पुराने लखनऊ के एक किलोमीटर में ही कई सदियां जीती हैं

बचपन से यही सुन रखा था कि लखनऊ नवाब, कबाब और तहजीब का शहर है। हमें छुट्टियों में शहर की थोड़ी बहुत झलक देखने को मिलती थी पर हमारे लिए लखनऊ का मतलब सिर्फ भूलभुलैया, चिड़ियाघर और पार्क ही हुआ करते थे। बड़े हुए तो सेमेस्टर और कॉलेज के चक्कर में ऐसा उलझे कि तीन साल कब फुर्र हो गए, पता ही नही चला। इतने सालों में एक चीज सालती रही, वो थी लखनऊ को करीब से देख पाना।

सब्र का फल मीठा होता है, इस कहावत का मतलब लखनऊ आ कर ही पता चलता है। इतना सब कुछ है यहां कि एक जिंदगी कम है सब पता करने के लिए। हर ईंट कोई न कोई कहानी जरूर छुपाये हुए है। थोड़ी झलकियां, मेरे अपने चश्मे से पुराने लखनऊ की ।

चारबा (ऑटो वाले पूरा चारबाग बोलने की जहमत नही उठाते) से जब आप ऑटो लेकर चौक पहुचते हैं तो आपको कोई भी चीज पहले रोमांचित नही करती पर धीरे धीरे हर गली कोई न कोई रोमांच देती हुई चली जाती है ,लखनऊ की यही खासियत है शायद।

कुछ मीठा हो जाये

पुराना लखनऊ आपका स्वागत करता है निमिष से। इसे मक्खन मलाई भी कहते हैं। इसका हर एक निवाला नवाबी है। केसर के साथ घुली मक्खन मलाई बिना किसी मेहनत के मुंह में घुलते हुए कब अपने इश्क में गिरफ्तार कर लेती है आपको पता भी नही चलता। निमिष खाते-खाते ये बात आपके मन में जरूर आएगी। सामने एक दरवाजा दिखता है जिसे गोल दरवाजा कहते हैं और ये कहीं से भी गोल नजर नही आता। ये जगह नवाबो की पतंगबाजों की पसंदीदा जगह हुआ करती थी। यह दरवाजा ऊपर से देखने में अर्धगोलाकार है इसी वजह से इसे गोल दरवाजा कहते हैं। अंग्रेजो के जमाने में ये जगह राजनीति का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता थी।

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चिकेन नही चिकन

ये अंतर लखनऊ आकर ही पता चल सकता है। लखनऊ दुनिया की सबसे बेहतरीन चिकनकारी के लिए मशहूर है। पूरे इलाके में चिकन के कपड़ों की सैकड़ो दूकानें और कारखानें हैं। इतनी सादगी से अपनी कला का प्रदर्शन सिर्फ चिकनकारी और लखनऊ में ही देखा जा सकता है।

कबाब

काकोरी कबाब, सीक कबाब, गीलावटी कबाब, शामी कबाब, डोरा कबाब; ये तो लिस्ट की शुरुआत भर है, इतने तरह के कबाब शायद सिर्फ लखनऊ में ही मिल सकते हैं। इन सारे कबाबों का राजा है टुंडे कबाब ।इस कबाबों का ईजाद एक टुंडे खानसामे ने नवाब साहब के सारे दांत गिर जाने के बाद किया था। उन्हीं के नाम पर इसे टुंडे कबाब कहते हैं। गोल दरवाजे से होते हुए जब आप टुंडे कबाब खाने जाते हैं तो शायद ही आप पहली बार में सही दुकान पर रुकें इतनी मामूली लगती है ये दुकान। यहां आज भी कबाब पत्तों में ही पैक किये जाते हैं। शायद इसी सादगी की वजह से ही ये अपनी ऐतिहासिक विरासत को संभाले हुए है।

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टोला

जिन्हें हम मोहल्ला या कॉलोनी कहते हैं, पुराने लखनऊ में इसे टोला कहते हैं। बस थोड़ा सा फर्क है दोनों में; टोले में सिर्फ एक ही रास्ता होता है, जाने के लिए और सिर्फ एक आने के लिए। ये टोले भूलभुलैया से कम नहीं हैं, कभी भटक के जरूर देखिएगा। इन टोलों में घूमने पर आपको लगेगा कि आप किसी पहाड़ी इलाके में आ गए हैं। कई टोले बहुत ऊंचे और कुछ बहुत नीचे बसे हुए हैं। लोग बताते हैं, ये इस तरह टोलों का बसाया जाना भी एक रणनीति ही थी।

पान

इस दुकान का बोर्ड देख कर आप अनायास ही दुकान की ओर चल पड़ेंगे। पलंगतोड़ पान, बिरयानी पान, गुलबदन पान.. लगभग 50 तरह के पान मिलते हैं इस दुकान में । इनके नाम यूं ही नही रखे गए हैं, सबके पीछे कोई न कोई औषधीय गुण जरूर है। कोई नाम सबसे ज्यादा आकर्षित करता है तो वो है पलंगतोड़ पान, इसके नाम को लेकर आपका अंदाजा एकदम ठीक है!

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निमिष से शुरू हुआ सफर पान पर खत्म होता है पर ये सब 1 किलोमीटर के दायरे में ही हो गया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्यों लखनऊ को जानने के लिए एक जन्म कम है। इस शहर में डुबकी लगाते जाइए हर बार कोई न कोई मोती जरूर हाथ लगता रहेगा।

मुस्कुराते रहिये, लखनऊ आते रहिये!


आपकों लखनऊ के जायके से रू-ब-रू करवाने वाले शख्स हैं शशांक श्रीवास्तव। शशांक श्रीवास्तव दिल्ली यूनिवर्सिटी का पढ़ा लड़का है। साइंस को खूब सीरियसली लेता है। पढ़ना और पढ़ाना, दोनों ही बड़ा पसंद है। हिंदी उपन्यासों से खास दिल्लगी है। किताबें खूब बांटता है दोस्तों-यारों में लेकिन एक ही शिकायत रहती है कि वो कभी वापस नही मिलतीं। एक और प्यारा शौक है, दस्तरखान सजाने का, बड़ा रस लेकर मेहमाननवाजी करता है। अलग-अलग तरीके के व्यंजन ढूंढकर खाता है और खिलाता भी है। घूमना अच्छा लगता है। वही नफासत और नजाकत (नुक्ते खुद लगा लें) वाले शहर लखनऊ   से है।


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