चांदनी चौक में मिलने वाली बर्फी, जिससे तोड़ने के लिए पलंग का इस्तेमाल हुआ

पलंगतोड़ बर्फी सिर्फ दूध, खोया और चीनी से बनी मिठाई है। चांदनी चौक में गुरूद्वारे के पास है मोटे लाला की दुकान। यहीं मिलती है फेमस पलंगतोड़ बर्फी। खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है। पहली बार इसे तोड़ने के लिए पलंग का सहारा लेना पड़ा था, जिससे इसका नाम पलंगतोड़ मिठाई पड़ा।


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वो लोकसंगीत जो आज भी भारत, बांग्लादेश को एक कर सकता है

बाउल संगीत, बंगाल की आत्मा है। बाउल गायक ज्यादातर बंगाल के बोलपुर में पाए जाते हैं। शांतिनिकेतन भी बोलपुर में ही है। रवींद्रनाथ टैगोर भी बाउल के मुरीद थे। हर साल अपने घर पर होने वाली कवि सम्मेलन में बाउल गायकों जरूर बुलाया करते थे। बाउल को यूनेस्को ने खतरे में पड़ी विरासत की सूची में डाला है। इतनी महान कला के साधक मुफलिसी में जी रहे हैं। हम अपनी परंपराओं, कलाओं के प्रति इतना उदासीन कैसे हो सकते हैं? फिर लापरवाही के साथ ये भी कहते हैं, इस देश में रखा ही क्या है।


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टैगोर की कर्मभूमि ‘शांतिनिकेतन’ से घूमने से पहले जानें ये बातें

शांतिनेकतन पहुंच जाना, अपने आप में एक सपने के पूरे हो जाने सरीखा होता है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में बोलपुर इलाके में बसा है शांतिनिकेतन। शांतिनिकेतन जाकर हर कोई रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन को करीब से महसूस करना चाहता है, वो स्कूल देखना चाहता है जहां आज भी बच्चों को पेड़ों के नीचे पढ़ाया जाता है।

कई सारी ऐसी बातें हैं जो आपको वहां जाने से पहले जान लेनी चाहिए। यहां पर आपका गूगल देखे बिना सफर करने वाला दर्शनशास्त्र हानिकारक साबित हो सकता है।


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पुरानी दिल्ली की ये रंग-बिरंगी कुल्फियां नहीं खाईं अबतक तो जीवन व्यर्थ है आपका

अगर कोई बेहतरीन कुल्फियों की तलाश में हैं तो उसे एक बार पुरानी दिल्ली जरूर आना चाहिए। एक काम करिए आज ही चावड़ी बाजर मेट्रो स्टेशन पर उतर जाइए, वहां से पूछते-पाछते कूचापति राम गली में चले आइए। वहां पहुंचकर किसी से भी पूछ लीजिए, कुरेमल कुल्फी कहां मिलेगी। लोग आपको वहां तक खुद छोड़ आएंगे। सौ साल पुरानी इस दूकान में कुल्फी को फलों के अंदर ही जमाया जाता है। अनार,सेब,संतरा और शरीफा जैसे फलों वाली कुल्फी का लुफ्त उठा सकते हैं। ये बहुत स्वादिष्ट हैं और निःसंदेह हेल्दी भी।


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गंगा में चलने वाली पहली सोलर बोट

सोनू बनारस के गंगा घाट परर बोट चलाते हैं। उनका काम हैं पर्यटकों को घाट की सैर करवाना। अब आप सोच रहे होंगे कि हम ये सब क्यों बता रहे, इसमें खास क्या है। ऐसे तो सैकड़ों बोट चलाने हैं वहां पर। लेकिन सोनू कोई आम चालक नहीं हैं। उनके पास बानारस की पहली और इकलौती सोलर बोट। जिसमें बैठ कर गंगा की सैर का मजा दोगुना हो जाता है। जिसमें शोर न के बराबर होता है और पेट्रोल का धुआं भी नहीं होता। बाकी डीटेल वीडियो देखकर पाइए और वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करिए। साथ ही हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा।


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वो चीज, जिसे देखने के लिए विदेशियों की बनारस में लगती है तगड़ी भीड़

बनारस की वो चीज जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग खिंचे चले आते हैं

बनारस की गंगा आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। दुनियाभर से लोग बनारस के घाटों को देखने आते हैं। वैसे गंगा के कई घाटों पर आरती होती है लेकिन राजेन्द्र घाट पर होने वाली संध्या आरती बहुत शानदार होती है। आरती देखने के लिए देशी-विदेशी पर्यटकों के साथ वीवीआईपी, सेलिब्रेटीज भी आते हैं। आरती के शुरू होने से अंत होने तक एक अलौकिक वातावरण सा बंध जाता है। आरती खत्म होने पर लोग गंगा से एक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।


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गंगा-वरुणा के संगम पर बनी एक मजार, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं

बनारस में गंगा-घाटों के बारे में सबने बहुत सुना है। गंगा के पहले घाट ‘आदिकेशव’ के पास है चंदन सयैद की मजार। वहां आने वाले लोगों का मानना है  कि चंदन सयैद ने मजहब और मानवता के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी है। इस जगह के बारे में बहुत कम लोगों को ही जानकारी है। यहां जो जोड़ी कव्वाली गायी जाती है उसका तो जवाब नहीं। आवाज ऐसी कि रूह छू जाए। इस जुगलबंदी को सुनकर कई लोग तो अपने आंसू रोक ही नहीं पा रहे थे।


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गंगा को तो बचा लिया, वरुणा का क्या?

गंगा को स्वच्छ रखने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। सरकार नई योजनाएं भी ला रही है। उन योजनाओं पर कितना अमल होता है, किसे पता? गंगा को बचाने के लिए कई संस्थान भी लगे हुए हैं। पर उन नदियों का क्या जो गंगा को इतना विशाल बनाए रखने में सहायता करती है। वरुणा भी एक ऐसी ही नदी है। बनारस में गंगा के पहले घाट ‘आदिकेशव’ पर ही गंगा और वरुणा का मिलन देखने को मिलता है। गंगा तो दिखती है पर वरूणा कहीं भी नजर नहीं आती। वरुणा आपकी नजरों के सामने होगा और आप उसे पहचान नहीं पाएंगे। नाला समझकर आगे बढ़ जाएंगे।


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padmasambhav मंडी, हिमाचल प्रदेश

मंडी, हिमाचल प्रदेश: डरावने रास्ते, 8वीं सदी की एक गुफा

मंडी, हिमाचल प्रदेश | अगर आप रोमांच के खोजी हैं तो हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में जरूर आएं। मंडी में एक ऐसी जगह भी है जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं, एक रहस्यमयी बौद्ध गुफा। रेवाल्सर नगर पंचायत से कुछ ही दूरी पर है यह बौद्ध गुफा। यहां जाते वक्त लोगों के मन में एक अजीब सा डर बना रहता है। ज्यादातर लोग वहां जाने से कतराते हैं।

गुफा को और भी रहस्यमय बनाता है वहां तक जाने वाला रास्ता। कई लोग तो आधे रास्ते से ही वापस लौट आते हैं। लेकिन हम गए और स्टोरी भी की। वीडियो देखिए और सबको दिखाइए। और हां, सब्सक्राइब करना मत भूलिए हमारा यूट्यूब चैनल।


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उत्तर प्रदेश राज्य अपने में हर रंग समेटे हुए है। धार्मिक सद्भावना का एक रंग हमें देखने को मिला उन्नाव और रायबरेली के बीच में स्थित तकिया नाम की एक जगह में। वहां पर मोहब्बत शाह बाबा की मजार और सहस्त्र लिंगेश्वर मंदिर एक ही साथ एक ही जगह पर हैं। इन दोनों की मोहब्बत का जश्न है यहां पर लगने वाला मेला। हिंदू-मुस्लिम एकता और सदभाव का प्रतीक बन चुका तकिया मेला लोगों के लिए मिसाल है। यहां आने वाले हर वर्ग के लोग दोनों ही जगह दर्शन करने आते हैं। मेले में आया हर नागरिक पहले बाबा मोहब्बतशाह व उनके शिष्य न्यामतशाह की मजार पर चादर चढ़ाता है फिर सहस्त्र लिंगेश्वर महादेव मंदिर में पूजा अर्चना करता है।


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बनारस में होने वाली सूर्योदय आरती है भारत में सबसे अलग

बनारस में सूर्योदय की आरती अस्सी घाट पर होती है। यहां होने वाली आरती भारत में होने वाली सभी आरतियों से अलग है। यहां मंत्रोच्चारण लड़कियां करती है। पाणिनि कन्या महाविद्यालय की अध्यापिका इस आरती का नेतृत्व करती हैं। इन्हीं की निगरानी में सुबह का यज्ञ भी होता है। लड़कियों की मीठी आवाज से रोज सुबह सूर्य को आवाह्न दिया जाता है।


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बनारस की गलियों में बसा कोरियन कुजीन

बनारस में बनने वाले व्यंजनों को तो कई लोगों ने चखा ही होगा। पर ऐसे कई विदेशी कुजीन है जो बनारस में उतने ही लोकप्रिय हैं जितना की यहां का लिट्टी चोखा और ठंडई। गंगा घाट की गलियों में आपको कई रेस्टोरेंट मिल जाएंगे जहां आप कोरियाई खाने का मजा ले सकेंगे। इन रेस्टोरेंट को बनारस के ही लोग चला रहे हैं, जो कोरियन भाषा में भी बात करते हैं।


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लखनऊ आएं तो राहुल के ठेले पर आना न भूलें

लखनऊ के चौक पर जाइए। वहां से पास में ही है अकबरी गेट। तीन गलियां आगे जाकर मिलेगा आपको राहुल का ठेला। जहां आपकी नवाजिश की जाती है सात मसाले वाले गोल गप्पे से। हींग से लेकर सौंफ वाले मसालों के गोल गप्पे.. आहा! वैसे तो ये छोटा सा ठेला है पर यहां आने वाले ग्राहकों की कमी नहीं। चटोरपंथी का एक ही ईमान है और वो है मजेदार स्वाद।


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बोकारो

बोकारो: एक उद्योग नगरी जो रात के नौ बजते ही सो जाती है

झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस नई दिल्ली स्टेशन से 22 घंटे की यात्रा पूरी कर एक स्टेशन पर रुकती है। बाहर झांकने पर प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर पीले रंग का एक बड़ा से चौकोर बोर्ड दिखा। इस पर काले रंग से लिखा था बोकारो स्टील सिटी।