पचराई मंदिर: मध्यप्रदेश का वो मंदिर, जिसे कोई तोड़ न सका

पचराई के ये मंदिर संवत 1345 में बने थे। ऐसा वहां स्थित शिलालेख पर गुदा मिलता है। संवत और सन के बीच करीब 57 वर्ष का अंतर रहता है। उस हिसाब से इन मंदिरों की स्थापना सन 1288 के आसपास हुई। उसी दौरान जब पाड़ाशाह ने इस इलाके में कई मंदिरों की स्थापना कराई। पाड़ाशाह से जुड़ी किंवदंती आप थूबोन जी वाले ब्लॉग में पढ़ सकते हैं। आज यहां पचराई के मंदिर से जुड़ी किंवदंती एवं सत्यघटनाएं सुना रही हूं।

1288 ईस्वी के आसपास पचराई के इन मंदिरों की स्थापना हुई और खिलजी वंश की स्थापना का समय माना जाता है 1290 ईस्वी। अतः ये लगभग एक ही समय-काल की बात है। इस क्षेत्र के जितने भी प्राचीन जिन-मंदिर हैं वे किसी विशेष काल-खंड में खंडित किए गए। प्रतिमाओं के सिर-हाथ-पैर काटे गए। इस उत्पात का काल-खंड अकबर के बाद का बताया जाता है। जैसा कि कई जगह लिखा मिलता है कि औररंगजेब ने मंदिर तुड़वाए थे।

हालांकि कई बुद्धिजीवी यह भी कहते हैं कि बहुत से हिन्दू राजाओं ने अपने ही फायदों के लिए भी कई जगह के मंदिर तुड़वाए थे। सच क्या है कौन जाने। खैर यहां यह अहम नहीं कि मंदिर किसने तुड़वाए थे, अहम यह है कि जब हजारों की संख्या में जैन मूर्तियों को तोड़ा जा रहा था तब पचराई का यह मंदिर सुरक्षित कैसे बचा? इस मंदिर पर एक खरोंच भी कैसे नहीं आई?

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इस सुरक्षा का कारण बताया जाता है ‘भय’। किसी देवी या देवता का नहीं वरन डाकुओं का। पचराई जिस जगह स्थित है वह खनियाधाना (जिला शिवपुरी, मध्यप्रदेश) से करीब बीस किलोमीटर और ईसागढ़ (जिला अशोकनगर, मध्यप्रदेश) से करीब पच्चीस किलोमीटर है। यह स्थान घाटियों वाला है। घने जंगलों वाली दुर्गम घाटियां।

हाल-फिलहाल की दशा यह है कि वहां बढ़िया सरसराती रोड बन गई है लेकिन मेरी याददाश्त में भी एक समय ऐसा था जब पचराई के रास्ते पर बसों के लुट जाने की खबरें आती थीं। जब मैं खनियाधाना में पढ़ती थी तब वहां का इकलौता गर्ल्स स्कूल गांव से थोड़ा दूर मरघट के सामने पठार पर बना और अक्सर ही मेरे स्कूल की चपरासिन मुझे डराती थीं, “डाकू यहां आया तो तुझे ही उठाकर ले जाएगा, तू मैनेजर की बेटी है तुझसे माल मिलेगा”। खैर मैं तो बची रही लेकिन उस इलाके में रामबाबू का अच्छा-खासा डर रहता था।

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कई सौ वर्षों से पचराई के पास की वे घाटियां डाकुओं का अड्डा रहीं, ऐसा लोग बताते हैं। यही कारण रहा कि जब-जब शासकों द्वारा इन मंदिरों को तोड़ने की कोशिश की गई उनके सैनिकों को डाकुओं के भय से या परास्त होकर वापस लौटना पड़ा। निजी स्वार्थ के लिए ही सही, डाकुओं की वजह से ये मंदिर सुरक्षित बने रहे जबकि आसपास के लगभग सभी मंदिर खंडित हो चुके थे।

हमारी याद में शाम के समय कोई भी वाहन वहां से नहीं गुजरा करता था। पचराई के मंदिर में मेला भरता था और साल में एक बार वहां आसपास की सारी जनता एक साथ जाती थी। इसके अलावा कोई वहां दर्शन को भी नहीं जाता था। जाता भी था तो दिन में, समूह में। कोई पुजारी वहां नहीं टिकता था।

एक बार की बात बताते हैं कि पंडित चेतनलाल जी आत्मसाधना के लिए खनियाधाना छोड़कर पचराई रहने लगे। उनके रहने से डाकुओं को समस्या होने लगी। मंदिर का दालान ही डाकुओं के रहने की जगह थी। तब उन डाकुओं ने मंदिर के पुजारी के साथ मिलकर पंडित जी हत्या की। बाद में उन्हें पछतावा हुआ और उन्होंने पचराई पधारे एक मुनि के सामने इस शर्त पर आत्मसमर्पण किया कि उन्हें पुलिस को नहीं सौंपा जाएगा। ऐसा ही हुआ। उन डाकुओं को आत्मसमर्पण के बाद कहीं किसी जगह भूमि दे दी गई और उन्होंने खेती करके अपना बाकी जीवन बिताया।

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आज पचराई के ऊपर से भय के वे सभी बादल छंट चुके हैं। अब वहां एकल वाहनों को शाम के समय जाने में भी समस्या नहीं होती। आप कभी वहां जाएं तो इन मोहसिक्त प्रतिमाओं को जरूर देखें। गजब आकर्षण है। बस निहारते ही रहो।


चंदेरी के इस कोने के बारे में हमें लिख भेजा है अंकिता जैन ने। अंकिता हिंदी भाषा की लेखिका हैं। इनकी दो किताबें ‘ऐसी वैसी औरतें’, ‘मैं से मां तक’ काफी हिट रही हैं। एक गंभीर लेखिका होने के साथ-साथ अंकिता एक बेफिक्र यायावर भी हैं। देश-विदेश में तमाम लैंडमार्क ये अपने नाम के साथ मार्क कर चुकी हैं। अंकिता अपने जीवनसाथी के साथ वैदिक वाटिका नाम की एक जैविक प्रयोगशाला भी चलाती हैं, जहां पर दोनों साथ में कृषि के तरीकों में आधुनिक किंतु पर्यावरण के लिए अनुकूल प्रयोग करते रहते हैं। 


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