तेज बर्फीली हवाओं से घिरा नाभीडांग

तेज बर्फीली हवाओं से घिरा नाभीडांग। मनमोहक वनस्पति को हम काफी नीचे छोड़ आए हैं। अब जो है वो गहरी काली चट्टानें हैं या झक्क सफेद बर्फ। उसके अलावा बुग्याल की चरी जा चुकी घास की कतरनें कुछ-कुछ जगहों पर हरा रंग फेरती हैं। तिब्बत कह लें या चीन, के साथ सरहद बनाता लिपुलेख दर्रा यहां से महज 14 किमी के पैदल रास्ते पर है। यहां कैलास मानसरोवर यात्रा के भारतीय हिस्से का अंतिम पड़ाव है। इसके बाद यात्रा लिपुलख दर्रे से गुजरती है और तिब्बत में प्रवेश करती है।

यहीं से दिखता है ठीक सामने एक विशाल पर्वत पर ‘ॐ’। ओम का विहंगम आकार! यह एकदम जबरदस्त है। कोई शक नहीं। बिल्कुल ओम। आश्चर्य, आपकी नजरों से चूने लगता है और दिमाग पहेलियां गढ़ने और बुझाने की जद्दोजहद में मशगूल हो जाता है।

प्रकृति की उपासना, बर्फ से बनी ओम की आकृति

भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मे कई धर्मों के लिए ‘ॐ’ एक पवित्र शब्द और ध्वनि है। इसके सटीक ऐतिहासिक साक्ष्यों का पता लगाना बहुत मुश्किल है कि यह शब्द कब और कैसे भारतीय जनमानस की चेतना के साथ जुड़ा होगा? या यह कि क्या हिंदू धार्मिक वांग्मय में इस पर्वत की नकल से ही ‘ॐ’ शब्द को जोड़ा गया या फिर यह वहां पहले आया और बाद में संयोग से इस पर्वत में भी दिखाई दिया और चमत्कार माना गया। बहरहाल आश्चर्य का प्रश्नवाचक आपकी निगाहों में तैरता रहता है।

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आइए! नाभीडांग में खड़े होकर अब हम ओम पर्वत से दाहिनी ओर अपनी निगाहें घुमाते हैं. अरे ये क्या? एक और दिलचस्प आकृति। फिर एक आश्चर्य! इस पहाड़ में तो जैसे यह तो कोई आदमी है! जैसे कोई सैनिक। रौबीली मूंछें और मोटा फौजी लबादा ओढ़े कोई सैनिक अफसर। और अगर आप मोटा रूसी सैन्य ओवरकोट पहने रूसी कम्युनिस्ट नेता स्टैलिन के उस मशहूर पोर्टेट से वाकिफ हैं तो आप तुरंत चहक उठेंगे, ‘अरे हां, यह तो वही है, सु/कु विख्यात स्टैलिन!’ अब इस पर्वत को आप ‘स्टैलिन पर्वत’ कह सकते हैं। चलिए रूसियों और कम्युनिस्टों से परहेज़ हो तो इसे एक भारतीय जाबांज सैनिक कह दीजिए जो कि चीनी सरहद पर आक्रमणकारियों से हमारे देश को बचाने के लिए तैनात खड़ा है। या फिर कुछ और ही ही कह दीजिए। यह सब आपकी कल्पनाओं पर निर्भर है।

एक पल को शायद यह ख्याल आपके दिमाग में आता भी हो लेकिन यह तय है कि हिमालय के इन विशाल पहाड़ों पर इन आकृतियों को किसी अमीर बादशाह ने मजलूम जनता से बेगारी करा कर नहीं तराशवाया है। प्रकृति की किन्हीं थपकियों/ थपेड़ों ने इस पहाड़ को इस तरह तराशा होगा और बर्फ के फाहे हर साल इसे और उभार देते हैं। धूप बर्फ पिघलाती है तो आकार धुंधलाता है लेकिन फिर बर्फ अपनी ड्यूटी करने आ धमकती है और ओम पर्वत अपने आकार के साथ फिर खिल उठता है। यही चक्र है।

हिमालय में गहरे उतरते, कठोर चट्टानों और बेतरतीब फैली बर्फ के बीच ऐसी अनगिनत संरचनाएं हैं, जिनमें आप अपनी कल्पनाओं को उड़ान भरने के लिए खुला छोड़ सकते हैं। आप कई बार इनमें अपनी जानी-पहचानी कुछ आकृतियों को खोज निकालते हैं और फिर आश्चर्यचकित होते हैं। हालांकि, यह केवल एक संयोग होता है, जैसे यहां, ‘ॐ’ पर्वत भी और स्टैलिन भी। हिमालय अपने इन खूबसूरत नजारों के साथ, धार्मिक और प्रकृतिप्रेमी दोनों ही किस्म के यात्रियों का स्वागत कर रहा है।

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चीन की सरहद की तरफ बढ़ती, उबड़-खाबड़ पगडंडियों में कई यात्राएं पसरी हुई हैं। उनकी कई कहानियां हैं। यहां नाभीडांग तक और वापस गुंजी लौटकर आदि कैलाश तक की हमारी इस यात्रा में भी कई और भी कहानियां हैं। कभी धीरे-धीरे खुलेंगी।

अभी इतना ही..


ये स्टोरी हमेंं लिख भेजी है रोहित जोशी ने। रोहित जोशी वो पत्रकार हैं जो बंद बंद कमरों में बैठकर सरोकारी पत्रकारिता की बातें भर नहीं करते। रोहित को बहना पसंद है, चलते रहना पसंद है। वो लोगों के बीच रहकर उनकी दिक्कतों को सबके सामने लाने में यकीन रखते हैं। पहाड़ से इनका मानो कई जन्मों का याराना हो। पहाड़ और जीवंतता इनके लिए एक ही शब्द हों।

 


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