कश्मीरः इस नाम से ही लोग खूबसूरती का नहीं, खतरे का अंदेशा लगा लेते हैं

मैं लोगों से मिलना चाहती हूं। नए लोगों से मिलना, उनकी लाइफ स्टाइल को जानना, बातें करना तो मुझे बचपन से ही पसंद है। लेकिन लोगों को जानने के लिए घूमना पड़ेगा। घूमना और दुनिया को देखने की बात हाल-फिलहाल मेरे अंदर आई है। अब मुझे दुनिया की खूबसूरती नहीं देखनी, मुझे वो देखना है जिसमें लोगों की दिलचस्पी कम होती है।

उदाहरण के लिए समझिए कि जैसे आपको कश्मीर टूरिस्ट की तरह जाना है, वहां की खूबसूरती तो देखनी है लेकिन वहां के लोगों के बारे में या लोकल लाइफ के बारे में जानने की इच्छा बहुत कम लोगों को होती है। लेकिन मेरी दिलचस्पी इन्हीं में है और हां, कश्मीर जाने के लिए हिम्मत नहीं, अलग नजरिए की जरूरत है।

ये तो बस भूमिका है!

मैंने जब कश्मीर जाने का फैसला किया। तब मैं अंदर से पूरी तरह खुद को तैयार कर चुकी थी कि मुझे वहां टूरिस्ट बनकर नहीं जाना। मैं जिस तरह से कश्मीर को घूमना चाहती थी उसके लिए वहां के लोगों से जान-पहचान होना बेहद जरूरी है। इस लालच में मैं सोशल मीडिया के जरिए कई कश्मीरियों से जुड़ी। हालांकि सोशल मीडिया से जुड़ने के बाद भी हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई।

अगर आप पत्रकार हैं तो चाहे या ना चाहे आप देश के हर कोने से रूबरू हो ही जाते हैं। कश्मीर तो ऐसी जगह है, जहां हर किसी की दिलचस्पी होती है। कश्मीर में मेरी दिलचस्पी की वजह उसका कॉनफिलक्ट जोन होना तो है ही। एक और वजह थी एक कश्मीरी पर मेरा क्रश होना। इसके अलावा हर रोज कश्मीर एनकाउंटर की खबर बनाने के बाद आप ऐसे ही कश्मीर की जगह को जानने लगते हैैं। मेरे ऑफिस में ऐसा कुछ हुआ कि हमारे कश्मीर के जो लोकल रिपोर्टर थे उनकी खबर भी मुझे असाइन की जाने लगी। मतलब मेरी जिंदगी कश्मीर के आस-पास ही घूम रही थी।

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अब है लोगों की बानगी

अपनी कश्मीर ट्रिप के बारे में जब मैंने अपने आस-पास के लोगों को बताया, दोस्तों को बताया तो सबका रिएक्शन एकदम वैसा ही था, जैसा मैंने उम्मीद की थी। दुनिया में कहीं चली जाओ पर कश्मीर क्यों? वहां अभी माहौल ठीक नहीं है, अभी तो वहां पंचायत चुनाव भी हैं। जा रही भारती बनकर आओगी रुखसाना बनकर (ये मजाक में कही गई बात थी लेकिन)।

हां, अपनी ट्रिप का जिक्र मैंने अपने घर में भी किया। मुझे उम्मीद थी कि घर से मुझे जवाब ना मिलने वाला है। लेकिन मेरी मां और भाई का रिएक्शन बेहद नॉर्मल था, जो मुझे हैरान कर गया। मां ने कहा, तुम वहां पहले जा चुकी हो तो अब क्यों जाना? खैर जाओ। भाई ने कहा अपना ख्याल रखना और सारी जानकारी मुझे देकर जाना।

कश्मीर ना जाने को लेकर जितनी नसीहतें मिलती गईं, मेरा इरादा कश्मीर को लेकर उतना ही मजबूत होते जा रहा था। इन सारे ऊहापोह के बीच मैं और मेरी दोस्त स्नेहा ट्रेन में स्लीपर टिकट बुक करने बैठे। लेकिन तभी मुझे अपने एक कश्मीरी दोस्त का ख्याल आया (ये सोशल मीडिया वाली दोस्ती नहीं है)।

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मैंने अपने दोस्त को फोन कर अपनी प्लानिंग बताई तो उसने हमारी ट्रेन की प्लानिंग को मना करते हुए कहा कि फ्लाइट लो और बस आ जाओ। यहां से सारी जिम्मेदारी मेरी। मेरे यहां होते तुम्हें किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं। मेरे दोस्त ने मुझे कश्मीर में अलग-अलग जगहों पर लोगों से कनेक्ट भी कराया ताकि जब मैं वहां जाऊं तो मुझे कोई दिक्कत ना हो। उनकी बात मान कर ट्रेन की प्लानिंग रद्द कर प्लाइट की टिकट बुक कराई।

कश्मीर जाने की तारीख 9 अक्टूबर तय हुई और उस दिन मेरा जन्मदिन था। जाने के लिए हमने करीब 10 दिन पहले टिकट बुक करा लिया था। उस 10 दिन में हमने अलग-अलग लोगों से कश्मीर को जानने की कोशिश की। नेट पर बैठकर जगह तलाशा, मेरी दोस्त स्नेहा ने पेन-पेपर लेकर लंबी सी लिस्ट बनाई। उन दस दिनों में हर रोज मेरी पेट में अजीब सी गुदगुदी होती रही, ऐसा लगता कि काश पैसे थोड़े ज्यादा होते तो टिकट कैंसिल करा कर मैं आज की ही फ्लाइट ले लेती। तब तक हर रोज की रूटीन लाइफ चलती रही। रूम से ऑफिस, ऑफिस से रूम। साथ में कश्मीर जाने की तैयारी।

आखिरकार 9 की वो सुबह भी आ गई, जब स्नेहा अपनी नाइट शिफ्ट खत्म कर और मैं दिल्ली के दोस्तों के साथ जन्मदिन मना एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े। कदम जैसे-जैसे एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहे थे, कश्मीर के पास होने का एहसास बढ़ता जा रहा था। सुबह 5ः30 की फ्लाइट से हम कश्मीर के लिए रवाना हो गये। फ्लाइट में जो हमारे को-पैसेंजर थे, वो जनाब भी कश्मीरी थे, नाम था अरशद। डेढ़ घंटे की यात्रा के दौरान थोड़ी सी फॉर्मल बातचीत के बाद हम तीनों आपस में सहज हो चुके थे।

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हां, कश्मीर जाने के उत्साह के बीच हमने पैकिंग बिल्कुल खराब की थी। मैंने और मेरी दोस्त ने दिल्ली ट्रिप के हिसाब से कपड़े पैक कर रखा था। सुबह 7 बजे जब हम श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचे तो ठंड के साथ हमारे स्वागत के लिए अनजान मुस्कुराता से चेहरा वहां मौजूद था। जनाब का नाम था फैज और इन्हें हमारे लिए मेरे दोस्त ने भेजा था।

( ये इस यात्रा का पहला भाग है, बाकी के हिस्से आप यहां पढ़ें)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।


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