कसोल के किसी निर्जन किनारे पर लिखा गया पार्वती नदी का नाद

पहाड़ी नदियों का वेग मुझे हमेशा से आकर्षित करता है। ये शहरों की नदियों की तरह पालतू नहीं होतीं। इनके जंगलीपन में अजब सा संगीत होता है। इनके किनारे बैठना रोमांचित करता है। यह रोमांच मन को उत्तेजित नहीं, शांत करता है। नदी जहां पत्थरों से टकराती है खास किस्म की ध्वनि पैदा करती है। ध्यान से सुनिए इस संगीत के सारे सुर ऊंचे है और गति द्रुत।

पानी का बहाव जब तक पत्थर को उसकी जगह से खिसका नहीं देता सरगम एक सी बनी रहती है। लेकिन जो पानी अभी-अभी मेरे पैरों से छूकर गुजरा क्या वह वैसा ही है, जैसा उसके पीछे आ रहा पानी। ग्लेशियर से यहां तक बहती आ रही धारा के किसी हिस्से से गांव की किसी महिला ने मटकी भरी होगी। थोड़ी सी नदी उसके छोटे से घर के कोने में रखी होगी। किसी यात्री ने अपनी बोतल भरी होगी। बैकपैक की साइट पॉकेट में फंसी हुई यह नदी अब दिल्ली या किसी और शहर पहुंच गई होगी।

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एक बच्ची ने नहाने के बाद नदी को तौलिए से पोछकर फैला दिया होगा। मटके में रखी नदी, दिल्ली तक पहुंच रही नदी और अरगनी पर सूख रही नदी का संगीत अलग है। यह बात और है कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौटने के बाद नदी को भूल जाते हैं, उसके संगीत को भी। ऑफिस से घर और घर से ऑफिस जाते वक्त हम उस मुरझाई सी नदी को देखते हैं, जिसका संगीत शहरों ने चूस लिया है। यह संगीत नदी की आत्मा है। नदी से उसकी आत्मा छीन लेना कितना भयावह है।

पहाड़ की नदी का ‘शोर’ तनाव नहीं देता है बल्कि शांत करता है। पानी की लागातार सुनाई देने वाला द्रुत गति का संगीत विचारों की गति को विलम्बित कर देता है। दुनिया के किसी संगीत का शायद ही मन पर इतना विपरीत असर होता हो। नदी के सर्द पानी में पांव लटकाए हुए मुझे पंडित जसराज याद आ रहे हैं। एक कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बतिया रहे थे। कहा-अच्छा संगीत वह नहीं है जिसे सुनने के बाद लोग तालियां बजाने लगें, अच्छा संगीत वह है जिसे सुन कर लोग तालियां बजाना भूल जाएं। नदी के संगीत पर शायद ही किसी ने ताली बजाई हो।

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ये बातें हमें लिख भेजी हैं सौरभ श्रीवास्तव ने। सौरभ पत्रकार हैं। जब खुद से खूब सारी बातें करनी होती है तो घूमने निकल जाते हैं। बकौल सौरभ, ‘यह फुटकर ट्रैवलॉग कोरा लेखन भर नहीं है। यह उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो किसी निर्जन स्थान पर मेरे भीतर बहुत आहिस्ते से शुरू होती है। यह उस जगह में घुलने-मिलने की शुरुआत जैसा है। ठीक उसी तरह जैसे हम कपड़े बदल कर, हाथ-पांव धोने के बाद खुद का घर में होना स्वीकार पाते हैं।’ 


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