Patal Bhuvaneshwar: जहां होते हैं चारों धाम के एक साथ दर्शन

उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमांत कस्बे गंगोलीहाट में चूना पत्थर की एक प्राकृतिक गुफा है। इस गुफा को Patal Bhuvaneshwar के नाम से जाना जाता है। यह गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। यह पवित्र और रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। मान्यता है कि इस गुफा में 33 करोड़ देवी-देवताओं ने अपना निवास स्थान बना रखा है। इस गुफा में धार्मिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कई प्राकृतिक कलाकृतियां स्थित हैं।

यह गुफा भूमि से 10 फीट नीचे है, लगभग 160 वर्ग मीटर क्षेत्र में विस्तृत है। स्कंदपुराण के 103वे अध्याय के श्लोक 21 से 27 के अनुसार, Patal Bhuvaneshwar भूतल का सबसे पावन क्षेत्र है। जहां चार धाम की यात्रा का फल यहां के दर्शनों से प्राप्त होता है। श्लोक 30 से 34 के अनुसार इसके समीप जाने मात्र से व्यक्ति 100 कुलों का उद्धार कर लेता है।

Patal Bhuvaneshwar
Patal Bhuvaneshwar

Patal Bhuvaneshwar का पौराणिक इतिहास

इस गुफा की खोज राजा ऋतुपर्णा ने की थी, जो सूर्य वंश के राजा थे और त्रेता युग में अयोध्या पर शासन करते थे। स्कंदपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं। यह भी वर्णन है कि राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने इस गुफा के भीतर महादेव शिव सहित 33 करोड़ देवी-देवताओं के साक्षात दर्शन किये थे। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु आदि शंकराचार्य का 822 ई. के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया।

ये भी पढ़ें:  Uttarakhand Folk Art ऐपण: दम तोड़ती पारंपरिक कला

Patal Bhuvaneshwar की मान्यताएं एवं विशेषताएं

हिंदू धर्म में भगवान गणेशजी को प्रथम पूज्य माना गया है। गणेशजी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने क्रोध में  गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया था। बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान गणेश को हाथी का मस्तक लगाया गया था, लेकिन जो मस्तक शरीर से अलग किया गया, वह मस्तक भगवान शिवजी ने पाताल भुवानेश्वर गुफा में रखा है।

पाताल भुवनेश्वर की गुफा में भगवान गणेश के कटे ‍‍शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाले शवाष्टक दल ब्रह्मकमल के रूप की एक चट्टान है।
इससे ब्रह्मकमल से भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है। मुख्य बूंद आदिगणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है। मान्यता है कि यह ब्रह्मकमल भगवान शिव ने ही यहां स्थापित किया था।

इस गुफाओं में चारों युगों के प्रतीक रूप में चार पत्थर स्थापित हैं। इनमें से एक पत्थर जिसे कलियुग का प्रतीक माना जाता है, वह धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा ह। यह माना जाता है कि जिस दिन यह कलियुग का प्रतीक पत्थर दीवार से टकरा जायेगा उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा। इस गुफा के अंदर केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के भी दर्शन होते हैं। बद्रीनाथ में बद्री पंचायत की शिलारूप मूर्तियां हैं। जिनमें यम-कुबेर, वरुण, लक्ष्मी, गणेश तथा गरूड़ शामिल हैं।

ये भी पढ़ें:  Uttarakhand First Street Library: Chalat Musafir और Bastapack Adventure की साझी पहल

तक्षक नाग की आकृति भी गुफा में बनी चट्टान में नजर आती है। इस पंचायत के ऊपर बाबा अमरनाथ की गुफा है तथा पत्थर की बड़ी-बड़ी जटाएं फैली हुई हैं। इसी गुफा में कालभैरव की जीभ के दर्शन होते हैं। इसके बारे में मान्यता है कि मनुष्य कालभैरव के मुंह से गर्भ में प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

कैसे पहुंचें Patal Bhuvaneshwar?

पाताल भुवनेश्‍वर जाने के कई रास्ते हैं। यहां जाने के लिए ट्रेन से काठगोदाम या टनकपुर जाना होगा। उसके आगे सड़क के रास्ते ही सफर करना होग। आप अल्मोड़ा से पहले गंगोलीहाट शेराघाट, या बागेश्‍वर, या दन्या होते जा सकते हैं। टनकपुर, पिथौरागढ़ से भी गंगोलीहाट जा सकते हैं। दिल्ली से बस द्वारा 350 कि.मी. यात्रा कर आप अल्मोड़ा पहुंच कर विश्राम कर सकते है और वहां से अगले दिन आगे की यात्रा जारी रख सकते हैं। रेलवे द्वारा यात्रा करनी हो तो काठगोदाम अन्तिम रेलवे स्टेशन है वहां से आपको बस या प्राइवेट वाहन बागेश्‍वर, अल्मोड़ा के लिए मिलते रहते हैं।

ये भी पढ़ें:  चलत मुसाफ़िर का Responsible Travel Campaign: "स्मृति वृक्ष' Smriti Vriksh

ये भी पढ़ें: https://www.chalatmusafir.com/bhatner-dur-kila-rajasthan/

Leave a Comment