खजुहाः मुगलिया बारादरी-युक्त चारबाग शैली की आखिरी निशानी

खजुहा | मुगल शासकों ने युद्ध में विजय के हर्ष और हत्याओं-दर-हत्याओं के उपरान्त उपजे शोक दोनों ही स्थायी भावों में सर्जना के फूल खिलाये। ये इतिहास गवाह है कि मुगलों के स्थापत्य की उपादेयता रही है। इनका जन सरोकार ऐसा रहा है कि ये आज भी उपादेय हैं। हकीकत में देखें तो उनके स्थापत्य के तत्कालीन स्वरूप को यथावत बनाए रखने तक में हमारा आज नाकाम है। वैसा प्रतिरूप या अभिनव सर्जना की तो बात ही छोड़िये। ऐसे में हम मुगलों के स्थापत्य पर निर्विवाद रूप से गर्व कर सकते हैं।

बहरहाल, आज हम आपको मुगलों के एक विशिष्ट स्थापत्य शैली के बारे में न सिर्फ बताएंगे; बल्कि उसकी नवीनतम या आखिरी निशानी के पास तक की यात्रा भी कराएंगें। तो चलिए, सबसे पहले जानते हैं उस शैली के बारे में जिसे मुगलों की बारादरी-युक्त चारबाग निर्माण शैली कहते हैं।

खजुहा
खजुहा में मुगलों की बारादरी-युक्त चारबाग निर्माण शैली

जी हां, आपको बता दें कि मुगल बादशाह बाबर (1526-70) ने बारादरी युक्त बाग निर्माण की परंपरा आरम्भ की थी। इन्हें चारबाग कहा जाता है। कहीं-कहीं इन्हें बाग बादशाही के रूप में भी पहचाना जाता है। चारबाग के बारे में और अधिक जानने के लिए बेहतर होगा कि आप किसी बाग बादशाही में घूम कर आइए। यहा हम आपको मुगल बादशाह बाबर द्वारा आरम्भ की गई बारादरी युक्त बाग निर्माण की परंपरा के नवीनतम या आधुनिकतम अर्थात अन्तिम चरण का प्रतिनिधित्व करने वाले खजुहा की बाग बादशाही और औरंगजेब की पवेलियन घुमाने ले चलते हैं। यहां किसी भी मौसम में जाया जा सकता है।

औरंगजेब द्वारा निर्मित खजुहा की बाग बादशाही मुगलिया बारादरी-युक्त चारबाग परंपरा की आखिरी निशानी है। यहां औरंगजेब की पवेलियन भी है, जो अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा पूरी तरह संरक्षित है। यात्रा के दृष्टिकोंण से यहां पहुंचना बेहद सुगम है और सस्ता भी। इसके लिए आप नई दिल्ली से कानपुर जाने वाली किसी भी एक्प्रेस या सुपरफास्ट ट्रेन की यात्रा करके कानपुर पहुंच सकते हैं। दिल्ली से कानपुर जाने के लिए आप अपनी निजी कार अथवा आनन्द विहार आईएसबीटी से उत्तर प्रदेश परिवहन की बस से भी यात्रा कर सकते हैं। जीटी रोड होते हुए सुगम मार्ग से आप आसानी से कानपुर पहुंच गये हैं।

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अब कानपुर से प्रयागराज की ओर अपनी कार अथवा उत्तर प्रदेश परिवहन से यात्रा करनी होगी। यदि आप नई दिल्ली से कानपुर तक रेलयात्रा करके आये हैं, तो भी आपको अब आगे की यात्रा बस द्वारा या अपने निजी वाहन से करनी होगी। इसके लिए कानपुर के झकरकट्टी बस अड्डे से हर आधे घण्टे में बसें मिलती हैं। कानपुर से पश्चिम प्रयागराज की ओर आगे बढ़ने पर आपको चौडगरा आना होगा। यह कानपुर से सटा उत्तर प्रदेश का फतेहपुर जनपद है। कानपुर से चौडगरा की अधिकतम दूरी करीब 50 किलोमीटर है।

अब चौडगरा से दक्षिण दिशा में करीब 10-12 किलोमीटर की यात्रा करके आप इस फतेहपुर जिला की तहसील बिन्दकी पहुंचेंगे। बिन्दकी चौक से पश्चिम खजुहा रोड है। खजुहा रोड पर है- कोतवाली बिन्दकी। कोतवाली के बगल में श्रीराधे स्वीट्स एण्ड बेकर्स में रुककर आप यहां की बेहतरीन और यूनिक डिश ‘बेबी कॉर्न क्रिस्पी’ का मजा लेकर आगे बढ़ें तो आगे की यात्रा ऊर्जा से भर जाएगी।

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बेबी कॉर्न क्रिस्पी

अब यहां से मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर ही है कस्बा खजुहा, जहां औरंगजेब की पवेलियन और बाग़ बादशाही का आपको विजिट करना है। बिन्दकी चौराहे से खुजहा रोड पर चलने पर कस्बा खजुहा के एंट्रेन्स पर दाहिनी ओर है बाग बादशाही और औरंगज़ेब की पवेलियन।

बिन्दकी चौराहे से खजुहा की ओर बढ़ने पर जिस रोड पर हम चलते हैं, यह ऐतिहासिक मुगल रोड है, जो 11-12वीं शताब्दी में कड़ा से कन्नौज के मार्ग को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग हुआ करता था। इस मार्ग पर अलग-अलग कालखण्डों के विभिन्न शासकों की तमाम छावनियां, पवेलियन और सराय हुआ करते थे। इन्हीं में से एक यह औरंगजेब की पवेलियन भी है।

पुनश्च, मुगल शासकों ने युद्ध में विजय के हर्ष और हत्याओं-दर-हत्याओं के उपरान्त उपजे शोक दोनों ही स्थायी भावों में सर्जना के फूल खिलाये। तो यहाँ औरंगजेब के समय खजुहा में निर्मित बाग बादशाही हत्या के उपरान्त की सर्जना का प्रमाण है। इस प्रकार, प्रचीन मुगल मार्ग पर स्थित उत्तर प्रदेश के जनपद फतेहपुर का यह क़स्बा खजुहा, मुगल बादशाह शाहजहां (1627-58) के दो पुत्रों, औरंगजेब और शाहशुजा के मध्य 5 जनवरी, 1659 ई. को उत्तराधिकार के लिए हुए निर्णायक युद्ध के कारण मध्यकालीन इतिहास में विशेष स्थान रखता है। इस निर्णायक युद्ध में शाहशुजा की हत्या के पश्चात औरंगजेब की विजय हुयी थी।

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औरंगजेब की इस विजय के पश्चात वह लगभग एक सप्ताह तक खजुहा में रुका रहा। उसने अपनी विजय की स्मृति में इस स्थान का नाम औरंगाबाद रख दिया और बारादरी युक्त चारबाग, मस्जिद एवं कारवां सराय का निर्माण करवाया। ब्रिटिश काल में भी इस स्थान का विशेष महत्व रहा, क्योंकि ब्रिटिशकाल में खजुहा नील के संवर्धन के उपयोग में लाया गया था।

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खजुहा की बाग़ बादशाही में उत्तर-पूर्वी कोने पर बना सुन्दर छतरी से सुसज्जित बुर्ज

खैर, यदि बात करें मुगल बादशाह बाबर द्वारा आरम्भ की गई बारादरी युक्त बाग निर्माण की परंपरा के अन्तिम चरण का प्रतिनिधित्व करने वाले खजुहा की बाग बादशाही की तो चहारदीवारी से युक्त यह बाग मुगल चारबाग शैली का एक बेहद सुन्दर नमूना है। यहां की चहारदीवारी के कोनों पर सुन्दर छतरियों से सुसज्जित बुर्ज हैं, जबकि पश्चिमी दीवार के मध्य स्थित चौपहल भव्य दुमंजिला दरवाजा खजुहा कस्बे की ओर खुलता है। इसके ऐवान में गचकारी के माध्यम से बने ज्यामितीय अलंकरणों को नीले और हरे रंगों से सजाया गया है।

चारबाग की उत्तरी दीवार से लगी हुयी तीन बावलियां बनाई गई हैं, जिनका उपयोग चारबाग में जल आपूर्ति के लिए होता था। बाग के मध्य में एक बावली एवं हौज है, जिससे जल चारों ओर नहरों जैसी बड़ी-बड़ी नालियों के माध्यम से बाग़ में पहुँचाया जाता था। नहरों जैसी नालियों के अवशेष अब विद्यमान नहीं रह गये हैं।

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खजुहा की बाग बादशाही के मध्य में बना हौज

बाग़ बादशाही के पूर्वी भाग में दो सोपानों में निर्मित लगभग तीन मीटर ऊंचे भव्य चबूतरे के ऊपर भी अलग से दो बारादरियां निर्मित की गयी हैं, जो देखने में आलीशान लगती हैं। इन दोनों बारादरियों के मध्य में एक खूबसूरत हौज है। इस हौज का जल चबूतरे पर स्थित नालियों के माध्यम से अलंकृत पुश्त-ए-माही के ऊपर से होकर चारबाग की ओर जाता था।

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खजुहा की बाग़ बादशाही के अलंकरण का एक नमूना

पूर्वी बारादरी तो निहायत खूबसूरत और अलंकृत है। इसमें बंगला छत है। इसके मुख्य हाल से खजुहा के शाही तालाब का मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता था। यद्यपि पूर्वी बारादरी की छत बंगला है तो वहीं, पश्चिमी बारादरी की छत एकदम सपाट है। बारादरियों में मुख्य हाल के अतिरिक्त दोनों ओर कमरों की भी व्यवस्था की गई है। इन कमरों का उपयोग बाग की रखवाली में लगे अधिकारियों और कभी-कभी अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था के लिए उपयोग में लाये जाते थे।

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भव्य चबूतरे के ऊपर दोनों बारादरियों के मध्य में बना खूबसूरत हौज तथा बाग की पूर्वी बारादरी पर बना बंगला छत से युक्त भवन

तो इस प्रकार, मुग़लिया बारादरी-युक्त चारबाग शैली हमें आकर्षित करती है। लेकिन  जहां एक तरफ फतेहपुर के खजुहा स्थित मुगलिया बारादरी-युक्त चारबाग परंपरा की आखिरी निशानी हमें लुभाती है, तो वहीं यह एक दुश्वारियों का भी मारा हुआ लगता है। जी हां, हम उस वक्त चौंक उठे जब हम बाग बादशाही के मध्य में स्थित बावली एवं हौज को देखने पहुंचे। वहां पहुंचने पर एक अधेड़ उम्र की औरत और अपने कानों में इयरफोन लगाकर कहीं बातों में मशगूल एक नौजवान लड़की हमें दिखाई पड़े। बावली से सटी एक कुरिया के सामने पड़े सूखे-कटे पेड़ की धन्नी पर बैठी वो औरत खुद को राजेन्द्र सिंह कछवाह की पत्नी बताती है।

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बाग के मध्य में बनी बावली से सटी कुरिया के सामने पड़े सूखे-कटे पेड़ की धन्नी पर बैठी राजेन्द्र सिंह कछवाह की पत्नी और पुत्री

अपने पति राजेन्द्र के बारे में उसने बताया कि वो बिन्दकी एसडीएम के अर्दली या पेशकार हैं। इयरफोन लगाकर बात कर रही नौजवान लड़की उनकी बेटी है। अंत में उसने जो कहा वो यक़ीनन हैरान करने वाला था। उसने बताया बाग के मध्य में स्थित हौज और बावली पर उनका मालिकाना हक है। सचमुच बाग़ के मध्य में बनी बावली पर निजी नलकूप लगा है।

इतना ही नहीं, आज खजुहा की इस बाग बादशाही में बाग के नाम पर शायद ही कोई पेड़ लगा है। यहां तो सपाट ज़मीन है, जिस पर हमें जुते हुए खेत दिखाई दिये। राजेन्द्र कछवाह की पत्नी ने हमें बताया कि इस बाग़ के भीतर आज खेतनुमा दिख रही जमीन पर कुल आठ लोगों का कब्ज़ा है।

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खजुहा की बाग बादशाही के भीतर नदारद पेड़ व बाग तथा खाली सपाट पड़ी जमीन व खेत

खजुहाइस अहम ऐतिहासिक स्थल के बारे में हमें लिख भेजा है अमित राजपूत ने। अमित पत्रकार और लेखक हैं। इनकी लिखी हुई किताबें, ‘अंतर्वेद प्रवर’ और ‘आरोपित एकांत’ काफी सराही जा रही हैं। अमित राजपूत, देसी मिजाज के सख्त इंसान हैं। सख्ती से हमारा मतलब, इनका अपनी तरह के इलाहाबादी अभिजात्यपना से है। इनको इलाहाबाद से बहुत प्रेम है। इनकी फेसबुक प्रोफाइल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फोटुओं से भरी रहती हैं।


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