मॉफलांग: मेघालय का वो पवित्र वन, जहां वनदेवता भेस बदलकर आते हैं!

सेक्रेड ग्रोव्स, यानी कि पवित्र उपवन। ये वो उपवन हैं, जहां मनुष्य का हस्तछेप शून्य होता है। ऐसे उपवनों में पेड़-पौधे और जीव-जंतु स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं के कारण संरक्षित रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि वन में देवता का निवास होता है और जंगल को किसी भी तरह की क्षति पहुंचाए जाने पर देवता क्रोधित हो जाते हैं।

भारत में करीब 7000 पवित्र उपवन हैं। इन्हीं में से एक है मेघालय में स्थित मॉफलांग पवित्र उपवन। राज्य की राजधानी शिलॉन्ग से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर मॉफलांग के पवित्र उपवन में बिना गाइड के जाना मना है। और हो भी क्यों न, जंगल इतना घना है कि बिना किसी मार्गदर्शन के इसमें खो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी। दूसरा कारण यह भी है कि गाइड यह बात सुनिश्चित करता है कि पर्यटक जंगल को किसी भी तरह का नुकसना न पहुंचाएं। यह गाइड मॉफलांग गांव की लिंगदोह प्रजाति का ही एक निवासी होता है। इसीलिए उनके साथ उपवन में जाना बहुत ज्ञानवर्धक और रोमांचक होता है।

उपवन में घुसते ही आपको लगेगा जैसे कि आप किसी अलग ही दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं। चारों तरफ बस हरियाली ही हरियाली। छोटे पौधे और कई सौ साल पुराने पेड़ों से लेकर पेड़ों की टहनियों और तनों पर उगते मॉस और फंगी देखते ही बनते हैं। गाइड ने हमें बताया कि इनमें से कुछ फंगी जहरीले भी होते हैं। अगला आकर्षण था रुद्राक्ष का 700 साल पुराना पेड़। जंगल में कई मेडिसिनल यानी कि औषधीय पौधे भी हैं। इतने लाभप्रद (खासकर के व्यापार की दृष्टि से) होने के बावजूद इस जंगल के किसी भी पेड़ को काटना, नुकसान पहुंचाना और यहां तक कि उनसे फल या फूल तोड़ना तक वर्जित है।

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करीब 15-20 मिनट चलने के बाद हमारा सामना हुआ कई सारे पत्थरों से, जो छोटे मोनोलिथ जैसे दिखाई पड़ते हैं। गाइड ने हमें बताया कि ये वह जगह है जहां जानवरों की बलि की विधि का सारा सामान लाके रखा जाता था और ये सुनिश्चित किया जाता था कि कुछ कमी न रह गयी हो। क्योंकि इस पॉइंट से आगे बढ़ने के बाद पीछे मुड़ना मना था तो असल में बलि दी कहां जाती थी? इसका जवाब हमें मिला, जब हम हाफ ट्रेक के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे। अमूमन बलि देने और पूजा की जगह पर हम कोई मंदिर या मूर्ति की अपेक्षा करेंगे। पर सेंग खासी, जो कि मेघालय के मूल निवासी हैं और जिन्होंने ईसाई धर्म नहीं अपनाया, मूर्ति पूजन में विश्वास नहीं करते।

यहां हमें देखने को मिली एक बड़ी चट्टान और उसके चारों तरफ छोटे और सपाट बड़े पत्थरों के समूह। इन पत्थरों के समूह को आल्टर कहा जाता है। यहां स्थानीय लिंगदोह समुदाय के बुजुर्ग बलि देकर वन देवता के प्रतीक इस चट्टान को समर्पित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर वन देवता प्रसन्न होते हैं तो वो तेंदुए के रूप में जंगल में दिखते हैं और अगर नाराज हो गए तो सांप के रूप में। हम कल्पना कर रहे थे कि इस पूरी विधि के समय यहां कैसा नजारा रहता होगा।

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सोच कर तो आये थे कि हाफ ट्रेक ही करेंगे। पर रोमांच इतना बढ़ता जा रहा था कि बिना ज्यादा कुछ सोचे गाइड को कहा कि अब ट्रेक पूरा कर ही लिया जाए। और सैक्रिफाइस पॉइंट को पीछे छोड़ फिर निकल पड़े, और कहानियों की खोज में। धीरे-धीरे जंगल घना होता जा रहा था। पक्षियों की आवाज, पैरों के नीचे सूखे टहनियों की चटकने की आवाज और अनगिनत झींगुरों का बैकग्राउंड कोरस। एक पल के लिए भी नहीं लगता कि असलियत में ये सब देख और महसूस कर रहे हैं। ये सब किसी रोमांचक मूवी के सेट से कम नहीं था।

वैसे तो मॉफलांग घूमने का सबसे अच्छा मौसम है सर्दियां, जब यहां बारिश कम होती है। पर बारिश के महीनों में यानि कि जुलाई, अगस्त में यहां आने का अलग ही आनंद है। जंगल में एक अलग ही किस्म की हरियाली देखने को मिलती है जो कई बार जादुई सी लगती है। वन के बीचों-बीच एक नहर भी है। ताजी बारिश होने की वजह से वो एक नई ऊर्जा के साथ बहती हुई नजर आई। पानी इतना साफ कि तल के सारे पत्थर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।

बारिश के कारण मिट्टी गीली और फिसलन भरी थी। इसीलिए एक नजर खूबसूरत दृश्य पर और एक नजर नीचे जमीन पर। ऐसा करना बहुत जरूरी है, वरना पता चला कि दृश्यों को देखते-देखते अगले पल आप फिसल कर जमीन पर गिरे हों। चलते समय रास्ते में कई उबड़-खाबड़ बड़े पत्थर और पेड़ों की टहनियां और सर्पेंटाइन जड़ें भी मिलती रहती हैं। उचित होगा कि आप यहां ट्रेक्किंग या स्पोर्ट्स शूज पहन कर आएं।

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मॉफलांग उपवन में फोटोग्राफी करने की अनुमति है। पर वीडियो बनाना प्रोत्साहित नहीं किया जाता। जंगल में घुसने से पहले ही आपको भिन्न तरह के ट्रेक्स का विकल्प दिया जाता है। आप हाफ और फुल ट्रेक में से एक चुन सकते हैं। यहां पर नाईट ट्रेक्स का भी आयोजन किया जाता है। पर यह आमतौर पर सर्दियों में होता है। रात में ट्रेक खत्म होने पे वहीं रहने का इंतजाम भी उपलब्ध कराया जाता है।

मेघालय आएं तो एक दिन मॉफलांग के इस अलौकिक अनुभव लिए जरूर रखें।


अपने देश की इस नायाब सी जगह के बारे में हमें लिख भेजा है अनुजा भारद्वाजन ने। अनुजा मनमोहक मुस्कान वाली एक लड़की हैं। घूमने का घणा शौक है छोरी को। बोलती हैं कि जब शहर का शोर-गुल इसका जीना मुहाल कर देते हैं तो ये पहाड़ों की ओर भाग जाती है। वहां जाकर खुद को तलाशती हैं, ढेर सारा ऑक्सीजन भरती हैं और फिर कहीं के लिए निकल देती हैं। 


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