे महसूस हो रहा है, वो इस देश के हर व्यक्ति को महसूस होना चाहिए।

बस्तर जिला खूबसूरत जलप्रपातों से घिरा है। सुकमा जिले से जब बस्तर की ओर बढ़ो तो सबसे पहले तेज कल-कल की आवाज से स्वागत करता है तीरथगढ़ जलप्रपात। विशाल और सरस। ऊंची चट्टानों और घाटियों के बीच में दूध जितनी सफेद बहती एक साथ कई धाराएं। घने जंगलों के बीच खेलती सूरज की किरणें और तेज बहाव से उड़कर आती पानी की फुहारें।

सब कुछ किसी स्वर्गिक स्वप्न की तरह। ऊंची एक चट्टान पर बैठकर मैं सोच रही थी कि इस सुकून भरी परिधि के बाहर सब कुछ कितना अशांत है। यहां के भोले-भाले लोगों ने क्या चाहा था? बस यही न, कि उनके ये पहाड़, ये जंगल, ये नदियां, ये झरने, ये सब बस ऐसे ही बने रहें। निष्ठुर-लोभी पूंजीपतियों और कुटिल राजनेताओं की शनि दृष्टि से दूर।

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ये लोग नहीं जानना चाहते हैं कि पहाड़ों को फोड़कर अंदर से ‘खजाना’ कैसे निकाला जाता है। शायद वो जानते हैं कि दोहन से ज्यादा संरक्षण जरूरी है। ये लोग नहीं चाहते, जंगल के जंगल काटकर काला धुआं उगलने वाले पॉवर प्लांट बनाए जाएं। क्योंकि वे समझते हैं कि इंसानी जरूरतों का कोई अंत नहीं है। लेकिन प्रकृति का स्वस्थ बने रहना जरूरी है।

तीरथगढ़ जलप्रपात की सुंदरता को देखने के बाद मैं दरभा के एक सरकारी स्कूल में गई। प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक, तीनों ही स्कूलों की बिल्डिंग थीं। टीचर्स बड़े उत्साह से बच्चों को पढ़ा रहे थे। प्राथमिक स्कूल की एक टीचर ने इसी स्कूल से ही पढ़ाई की थी।

स्कूल के फीमेल टॉयलेट में कोई एनजीओ सैनिटरी नैपकिन की मशीन लगा गया है। लेकिन वो लॉक्ड था और स्कूल में किसी के भी पास उसकी चाबी नहीं थी। दो शिक्षिकाएं क्लास के बाद हमारा हालचाल लेने आईं, उनमें से एक बिहार की थी लेकिन कई सालों से बस्तर में ही रह रही थीं।

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बस्तर के हालात पर मैं उनके विचार जानना चाह रहीं थीं। वो बोलीं हमारे बस्तर को बेवजह इतना बदनाम कर दिया गया है। यहां पर इतना कुछ सुंदर है, उसके बारे में कोई बात ही नहीं करता। सब जगह बस एक ही चीज की बात होती है। वहां से निकलकर देश के सबसे चौड़े जलप्रपात और बस्तर की शान चित्रकोट पहुंच गए।

(बस्तर जिले में इसके बाद गुजारे गए समय का ब्यौरा यहां पढ़ें)


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