जिभी, तीर्थन घाटी: पहाड़ी स्वर्ग है हिमाचल प्रदेश का ये गांव

जिभी, तीर्थन घाटी | घूमने के शौकीनों के लिए तो वैसे कोई जगह कम ज्यादा हर जगह वो अपनी मौज ढूंढ ही लेते हैं. ऐसी ही एक जगह है पार्वती वैली से पहले तीर्थन वैली. खीरगंगा, कसोल, मणिकर्ण गुरुद्वारा जैसी खूबसूरती खुद में समेटे है. यहां बहने वाली तीर्थन नदी के कारण, इस वैली का नाम तीर्थन वैली पड़ा है.

जिभी, तीर्थन घाटी
जिभी, तीर्थन घाटी

विशाल हिमालय में मौजूद हंसकुंड ग्लेशियर से तीर्थन नदी बहती है. तीर्थन वैली, में ही मौजूद एक खूबसूरत से गांव है जिभी. अगर आप लंबी छुट्टियों के लिए मनाली जा रहे हैं, 2-3 दिन छुट्टियों के यहां बिता सकते हैं. आराम और शांतिप्रिय लोगों के लिए यह जगह बेहद खूबसूरत घर से कम नहीं है.

जिभी, तीर्थन घाटी कैसे पहुंचा जाए?

मनाली जाने वाले किसी भी बस के जरिए आसानी से जिभी, तीर्थन घाटी पहुंच सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले आपको ओट पहुंचना होगा. भुंतर से करीब 20 किलोमीटर पहले एक बड़ी से टनल शुरू होती है. यही जगह ओट कहलाती है. टनल खत्म होने के साथ ही दायीं तरफ ओट का बस स्टॉप पड़ता है. जहां से आगे की यात्रा शुरू होती है.

दिल्ली से निकल हम सीधे ओट पहुंचे. रातभर की सफर आंख खुलती है, ओट बस स्टॉप पर. यहां से हर आधे से एक घंटे के अंतराल पर बंजार के लिए बस मिलती है. करीब एक घंटे से डेढ़ घंटे के घुमावदार रास्ते से होते हुए पहुंचे सीधे बंजार है.

जिभी, तीर्थन घाटी
बंजार बस स्टॉप से नजारा

ये एक बड़ा बस स्टॉप है. इसके आगे जाने के लिए सीधे बस मिलती है. यहां आपको ज्यादतर लोकल या आसपास के गांव के लोग नजर आएंगे. बंजार बस स्टॉप से करीब 4-5 किलोमीटर दूर है. यह एक छोटा से गांव है, जहां बीते कुछ वर्षो से टूरिस्ट की तादाद बढ़ी है.

बंजार से जिभी, तीर्थन घाटी जाने के लिए छोटी कार या लोकल बस ले सकते हैं. बस की टाइमिंग कुछ फिक्स नहीं थी. अगर आपको बस से जाना है तो इसकी फिक्स टाइमिंग जिसके बारे में स्टॉप पर पता किया जा सकता है. आगे हम Alto से जिभी पहुंचे. बंजार बस स्टॉप पर ढेरों आल्टो वाले मिल जाएंगे. जिनके साथ तोल-मोल कर आसानी से 250-300 रूपए में जिभी पहुंच सकते हैं.जिभी, तीर्थन घाटी

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जिभी मुख्य चौराहे पहुंच कर अहसास होगा, यह सच में काफी शांत जगह जहां बाहरी लोगों का आना जाना कम है या शायद ऑफ-सीजन होना की वजह से कम लोग नजर आ रहे थे. अपनी यात्रा के दौरान खि़ड़की से झांक कर देखेंगे तो लगेगा किसी ने खूबसूरत सीनरी आपकी कार की खिड़की पर लाकर टांग दी है.

तमाम हॉस्टल से लेकर हाउस ट्री यहां आपको हर तरफ नजर आ जाएंगे. जहां कोई भी आसानी से रुक सकता है. अगर आपके दोस्तों की मंडली बड़ी है तो आप विलॉनुमा गेस्ट हाउस भी रेंट पर ले सकते हैं. मेन चौराह पर आपको राणा जी को घर दिख जाएगा, यहां के लोकल बताते हैं राणा जी ने ही जिभी ट्रूरिज्म की शुरुआत की थी, काफी पुराने और सीनियर होने के नाते. यहां के बारे में उन्हें काफी कुछ पता है.


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अब बढते हैं आगे के सफर की ओर, कई पीजी और हॉस्टल में नजर दौड़ाने के बाद नजर पड़ी एक बोर्ड पर जिसपर किसी कैंप का नं. लिखा हुआ था, वो कैंप भी नदी के उस पार था, जो साफ नजर आ रहा था. खैर फोन पर थोड़ी बात और टेंट के रेंट को लेकर थोड़ा तोलमोल कर, सोचा कैंप देखकर कुछ नतीजे पर पहुंचा जाया.

बस फिर क्या, चार हाथ की नदी सामने दिख रही. रोड से उतर के ढलान कुछ ज्यादा थी, ऊपर से पीछे बैग का बोझ. पता ही नहीं चला कब वजन इतना बढ चुका कि मैं लुढकते हुए नीचे जा पहुंचा. खैर मिट्टी शायद गीली थी, इसलिए चोट नहीं आयी. नदी पर बने ब्रिज को पार करते हुए, हम कैंप तक पहुंचे.जिभी, तीर्थन घाटी

यहां छोटे छोटे करीब 10-11 टेंट थे लेकिन ट्रूरिस्ट सीजन न होने कारण सभी खाली थे. इन्हीं में से एक टेंट हमने अगले दो दिनों के लिए रेंट पर लिया. कीमत हजार रुपए प्रति दिन तीन लोगों के लिए. अब बात आती है, खाने की बारी ऑफ सीजन होने के कारण बगल में एक छोटा सा कैफे था, जहां चाय या हल्का फुलका स्नैक्स खाए जा सकते. इसके साथ ही यहां एक स्पेशल किस्म की मछली और मोमो की तरह टेस्ट वाले सिड्डू बड़े चर्चित हैं. अगर आपको मौका मिले तो इनका स्वाद जरूर लें.जिभी, तीर्थन घाटी

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थोड़ी देर में हमारे कैंप वाले भाइया शाम होने के साथ पास की बाजार से रात का खाने के इंतजाम में निकल गए. चूंकि नदी हमारे कैंप से कुछ दूरी पर ही बह रही थी, तो सोचा क्यों न नदी में नहा भी लिया जाए. हाथ-पैर भिगोने पर सुन्न कर देने वाला ये पानी जब शरीर पर पड़ा तो एक पल का लोग शरीर खत्म हो चुका है, ठंडा गर्म कोई अहसास ही नहीं, लेकिन कुछ देर सुई से पतली पानी की एक एक बूंद लग रहा था अन्दर तक होल कर देगी. खैर, नहा धोकर यहां से कुछ दूरी पर एक वॉटरफॉल था. लोगों ने बताया पास ही तो सोचा चलो पैदल ही उससे घूमा जाए.जिभी, तीर्थन घाटी

कैंप से कुछ दूरी के चढ़ाई करते ही मेन सड़क आ जाती है, जिस पर आगे बढ़ते हुए, कुछ बच्चे दिखे जो शायद स्कूल से लौट रहे थे. आगे कुछ लोकल से रास्त्ते पूछते हुए हम आगे बढे. रोड से राइट साइड से एक कच्चा रास्ता जाते जहां से पानी की धारा आती हुई दिख जाएगी, उसी धारा को पकड़ते हुए आगे बढ़ते हुए गए.जिभी, तीर्थन घाटी

वहां हम कुछ लोग और मिले जो शायद हमारी ही तरह वॉटरफॉल देखने आए थे. सरकार ने उस वॉटरफॉल को टूरिस्ट प्लेस के तौर पर स्टैब्लिश करने लकड़ी कुछ फ्रेमनुमा डिजाईन बनवा के रखी है लेकिन वो भी अब टूट फूट चुके थे. इन्ही सब चीजों को देखते हुए हम आगे बढे. आगे जाकर वॉटरफॉल मिला. जो बहुत कुछ खास नहीं था लेकिन शाम को घूमने और टहलने के लिए एक अच्छी जगह थी. वापस कैंप आकार खाना खाकर अब हमें अगले दिन की तैयारी करनी थी.जिभी, तीर्थन घाटी

जलोड़ी पास और सरलोसर लेक

अगले दिन एक आल्टो कर हम जलोड़ी पास के लिए निकल गए. सुबह अगर आप जल्दी उठ जाए तो लोकल बस कर सकते हैं जो करीब 2 बजे वापस आती है. ये आपको जलोड़ी पास तक छोड़ देगी. जहां से करीब 4-5 किलोमीटर ट्रेक कर सरलोसर लेक तक पहुंचा जा सकता है.जिभी, तीर्थन घाटी

सुबह करीब 10 बजे कैंप से निकल हम सीधे जलोड़ी पास पहुंचे. सुबह का मौसम बेहद शानदार ऊपर पहाड़ की गोल गोल घुमावदार रास्ते. 10-12KM का सफर तय कर हम सीधा, जलोड़ी पास पहुंचे. मंदिर के बगल से यहां एक बड़ा सा मंदिर जिसके बगल से कच्चा रास्ता जाता है. यहां से शुरू होता है, हमारा सफर.

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जलोड़ी ट्रेक

अगर ट्रेक की बात की जाए तो आसान है. कहीं कहीं सकरे बाकी जगह बिल्कुल सीधा रास्त है. सफर के दौरान अगर मौसम की मेहरबानी रही तो आपका ये सफर सोने पर सुहागा हो जाएगा क्योंकि तब आपके आंखों से सामने काफी अच्छे नजारे होगें. बीच में कई जगह आपको कैंप मिल जाएंगे, अगर वापसी में या रात में रुककर कैंपिग करना चाहे तो इसकी भी पूरी व्यवस्था है.जिभी, तीर्थन घाटी

लोकल का कहना हैं, यहां मौसम जरा बेईमान है. इसलिए जैकेट और रेनकोट हमेशा साथ रखें. क्योंकि मौसम किसी भी वक्त कहीं भी करवट ले सकता है. जहां आते वक्त खिलखिलाती धूप और शानदार मौसम था, वहीं कुछ घंटो बाद जोरों की बारिश शुरू हो गई. सरलोसर लेक पहुंचकर आसपास आपको ढेरों दुकाने दिख जाएंगी, जहां मैगी, राजमा, चावल, चाय, ब्रेड मिल जाएगा.

इस आगे कुछ दूर पर ही है, सरलोसर लेक. गोलाकार लेक का नजारा दूर से देखते बनता है. कुछ समय के लिए आपको पूरी लेक नजर आएगी, वहीं थोड़ी देर की धुंध में पूरी लेक कहीं खो सी जाएगी.यहां के मौसम में ये बेहद आम है. बगल में एक छोटा शिव मंदिर है. अगर आप चाहें तो इस पूरी लेक का गोलाकार चक्कर काटकर आ सकते हैं.

ठंड के मौसम में ये लेक पूरी तरह से जम जाती है और चारों तरफ सिर्फ बर्फ नजर आती है. लेक किनारे कुछ समय गुजार, जैसे ही हम वापस होने का मन बनाया तो जोरदार बारिश शुरू. 1-2 घंटे लगातर बारिश के बाद वापस हम जलोडी पहुंचे. एक तो बारिश ऊपर से कच्चा रास्ता, इसलिए बापसी का सफर और मुश्किल भरा हो गया. यहां अंधेरा होना के बाद बसों को मिलना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए कोशिश करिए, समय निकाल लकर जाएं.

इसके बाद हम कार से बंजार और उसके बाद बस बदल के ओट और फिर दिल्ली आ गए.


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