जयपुर से दो घंटे की दूरी पर ही लीजिए रेत में सवारी का मजा

गुलाबी शहर जयपुर के बारे में बहुत सुना था। चूंकि मुंबई का अधिकतर हिस्सा घूम लिया है (हालांकि ये शहर बहुत बड़ा है, कई चीजें बाकी हैं) लेकिन ले-देकर मिलेंगे पहाड़, समुद्र और पॉइंट्स ही। तो ये डिसाइड हुआ कि पहाड़, समंदर बहुत हुआ, अब कहीं और जायेंगे।

जयपुर के बारे में बहुत सुना था तो वहीं की टिकट कटा ली, वैसे कई दिनों से दिमाग में ये आप्शन चल रहा था, तो प्लानिंग में बहुत समय नहीं लगा। वैलेंटाइन्स डे यानी हफ्ता मोहब्बत वाले को ही जयपुर के लिए चुना। गुरुवार को था वैलेंटाइन्स डे और फिर था शुक्रवार। दो दिन छुट्टी ली, फिर अपन का शनिवार, रविवार ऑफ रहता है तो हो गए 4 दिन। शहर छानने के लिए 4 दिन बहुत है। यहां तक तो सारी योजनाएं बन गयीं।

अब हुआ ये कि अपन थोड़े अवसरवादी ज्यादा हैं, कम चीजों में मजा नहीं आता। ये हुआ जयपुर तक जा रहे हैं और डेजर्ट सफारी न हो… ये भला क्या बात हुई। बस फिर क्या गूगल बाबा की जय हो। लेकिन 2 दिन निकल गए। कुछ न मिला। हर जगह यही पता लगा कि ‘छोरी जयपुर में तो तुमको रेत न मिले सै’ लेकिन हम भी ढीठों में गिने जाते हैं। कोशिश बरकरार रखी और कहते हैं न ढूंढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं तो मुझे भी रेत मिल ही गई वो भी जयपुर से सिर्फ 2 घंटे की दूरी पर।

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लेकिन अपन अवसरवादी हैं तो ऐसे कैसे 2 घंटे के रास्ते में बीच में पड़ने वाला अजमेर छोड़ देते। जयपुर से पुष्कर पहुंचे वाया अजमेर की कढ़ी-कचौड़ी खाते हुए। पुष्कर मेला तो बचपन से सुना था, लेकिन पुष्कर इतना खूबसूरत होगा, ये नहीं पता था। इस समय सर्दी थी तो सूरज की रोशनी चुभ नहीं रही थी। ऑनलाइन ही बाबू कैमेल सफारी बुक की मात्र 1750 रुपये (मात्र क्यों कह रही, वो आगे पता चलेगा) में।

पुष्कर पहुंच चुके थे और अब आगे बाकी इंतजाम (नाईट स्टे, टेंट, डिनर, फोक डांस, साईट सीइंग, बोनफायर, सुबह का ब्रेकफास्ट, पुष्कर तक पिक ड्राप) बाबू का था। अपन को खाली मस्तीखोरी और फोटोग्राफी करनी थी। बाबू कई साल से डेजर्ट सफारी करवा रहे हैं। अब तो मालिक हो गए हैं, अपने अंडर कई लड़के रखे हैं जो ऊंट चलाते हैं।

दोपहर 3 बजे से शुरू होती है सफारी। 3 बजे से ही ऊंट अलॉट कर दिया जाता है जो अगले दिन 12 बजे तक आपके साथ रहने वाला होता है। इस बीच आपके साथ-साथ उसका भी खाने खाने का इंतजाम किया जाता है। मैंने ऐसा माहौल सिर्फ फिल्मों में देखा था। 3 बज रहे थे ऊंट मिल गया था। ऊंट नयी दुल्हन की तरह सजा हुआ था। मैं बैठ गई, सामान रखा और सफारी शुरू।

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टेंट तक पहुचने से पहले बीच में 2 स्पॉट पर रुकते हैं। एक जहां सीरियल ‘दिया और बाती हम’ की शूटिंग हुई थी, जहां आप राजस्थानी ड्रेस में फोटो खिंचवा सकते हैं। दूसरा स्पॉट उसके आगे जहां फिल्म “करन अर्जुन’ की शूटिंग हुई थी और करण कहता है, भाग अर्जुन भाग। यहीं पर सनसेट भी होता है जो बेहद खूबसूरत होता है। इसके अलावा यहां कई विदेशी आते हैं। शाम को इसी स्पॉट पर राजस्थानी डांस होता है। सनसेट के बाद ऊंट फिर चल देता है, बीच बीच में पानी पीते, चारा खाते।

फिर लगभग 9 बजे तक आ जाता है आपका ठिकाना। यानी कैंप। आप चाहें तो कॉटेज लें या टेंट, मर्जी आपकी, मैंने तो टेंट लिया था, जिसमें अटैच्ड बाथरूम था। वहां डिनर दाल बाटी चूरमा मिलता है लेकिन आपकी फरमाइश पर सब अवेलेबल है। (समझ गए न ‘सब’)। साथ में बोनफायर और एक बार फिर राजस्थानी डांस। यहां फीलिंग आती है फिल्म राजा हिन्दुस्तानी की परदेसी गाने की। एकदम वही माहौल। अगले दिन सुबह ब्रेकफास्ट और घरवापसी।

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ये तो जयपुर ट्रिप के सिर्फ एक हिस्से का वृतांत था। अगले में जयपुर के बारे में बताउंगी कहां जाएं और कहां जाने लायक नहीं है। डेजर्ट सफारी के बारे में इसलिए बताया ताकि मेरी तरह आप परेशान न हों और आपको इतनी सर्च न करनी पड़े।

राम राम सा…


रंगीलो राजस्थान से ये तमाम बातें हमें लिख भेजी हैं शालू अवस्थी ने। शालू पत्रकार हैं। शालू बताती हैं कि अब तो हर वीकेंड निकल लेती हैं कहीं न कहीं घूमने। धुन सवार है कि जितना घूम सकें उतना घूम डालें, बस घूम डालें। स्वादिष्ट व्यंजनों में जान बसती है। फोटो खिंचवाना पसंदीदा शगल है। चाहती हैं कि इस ब्रह्मांड के सभी लोग झोला उठाकर घूमने निकल पड़ें।


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