माई साहिबा दरगाह: दिल्ली में शांति पाने की एक मंजिल

 

उस दिन रविवार था जब हमने कुतुब मीनार के पास संजय वन जाने का मन बनाया और किराए की साइकिल से मैं और मेरे दो मित्र संजय वन पहुंच गए। लेकिन मेरा मन रास्ते में अधचिनी गांव के पास पड़ी एक दरगाह पर अटक गया। मैं ऐसा लालयित था कि अगले दिन फिर से मेट्रो से साइकिल लेकर मैं सिर्फ और सिर्फ उस दरगाह को देखने गया।

माई साहिबा की दरगाह

दरअसल दिल्ली आने वाले हर बाशिंदे को हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के बारे में पूरी खबर रहती है, क्योंकि स्टेशन के नजदीक होने और जग प्रसिद्ध होने के कारण सभी लोग उसका रुख कर लेते हैं। लेकिन कम लोगों को मालूम है कि अधचिनी गांव से उनका रिश्ता उनके हजरत बनने से भी पुराना है। अधचिनी गांव में उनकी मां साहिबा और बहन की दरगाह है। आज भी उनके बहन की करीब 42वीं पीढ़ी के वंशज इस दरगाह की देख-रेख करते हैं।

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माई साहिबा की दरगाह जाने का रास्ता आसान है, जब आप अधचिनी से आईआईटी दिल्ली की ओर बढ़ेंगे तो बांयें हाथ पर एक पतली से गली पर एक बोर्ड टंगा है जिस पर लिखा है ‘हजरत निजामुद्दीन की माई साहिबा की दरगाह’। बस गली में घुस जाइये तो जैसे ही आप अंदर पहुंचेंगे तो आपके सामने एक बड़ा सा दालान पाएंगे और यहीं पर है दरगाह का द्वार।

हजरत निजामुद्दी का अधचिनी से जुड़ाव

मैं जब वहां पहुंचा तो दरगाह के ट्रस्टी सैयद आमिर अली निजामी से मेरी थोड़ी गुफ्तगू हुई। वो हजरत की बहन हजरत बीबी जैनब के वंशज हैं। उन्होंने मुझे बताया की जब हजरत निजामुद्दीन के वालिद का इंतकाल हो गया तो उनकी मां हजरत बीबी जुलेखां बाल-बच्चों समेत दिल्ली आ गईं और यहीं अधचिनी को अपनी रिहाइश बनाया। निजामुद्दीन यूं तो बदायूं के थे लेकिन उनकी शुरुआती शिक्षा अधचिनी में ही हुई। उसके बाद वो ग्यासपुर चले गए जिसे आज हम सभी निजामुद्दीन बस्ती के नाम से जानते हैं।

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निजामुद्दीन बाद में वहीं ग्यासपुर में बस गए लेकिन माई साहिबा यहीं रहीं। आज उनकी यहां मौजूद दरगाह करीब 800 साल पुरानी है। यहां एक मुफ्त डिस्पेंसरी भी चलती है, जहां मुख्य तौर पर यूनानी तरीके से इलाज होता है और शुक्रवार को लंगर भी होता है। मैं तो सलाह दूंगा कि एक बार आप भी इस जगह जरूर जाएं क्योंकि जहां एक तरफ निजामुद्दीन की दरगाह पर जायरीनों की संख्या ज्यादा होने और बाहर पूरा बाजार होने से काफी भीड़भाड़ हो जाती है, वहीं उसके उलट यहां पर एकदम शांति पसरी रहती है।

अब मैं तो साइकिल से गया था आप चाहें तो कोई और साधन भी ले सकते हैं, घूम कर आइए आपको यकीन नहीं होगा कि इतने व्यस्त रोड के नजदीक होने और भीड़भाड़ से भरे इलाके में होने के बावजूद इस दरगाह में इतनी शांति क्यों रहती है!


दिल्ली की इस कम प्रसिद्ध किंतु अद्भुत दरगाह के बारे में हमें लिख भेजा है शरद अग्रवाल ने। शरद पेशे से पत्रकार हैं। तमाम व्यस्तताओं के बावजूद शरद ने अपने अंदर यायावरी का कीड़ा मरने नहीं दिया है। मौका मिलते ही वो किसी नई जगह की ओर घूमने निकल जाते हैं। किसी दूसरे राज्य नहीं जा पाते तो दिल्ली में ही साइकिल उठाकर चक्कर लगाते रहते हैं। छुपे हुए बेमिसाल खानों, जगहों को ढूंढना और उनके बारे में लोगों को बताकर जागरूक करना इनके पसंदीदा कामों से एक है।


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