अगर वीकेंड पर सुकून वाली जगह जाना है तो हरियाणा की मोरनी हिल्स हो आइए

खुला आसमान, खुशनुमा मौसम, खामोश सड़कें और घुप्प अंधेरा। रात के साढ़े तीन बजे जब नोएडा के सेक्टर-43 के बस स्टेशन पर उतरे तो हाल बिलकुल ऐसा ही था। दिल्ली से चल कर ऊपर पहाड़ों में जाने वाली बसें यहां कुछ देर के लिए रुकती हैं। साथ ही पहाड़ों से बह कर आ रही ठंडी हवाएं यहीं से होते हुए नीचे उतरती हैं। यहां पहुंचकर आपको मैदानों से ऊपर और पहाड़ों से थोड़े नीचे होने का अहसास होता है।

रात के अंधेरे में सुनसान सड़कों पर गाड़ियां कम ही दिखती हैं लेकिन जो दिखती हैं, उनकी रफ्तार इतनी होती है कि उन्हें भी देखना मुश्किल होता है। खैर, ये तो रही रात की बात। आधी रात में चंडीगढ़ पहुंचने बाद थकावट के कारण चुपचाप हम बिस्तर पर लंबे हो गए।

अगले दिन, सुबह की पहली अंगड़ाई के साथ हमने भी अपनी अंगड़ाई तोड़ी और पहाड़ों की ओर रुख किया। चंडीगढ़ में किसी से पहाड़ों की बात करो तो शायद उसकी भौहें तन जाएं कि कहां है पहाड़ ? बावजूद इसके शहर से तकरीबन 30 किलोमीटर की दूरी पर शानदार पहाड़ों का ऐसा नजारा है जिसे देखकर किसी की भी आंखें उलट जाएंगी। हालांकि यहां पहुंचने के लिए आपको चंडीगढ़ की सीमा खत्म करके हरियाणा में प्रवेश करना होगा।

मोरनी हिल्स

इस तरह से एक बिल्कुल ही अनापेक्षित स्थान पर बसे इन पहाड़ों के खूबसूरत सफर की शुरुआत हमने की। सुबह के वक्त यहां सड़कें बेहद शांत थीं। दिल्ली की तुलना में संडे और सैटरडे वाले ट्रैफिक से भी कम गाड़ियां चंडीगढ़ की रोड पर आम दिनों में नजर आ रही थीं। कुछ ही देर में हमने चंडीगढ़ को पीछे छोड़ते हुए हरियाणा के पंचकूला से होते हुए सामने नजर आ रही पहाड़ी का रास्ता पकड़ लिया।

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तकरीबन 25 किलोमीटर का घुमावदार रास्ता और दोनों तरफ हरियाली। मेरे साथ का दोस्त हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का रहने वाला था इसलिए पहाड़ियों से जुड़े छोटे-बड़े कई किस्से रास्ते भर हमारे साथ बांटते हुए आगे बढ़ रहा था। हर पहाड़ की अपनी अलग तरह की मिट्टी होती है, जो उसकी उम्र दर्शाती है। अब तक मुझे लगता था, सभी पहाड़ एक ही जैसे होते हैं। लेकिन इस दोस्त से पहाड़ों के बारे में कुछ नया जानने को मिला। उसने बताया कि किन कारणों से भूस्खलन जैसी समस्या पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही हैं।

1966 में बने इस खूबसूरत शहर को करीब से देखने के लिए इतना कुछ है। शायद ये बात यहां के स्थानीय लोगों के अलावा बहुत कम ही लोग जानते होंगे। ऊपर चढ़ते हुए बढ़ते प्रेशर की वजह से बीच-बीच में कान सुन्न होने जैसी फीलिंग भी आ रही थी। रास्ता संकरा और घुमावदार होने की वजह से आगे बढ़ते हुए पहाड़ी का नजारा और भी खूबसूरत होता जा रहा था। रास्ते में कई रिसॉर्ट भी दिखे जोे यहां घूमने वालों को रुकने की जगह देते हैं। बीच में एक जगह ताड़ के ढेरों पेड़ों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे दक्षिण भारत के मशहूर हिलस्टेशन ऊटी पहुंच गए हों। सफर के दौरान सड़क के किनारे बैठकर खूबसूरत शहर को इस पहाड़ी से देखना सुकून देता है।

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मौसम की बात की जाए तो यह शिमला से करीब होने की वजह से यहां ठंड बहुत होती है। शायद इसी वजह से सितंबर में भी शाम की हवाओं में ठंडक बढ़ गई थी। आगे बढ़ते हुए हमने रास्ते पर कई जगह रुककर इन पहाड़ों की खूबसूरती को आंखों में सोखने की कोशिश की क्योंकि मैदानों पर रहने वालाें के लिए पहाड़ों पर आने जैसी सुखद अनुभूति कुछ नहीं होती। दूर तक फैले हरे-भरे पहाड़ ऐसे नजर आते हैं जैसे किसी ऊबड़-खाबड़ जमीन को किसी ने हरी चादर ओढ़ा दी है और किसी को नहीं पता इस चादर के नीचे प्रकृति ने कितना कुछ छिपा रखा है।

सुकून वाली जगह- तित्तर ताल

मोरनी की इन पहाड़ियों पर चलने के बाद आगे हमें ‘तित्तर ताल’ तक पहुंचना था। यहां पहाड़ियों पर बना छोटा-सा ताल था, जिसे हरियाणा सरकार ने ‘टूरिस्ट स्पॉट’ के रूप में विकसित किया था। पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ते हुए इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था कि आखिर ये है कहां? किसी तरह रास्ते में मिलने वाले लोगों से पूछते हुए हमने रास्ता ढ़ूंढ़ा।

ढलान की तरफ बढ़ते हुए, तकरीबन 2 किलोमीटर चलने के बाद हम निश्चिंत हो चुके थे कि यही तित्तर ताल है। बाहर पार्किंग में गाड़ी लगाने के बाद, हमने अंदर प्रवेश किया। हरियाणा सरकार ने पहाड़ी पर बने इस ताल की खूबसूरती को भांपते हुए इसे शानदार पर्यटन स्थल में बदल दिया। बाहर खुले में बैठने की बेहतरीन व्यवस्था के साथ यहां अंदर भी बैठने की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ताल के किनारे पार्क और गार्डन बनाया गया है। तित्तर ताल के इस शानदार नजारे को देखकर यहां आने वालों की रास्ते भर की सारी थकान एक मिनट में छू-मंतर हो जाती है।

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थकान मिटाने के बाद अगर थोड़ी पेट पूजा करना चाहते थे, तो यहां उसकी भी अच्छी व्यवस्था है। ताल केे किनारे ही आप वेज और नॉन-वेज दोनों तरह के स्वादिष्ट खाना चख सकते हैं। चिकेन के शौकीन लोगों के लिए यहां का कढ़ाई और बटर चिकेन काफी अच्छा है। शहर से इतनी दूर बिना किसी शोर-शराबे और धूल धक्कड़ वाले माहौल में पहाड़ के इस कोने में सुखद एकांत का अहसास होता है।

खाना खाने के बाद टहलते हुए इस ताल किनारे कोई भी घूमने जा सकता है। ताल के किनारे बहती ठंडी-ठंडी हवा और पानी की अलग अलग धाराएं शांति का अहसास कराती हैं। यहां खड़े होकर अपनी ही लय में बहते पानी को देखना एक अनूठा अहसास है। पानी से ऊपर अगर एक बार आप नजर उठा के देखते हैं तो ये हिस्सा आपको चारों तरफ हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा नजर आएगा। कुछ समय ताल के किनारे घूमने-फिरने के बाद वापस हम उसी रास्ते से वापस घर की ओर लौट चले और इसके साथ ही इस खूबसूरत सफर का अंत हुआ।


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