जमाली-कमाली मस्जिद: भूतिया जगह कैसे बन गया एक इबादतगाह

दिल्ली क्या देखी? अगर सिर्फ कुतुबमीनार,लाल किला या हुमायूं का मकबरा भर देखा। इस शहर में देखने को इतना कुछ है, जिसके बारे में आमतौर से हम जानते ही नहीं। गाड़ियों के शोर, ट्रैफिक जाम, रोजमर्रा की परेशानियों के बीच हांफती-दौड़ती दिल्ली में एक ऐसी जगह भी है, जहां केवल सुकून और शांति है। वो जगह है, दक्षिण दिल्ली के महरौली में स्थित जमाली कमाली। जमाली कमाली बेहद खूबसूरत होने के साथ ही ऐतिहासिक भी है। लेकिन इसे इतिहास के पन्नों में भी इतनी अहमियत नहीं दी गई कि लोग इसे पहचान पाएं।

जमाली कमाली की खासियत है, यहां की शांति, आंखों को सुकून देती हरियाली और खूबसूरत इमारतें। अगर आप अपने वीकएंड पर मॉल जैसी जगहों पर जाकर ऊब चुके हैं तो जमाली कमाली आपके लिए एक नया एहसास होगी। अपने परिवार या अपने दोस्तों के साथ पिकनिक बनाने के लिहाज से यह जगह एकदम परफेक्ट है। घास के टीलों पर बैठकर आप जमाली कमाली ही नहीं कुतुब मीनार का भी नजारा ले सकते हैं।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि, कमाली नाम जिस व्यक्ति का नाम शामिल है इस मस्जिद के अस्तित्व में, उनकी कोई भी जानकारी इतिहास में दर्ज ही नहीं है। हालांकि जमाली और कमाली दोनो मकबरों का निर्माण एक साथ हुआ था पर किसी को उनकी जानकारी नहीं है। हर ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी सिर्फ जमाली के बारे में ही उल्लेख किया गया है, कमाली के बारे में कुछ भी नहीं।

ये भी पढ़ें:  कश्मीर 9ः कश्मीर को अलविदा कहना, दुनिया के कठिनतम कामों में से एक है

शेख जमाल-उद-दीन हामिद बिन फजलुल्लाह कम्बोह देहलवी सुहरावर्दी सूफी संत शेख समाउद्दीन के शिष्य एवं दामाद थे। शेख जमाल उर्फ जमाली भी एक सूफी संत थे और दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोधी के शासनकाल (1489/15-17) के दौरान भारत आये थे। वो एक बहुत अच्छे शायर या कवि भी थे और उनकी कविताओं ने शेख जमाली को बहुत प्रसिद्ध कर दिया था। ये उनकी शख्सियत का ही कमाल था जो उनको सिकन्दर लोधी, बाबर, हुमायूं सभी के दरबार में इज्जत और जगह मिली। कहा तो यह भी जाता है कि सिकन्दर लोधी अपनी कविताओं में उनसे राय और सहायता लेता था और इस से ही वो भी एक अच्छा कवि बन गया।

कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि बाबा फरीद के नाम से जो कवित्त है, जो सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरुग्रंथ साहिब में भी दृष्टव्य है, वो कविताएं भी शेख जमाली ने ही लिखी थीं। इस बात की कहीं से ऐतिहासिक रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

जहां तक बात कमाली की है तो इस चरित्र की सच्चाई अभी तक रहस्य के आवरण में ही छुपी हुयी है। इस प्रांगण में लिखे शिलालेख के अनुसार कमाली का परिचय अज्ञात है जबकि एक अमेरिकी लेखिका केरेन चेज ने अपनी पुस्तक, ‘Jamali Kamali a Tale of Passion in Mughal India’ में उनको एक दूसरे का पुरुष प्रेमी बताया है, कुछ और लोगों के अनुसार वह जमाली के शिष्य थे, किसी और के अनुसार वह उनके भाई या नौकर या दूसरे कवि या साथी थे और कुछेक और के अनुसार कमाली नाम जमाली की पत्नी का है। सत्य जो भी और कभी भी सामने आए या न भी आये किन्तु इतना अवश्य है कि कमाली जिस भी शख्सियत का नाम था वो जमाली की बहुत अजीज और प्रिय शख्सियत थी, तभी दोनों की कब्र एक ही छत के नीचे आस-पास है।

ये भी पढ़ें:  लवासा सिटी: ग्लैमरस विज्ञापनों से ख्याति पाया एक बड़ा ही औसत हिल स्टेशन

जमाली के मकबरे में उनके द्वारा लिखी गयी पंक्तियां बड़ी गजब की हैं:
कब्र में आके नींद आयी है,
ना उठाये,खुदा करे कोई।

और,
एक जगह उन्होंने लिखा है;
रंग ही रंग, खुशबू ही खुशबू,
गर्दिश-ए-सागर-ए-खयाल हैं हम।

मस्जिद की दीवारों पर बेल-बूटों का अलंकरण है। जहां मेहराब की चाप मिलती है, वहां प्राचीन पदकों अथवा मेडेलियन की सजावट है, जो हमको इस समय के बाद की इमारतों में भी दिखती है। अंदर के विशाल बरामदे में पश्चिम की ओर दीवार पर मेहराबें बनी हुयी हैं। अंदर इस बड़े से बरामदे या हॉल कहें इसमें खंभों के बीच में खड़े होने पर एक विशाल गलियारे में खड़े होने की अनुभूति होती है। कई अन्य इस्लामिक इमारतों की भांति इसकी दीवार पर भी कुरान की आयतें उकेरी हुई हैं। मस्जिद के चारों ओर अष्टकोणीय मीनारें हैं।

ये इमारत दो मंजिला है और इसमें ऊपर जाने का एक बहुत ही पतला जीना भी है। इस मस्जिद स्थल से लगा हुआ ही मकबरे का प्रांगण है किंतु उसके प्रवेश द्वार में ताला लगा हुआ रहता है।

ये भी पढ़ें:  राजस्थान 2: अपने प्रियतम इतिहास की ओढ़नी आज भी ओढ़े हुए हैं ये शहर

जमाली-कमाली को दिल्ली में बहुत कम ही लोग जानते हैं। कुछ लेखों के अनुसार, जमाली कमाली मस्जिद भूतहा है। कुछ लोगों को वहां किसी अंजान परछाईं का एहसास हुआ है, तो किसी ने रात को वहां से आने वाली डरावनी आवाजें सुनी हैं।

वीडियो देखें:


दिल्ली के इस रहस्यमयी कोने के बारे में लिख भेजा है निकिता शेरावत ने। निकिता उत्तराखंड मे कानून की पढ़ाई कर रही हैं। इनका जन्म उत्तरप्रदेश के संभल में छोटे से गांव में हुआ। बचपन गांव में बीता और वहीं से जागा घूमने का कीड़ा। निकिता आगे बताती हैं, कोर्स सही चुन लिया तो डिबेट के बहाने अलग अलग शहर में आना जाना लगा ही रहता है, खासकर दिल्ली। जहां घूमती हूं, उस जगह के अंदर घुस जाती हूं। और जिंदगी ऐसे ही चलती रहे यही तमन्ना है।


ये भी पढ़ें:

शनिवार वाड़ा: मराठाओं की शान रहा किला कैसे बन गया भूतिया

1 thought on “जमाली-कमाली मस्जिद: भूतिया जगह कैसे बन गया एक इबादतगाह”

Leave a Comment