गंगा को तो बचा लेंगे पर वरुणा नदी का क्या !?

पिछली रात हम राजघाट से वापिस आ रहे थे और मन में यह खुशी थी कि हमने गंगा के सारे घाट घूम लिए हैं।। ये खुशी ज्यादा देर तक टिकने वाली नहीं थी। गंगा घाट के आगे एक पान की दुकान पर पता चला इससे आगे दो घाट और हैं। रात बहुत हो चुकी थी तो हम रूम पर वापस लौट आए। अगले दिन तैयार होकर हम संगम देखने चल पड़े। आदिकेशव घाट हमारे रूम से बहुत दूर था। हमें पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो चुकी थी। राजघाट से आदिकेशव केवल 2-3 किमी ही दूर था। वहां तक हमें पैदल ही जाना था।

गंगा
गंगा घाट

 

गंगा किनारे कव्वाली का लुफ्त:

सुबह से हमनें कुछ भी नही खाया था। अब तक हम भूख से थक चुके थे। खाली पेट घूमना बड़ा तकलीफ देता है। लोगों से पूछते-पूछते आगे बढ़ रहे थे। किसी ने हमें बताया कि, पास ही में चंदन सय्यद की मजार है। उसी के पास वरूणा और गंगा का संगम मिल जाएगा। नीचे की तरफ जाता एक छोटा सा रास्ता था। हम आगे बढ़ते गए। वहां करीब 40-50 लोग थे, जो आपस में बातचीत कर रहे थे।

कई लोगों ने पीले रंग के कपड़े पहन रखे थे। हर तरफ लाल-हरे रंग के झंडे लगे हुए थे। देखने से वो जगह एक दरगाह जैसी दिख रही थी। अभी हम उस जगह को निहार ही रहे थे कि तभी किसी के गाने की आवाज हमारे कानों में पड़ी। हम उस आवाज की तरफ भागे। वहां एक बुजुर्ग और 15-16 साल का लड़का था जो गाने गा रहे थे। बहुत देर तक हम वहीं बैठे रहे और कव्वाली का लुफ्त उठाया। हम जैसे कि उनकी कव्वाली में खो गए थे। कव्वाली के खत्म होते ही हमें याद आया कि हमें वरुणा को देखने जाना है।

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गंगा में वरुणा की झलक:

मजार में वरुणा के बारे पूछने पर पता चला कि उन्हें भी कुछ खास पता नहीं था। हम आगे चल पड़े। वरुणा को ढूंढते हुए हम आगे बढ़े। वरुणा का तो कहीं नामोनिशान ही नहीं था। ऊपर से देखने पर गंगा में वरुणा की हल्की सी झलक मिलती है। वरुणा गंगा में कहां से मिलती है, इसका कुछ पता नहीं चल पा रहा था। हमने हर तरफ जाकर देखा पर कुछ पता नहीं चला। हम ढूंढते हुए एक नाले के पास जरूर पहुंच गए थे जिससे बहुत गंदी बदबू आ रही थी। अब हम हार मान चुके थे।

सोचा, पास से ही वरुणा और गंगा को देख आएं। नाव पर बैठे ही थे कि हमारी नजर पानी की तरफ गई। पानी का रंग काला था। बहुत ही गंदे और अजीब तरीके के बुलबुले उठ रहे थे। शाम होने वाली थी। बीचोबीच पहुंच कर गंगा और वरूणा में फर्क करना बहुत मुश्किल था। नाविक हमें दूसरी तरफ लेकर आ चुका था। वरुणा के बारे में हमारी बढ़ती हुई जिज्ञासा अभी शांत नही हुई थी।

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गंगा
गंगा में वरुणा

गंगा की सफाई पर पैसे बर्बाद:

बातों-बातों में उसने हमें बताया कि कैसे सरकारी सफाई कर्मचारी अपना काम ठीक से नहीं करते। कैसे गंगा घाट की सारी गंदगी घाट खत्म होते ही वापिस गंगा में डाल दी जाती है। गंगा सफाई के नाम पर सरकारी पैसे बर्बाद किए जा रहे हैं। गंगा की सच्चाई गंगा घाट खत्म होते ही पता चल जाती है। इस घाट का नजारा दिल्ली के यमुना जैसा ही दिख रहा था। हमने वरूणा के बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि वो गंदा नाला ही वरुणा है। ये बात सुन कर हमारी आंखे खुली की खुली रह गई। हमने एक साथ कहा ‘क्या, ये गंदा नाला वरुणा है’। उन्होने हमें यह भी बताया कि कैसे कूड़े के कारण उनका जाल फट जाता है। उन्हें कैसे रोजाना के नुकसान से जूझना पड़ता है।

गंगा का बदलता रूप:

वो लोग बहुत दु:खी थे। पिछले दिनों को याद करते हुए वो हमें बता रहे थे कि कैसे वो वरुणा के पानी का उपयोग रोजाना के कामों के लिए करते थे। कैसे उसकी अनदेखी कर के लोंगों ने वरूणा को नाले में तब्दील कर दिया। वरुणा की ऐसी दशा देख कर मेरा मन भारी हो गया। अब तक गंगा के घाटों पर जहां मेरा दिल खुश था, वहीं गंगा के पहले घाट का यह रूप मेरे मन को विचलित कर रहा था।

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गंगा
नाविक

 

गुम होती वरुणा:

गंगा की सफाई को लेकर शोर मचा रहता है वहीं गंगा की खूबसूरती को बढ़ाने वाली वरुणा को अनदेखा कर दिया गया है। गंगा के करीब रहकर भी क्यों वरुणा को सब भूल चुके हैं और किसी को एक बार भी इसका ख्याल नहीं आता। कौन सी बड़ी बात है, वरुणा जैसी कितनी नदियां मर चुकी हैं। इसका ख्याल कोई क्यों रखे। इससे किसका फायदा। वरुणा आईना है, हर उस सख्श के लिए जो नदियों को मां तो कहता है पर मानता नहीं है। मेरे दिल में एक ही सवाल उठ रहा था। गंगा को बचा लिया पर वरुणा का क्या?

(ये ब्लॉग ‘चलत मुसाफ़िर’ के साथ इंटर्नशिप कर रहीं पूजा ने संपादित किया है।)

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