लाहौल: स्पीति घाटी का छोटा भाई, उतना ही सुंदर और मनमोहक

लाहौल | जिन्हें पहाड़ों, नदियों और झरनों से प्रेम होता है वो हिमाचल की सैर करने से अपने आप को नहीं रोक पाते। हिमाचल प्रदेश की एक सैर दिल में बसी घुमक्कड़ी की चिंगारी को शोला बना देती हैं। फिर हम कहने लगते हैं कि यार हमको तो इस घुमक्कड़ी से मोहब्बत हो गई है। घुमक्कड़ी से मोहब्बत करवा देने की हद तक खूबसूरत ऐसा ही हिमाचल का एक जिला है, लाहौल स्पीति।

लाहौल
लाहौल का एक दृश्य

यूं तो पूरा लाहौल स्पीति जिला बर्फ की चादर में लिपटे एक से बढ़ कर एक पर्यटन स्थलों, रोमांचक और दिलकश रास्तों के लिए जाना जाता है लेकिन एक टीस मेरे मन में हमेशा से रहती थी कि 95 प्रतिशत घुमक्कड़ लोग लाहौल स्पीति के स्पीति वाले हिस्से में ही जाते हैं, लाहौल वाले हिस्से को बिल्कुल इग्नोर कर दिया जाता है। इसलिए मैने तय किया कि मैं पहले लाहौल जाऊंगा, फिर लाहौल में मेरे एक दोस्त का घर भी था।

लाहौल की ओर

अक्टूबर शुरू हो चुका था, कुछ दिनों में ही हिमाचल के हाई एल्टीट्यूड वाले इलाकों में बर्फबारी की शुरुआत होने वाली थी। लाहौल जाने का फिलहाल एकमात्र रास्ता है जो रोहतांग दर्रे से होकर गुजरता है और रोहतांग दर्रा खुद ही अपने आप में काफी ऊंचाई पर है। रोहतांग दर्रे का एल्टीट्यूड है 13050 फीट, तो जाहिर है कि कुछ ही दिनों में बर्फबारी दस्तक देने वाली थी।

अगर बर्फबारी की वजह से एकबार ये रास्ता बंद हो जाए तो सीधा अगले साल की गर्मियों में ही खुलता है। इसी बीच 4 अक्टूबर को रात के 10 से 11 बजे के बीच में, मैं अगले 5 दिनों की लाहौल यात्रा पर निकल पड़ा। जाते समय ज्यादा कुछ तय नहीं था कि कहां-कहां विजिट करना है, इसके पीछे का कारण ये था कि ऑनलाइन यहां के बारे में ज्यादा कुछ मौजूद नहीं था।लाहौलअगली सुबह तड़के ही चंडीगढ़ पहुंचा और फिर अगली शाम तक मनाली पहुंच गया। ये सफर भी काफी खूबसूरत होता है, चंडीगढ़ से मनाली का सफर अगर दिन में हो, इसका अलग ही अंदाज होता है। हमारी बस कभी नदी के साथ-साथ चलती तो कभी पहाड़ों के छोर पर। मनाली पहुंचने से पहले ही मैने ओल्ड मनाली में ऑर्चड हाउस नाम से बैकपैकर्स के लिए स्पेशली बने हॉस्टल का एक बेड बुक कर लिया था।
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थोड़ी देर मनाली के मॉल रोड पर कुछ घूमने फिरने और थोड़ी बहुत खरीददारी के बाद एक ऑटो लेकर मैं रात के आठ बजे के आस-पास हॉस्टल पहुंच गया, ये हॉस्टल कैफे 1947 के नजदीक ही था। पिछले 18 घंटे से लगातार सफर करने की वजह से काफी थकान महसूस हो रही थी, रात को डिनर कर जल्दी ही सो गया ताकि अगली सुबह को चार बजे उठ पाऊं क्योंकि सुबह 5.30 बजे मनाली से लाहौल जाने वाली बस पकड़नी थी। लाहौलसुबह के 4.40 बजे के आसपास मैं एकदम फ्रेश होकर हास्टल से निकल कर बस अड्डे की तरफ पैदल ही चल पड़ा था, ये रास्ता लगभग 2 किमी. के आसपास का था शायद। इतनी सुबह में एकदम शान्ति होती है, साफ और हल्की हल्की ठंडी हवाओं के बीच पैदल चलना एक अलग लेवल की खुशी देता है।
पैदल चलने का एक फायदा और था कि थोड़ा वर्कआउट हो गया औऱ थोड़ी ठंड भी भाग गई। लाहौल स्पीति का मुख्यालय केलांग है और मुझे केलांग जाने वाली बस पकड़नी थी। 5.10 के आसपास बस अड्डे पहुंच गया था और 5.40 के आसपास निकल पड़ा था एक बेहद ही रोमांचक और खूबसूरत सफर के लिए।

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लाहौल से थोड़ा और पास

इस सफर के लिए मैने काफी इंतजार किया था, 13050 फीट के एल्टीट्यूड वाले इस रोहतांग पास से गुजरना ही अपने आप में एक मुकम्मल घुमक्कड़ी होती है। लगभग साल भर कई फीट बर्फ से ढके रोहतांग पर हर दिन हजारों सैलानी आते हैं। मैने अब तक बर्फ की चादर में लिपटे पहाड़ों को इतने नजदीक से नहीं देखा था, बस अभी निकली ही थी कि मन में उछलकूद मचना शुरू हो गई। खिड़की से बाहर झांकती मेरी नजरें पहाड़ों पर ही टिकी थीं।लाहौल

लगातार एक ही तरफ देखते रहने से गर्दन में दर्द होने लगा पर नजरें थीं की पहाड़ों से हट ही नहीं रहीं थीं। अभी आसमान में थोड़ी लालिमा आना शुरु हो रही थी और हम एक ढाबे पर रुककर नाश्ता कर रहे थे। वहां से दो पहाड़ों के बीच से गुलजार लालिमा को देखना काफी सुकून दे रहा था। बस आगे बढ़ी तो पता चला कि असल चढ़ाई तो अब शुरू हुई है।

पहाड़ियों की कोर पर बने वो घुमावदार रास्ते जिनके न जाने कितने वीडियोज मैने यूट्यूब पर देखे थे, अब शुरू हो चुके थे। हरियाली से भरपूर तमाम प्रदूषणों से मुक्त पहाड़ों से गुजरती सड़क पर चल रही बस में बैठकर जो मजा आपको आता है, वो शायद ही किसी और सफर में आता हो।

धीरे-धीरे हम काफी ऊपर आ चुके थे अब सूरज देवता भी अपनी फुल एनर्जी के साथ आसमान में छा चुके थे। अब मेरी नजरों के साथ-साथ हाथ की उंगलियां भी काम लग गई थी और मैं तस्वीरें उतारने में व्यस्त हो गया।लाहौल

धौलाधार रेंज की पहाड़ियों के इतने प्यारे प्यारे दृश्य सामने गुजर रहे थे कि फोटोग्राफी बंद करने का मन ही नहीं हो रहा था। हालांकि पहाड़ी सड़क पर चल रही बस में बैठकर तस्वीरें उतारना आसान नहीं होता लेकिन जब जुनून हो तो आप थोड़ा बहुत रिस्क भी ले लेते हैं।

लाहौल जितने ही सुंदर ये रास्ते

हरियाली वाले पहाड़ों और तमाम झरनों को पीछे छोड़ते हुए हम इतने ऊपर आ गए थे कि वहां न तो कोई पेड़ नहीं था और न ही हरियाली। फिर रोड के किनारे कहीं कहीं बर्फ दिखने लगी। बर्फ के साथ साथ ठंड भी लगातार बढ़ रही थी लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं आई। अगले 15-20 मिनट बाद तो हमारी बस बर्फ की एक पतली चादर पर चल रही थी और बढ़ते सफर के साथ वो चादर मोटी होती जा रही थी।
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मेरा मन कर रहा था कि बस यहीं रुक जाए और मैं थोड़ी देर के लिए बस से बाहर निकलकर इसको शान्ति से महसूस कर पाऊ। उस बर्फ की चादर पर दौड़ लगा सकूं, बर्फ को छू सकूं और उसको हवा में उछाल सकूं। इधर मैंने ईश्वर से प्रार्थना की और उधर बस रुक गई।लाहौलहमारे सामने गाड़ियों की बहुत लम्बी कतार थी, पता चला कि सड़क पर जमी बर्फ काफी कठोर हो गई है और कठोर बर्फ पर गाड़ी चलेगी तो स्लिप होने का खतरा रहेगा। इसलिए कुछ देर तक सूरज देवता को अपनी कृपा करके इस बर्फ को पिघलाने का मौका दिया गया है।लाहौल

फिर क्या, मुझे मौका मिल गया और मैं झट से बस से बाहर निकल गया। बाहर निकलते ही महसूस हुआ कि ठंड किसको कहते हैं! इतनी ठंड मैने पूरी जिंदगी में नहीं महसूस की थी, टेम्पेरचर 1 या 2 डिग्री सेल्सियस के आसपास था। हवाओं की तो बात ही मत पूछिए, असली कहर तो उन हवाओं का ही था। मैं बुरी तरह से कांपने लगा, कोई चार पांच मिनट बाहर रहने के बाद मैं फटाफट बस में आया और गर्म कपड़ों की एक लेयर और चढ़ा लिया।लाहौल

अबकी बार पूरी तैयारी से बाहर आया, मैं खुशी के मारे बर्फ की पतली सी चादर फर उछल रहा था, प्लेन पड़े बर्फ पर अपने कदमों के निशान बना रहा था। पहाड़ों की बर्फ को पहली बार छूना एक अलग ही एहसास था।

एक बार फोटोज क्लिक करने का सिलसिला शुरू हुआ तो काफी देर चला। अपने युट्यूब चैनल के लिए वीडियोज भी शूट किए और अंत में चुपचाप बस की ओट में सड़क के किनारे एक पत्थर पर से बर्फ झाड़कर बैठ गया। जितनी दूर तक देख सकता था उतनी दूर तक पहाड़ ही पहाड़, हरियाली ही हरियाली और बर्फ ही बर्फ। लगा जीवन में इससे खूबसूरत पल क्या ही होगा! लाहौल

तकरीबन 45 मिनट रुकने के बाद हमारी बस फिर से चल पड़ी थी, अगले दो-तीन मिनट में हम रोहतांग के एकदम टॉप पर पहुंच गए और फिर उतरने का सिलसिला शुरु हुआ। फिर से वही घुमावदार सड़कें, धीरे-धीरे करके बस नीचे आ रही थी और मैं कभी खिड़की खोलकर ठंडी हवा का मजा लेता तो कभी उन दिलकश पहाड़ों को कैमरे में कैद करता। पूरे एक घंटे उतरने के बाद हम पहुंचे खोकसर।लाहौल

और लाहौल में हुई एंट्री

रोहतांग पास को पार करने के साथ ही हिमाचल के लाहौल-स्पीति जिले की शुरुआत होती और इस नए जिले के साथ ही एक नई दुनिया भी शुरु होती है। इस दुनिया का तापमान, जलवायु, खान-पान, बोली-भाषा और संस्कृति आदि बाकी हिमाचल से काफी जुदा है और इसका एन्ट्री प्वाइंट है, खोकसर। यहां पर बस लगभग 20-25 मिनट तक रुकी, यहां पर पराठा और चाय वगैरह मिल जाता है।

रोहतांग को बिना किसी दिक्कत के पार कर पाना ही किसी विजय से कम नहीं लग रहा था, ये जितना खूबसूरत है, उतना खतरनाक भी है। खैर, लगभग पिछले चार घंटे से उतार-चढ़ाव वाली सड़क पर चलने से मुक्ति मिली। खोकसर से ही चंद्रा नदी का साथ मिलता, अब आगे का पूरा सफर इस नदी के साथ ही तय होना था जोकि काफी ठीक-ठाक रहा।लाहौल

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गंगा यमुना जैसी नदियाों का मटमैला पानी देखने को आदी हो चुकी मेरी आंखें पहली बार एकदम साफ और कुछ नीला सा रंग लिए किसी नदी को देख रही थीं। अब सफर खत्म होने को था, मेरी मंजिल आने वाली थी लेकिन दिक्कत ये थी कि फोन में नेटवर्क पिछले पांच घंटे से गायब था। मंजिल के नाम पर मुझे बस इतना पता था कि केलांग से 20-25 किमी पहले ही मनाली लेह हाइवे के किनारे ही रालिंग नाम का एक छोटा से गांव है और वहीं जाना है मुझे।लाहौल

कंडक्टर पहले ही हांथ खड़े कर चुका था कि उसको इस गांव के बारे में कोई आइडिया नहीं है, मैं लगातार बाहर देख रहा था कि कहीं कोई साइन बोर्ड वगैरह दिख जाए, अभी 25-30 मिनट हुए होंगे कि अचानक एक मोड़ पर मुझे अपना दोस्त दिख गया। मैं जोर से चिल्लाया, निखिल…..। वो मेरी बस के पीछे भागा और बस रुकी तो फटाफट मैं अपना सारा सामान समेटकर नीचे उतर गया।

लाहौल वाला मेरा प्यारा दोस्त

अब इत्तेफाक़ देखिए कि निखिल एकदम ठीक समय पर रोड पर ही खड़ा था। याद आता है कि निखिल को गले लगाते समय मैं बहुत खुश था, न जाने किस बात की खुशी थी, बिना कोई परेशानी झेले मंजिल तक पंहुच जाने की या लगभग डेढ़ साल बाद निखिल से मुलाकात करने की, वो भी उसके गांव में, शायद दोनों की खुशी थी। जो भी हो, अगर निखिल एकदम सही समय पर ना मिलता तो मैं कम से कम दस किमी तो आगे बढ़ ही जाता।

अब मिलेंगे, इस सफर अगले भाग के साथ। अगले भाग में निखिल के घर, गांव, संस्कृति और चंद्रा नदी से मुलाकात होगी। आपको ये जानकर शायद थोड़ी सी हैरानी हो कि यहां मेहमानों का स्वागत एक खास तरह की शराब से किया जाता।

इस यात्रा का वीडियो यहां देखें:


ये अनुभव हमें लिख भेजा है मनीष साहू ने। लाहौल यात्रा का ये पहला भाग है। मनीष ने इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। पेशे से कंटेंट राइटर और कॉपी एडिटर हैं। मनीष बताते हैं, घुमक्कड़ी के साथ ही फोटोग्राफी में खासी दिलचस्पी रखता हूं। एक दो-महीने काम करने के बाद एक लॉन्ग डिस्टेंस ट्रिप की सख्त जरूरत पड़ती है।


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