जयपुर: सौ किलोमीटर के भीतर ही हजारों रंग समेटे एक शहर

घुमक्कड़ों की भी अपनी एक दुनिया होती है, एक जगह की घुमक्कड़ी पूरी नहीं होती है कि लिस्ट में एक नई जगह शामिल हो जाती है। फिर उस जगह कैसे जाएंगे, कहां ठहरेंगे, क्या देखेंगे और कितना खर्चा आएगा जैसे तमाम विषयों रीसर्च का दौर शुरू हो जाता है लेकिन कई बार हम अचानक ही निकल पड़ते हैं। ऊपर के इन सवाल से बेपरवाह बस निकल पड़ते हैं क्योंकि हमें भरोसा होता है कि दुनिया देखने, समझने और महसूस करने लायक चीजों से भरी पड़ी है बस हमें अपने कदम बाहर निकालने की जरूरत भर है। बस ऐसे ही उस सुबह मेरे कदम निकल पड़े थे, सिर्फ इतना पता था कि जयपुर जाना है। राजस्थान में प्रवेश करने का यह पहला मौका था तो एक्साइटमेंट भी लाजिमी थी।

जब भी हम राजस्थान का नाम लेते हैं तो हमारे मन में कई सारे राजपूत राजाओं का ख्याल अपने आप ही आ जाता है। बहुत सारे राजा मतलब बहुत सारे राजमहलों की एक लंबी फेहरिस्त भी। बस में बैठे-बैठे ये तय हो गया कि अगले दो दिन जयपुर के सभी महत्वपूर्ण धरोहरों यानी राजमहलों और किलों तक पहुंचने का प्रयास करूंगा।

बाजार का एक दृश्य

बस कंडक्टर ने अपनी सूझबूझ से मुझे एकदम सही जगह यानी नारायण सर्किल ( जो जयपुर बस अड्डे से पहले ही पड़ता है) पर उतार दिया। फिर तो मैने बिना समय गवांए कैब बुक की और आमेर महल की तरफ बढ़ चला। इसके बारे में बस इतना पता था कि इसे राजा मानसिंह ने बनवाया था। रास्ते में पिंक सिटी का गुलाबी रंग में डूबा हुआ बाजार देखकर अच्छा लगा। तभी रास्ते में ही जयपुर का हवामहल मिला पर मैं नहीं रुका लेकिन थोड़ी दूर और जाने के बाद जल महल दिखा। यहां मैं अपने आप को रुकने से रोक नहीं पाया। वैसे विजिटिंग लिस्ट में तो जल महल का नाम भी था लेकिन मुझे पता नहीं था कि जलमहल रास्ते में ही मिल जाएगा।

जल महल

चूंकि एक बड़े से तालाब के बीच बने इस महल के अन्दर जाना आम पर्यटकों के लिए प्रतिबन्धित है तो मैं नहीं जा सका लेकिन दूर से ही इसकी छटा काफी शानदार दिख रही थी। महल के पीछे पहाड़ों की श्रृंखला, पहाड़ों के ऊपर आसमान में नीले-सफेद बादल और उन्हीं बादलों की परछाई से भरा वो तालाब इसके आकर्षण में चार चांद लगा रहे थे।

यह महल बिल्कुल सड़क के किनारे बने तालाब में ही स्थित है और उसी सड़क से मुझे आमेर महल के लिए सिटी बस मिल गई। शाम के तीन बजे तक मैं पहाड़ के ऊपर बने आमेर महल में दाखिल हो चुका था, राजस्थान का यह पहला महल है जिसमें मैं दाखिल हुआ। बड़े-बड़े दरवाजे, पत्थर की कई फुट मोटी दीवारें और सीढ़ियां…सबकुछ एकदम शानदार लग रहा था।

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टिकटघर के ठीक सामने का दृश्य

मेरे मन में उत्साह की मानो पूरी नदी बह रही थी। ऊपर एक मंदिर है और वहां तक जाने का कोई टिकट नहीं लगता। वहां पहुंचकर टिकट लिया, इसके बाद दीवान-ए-आम की तरफ बढ़ा। मेरी जिंदगी में दीवान-ए-आम को मैने अबतक इतिहास की किताबों में ही पढ़ा था। दो फ्लोर और ऊपर स्थित है इस दीवान-ए-आम में आकर मजा ही आ गया।

दीवान-ए-आम की तरफ जाने वाला रास्ता

गर्मी के मौसम में यहां ठंडी-ठंडी हवा का आनंद लेते हुए दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों को देखने का अपना अलग ही मजा है। दीवान-ए-आम के परिसर में बने गणेश पोल को देखकर मन गदगद हो गया, वेजिटेबल कलर से रंगी हुई उस समय की संस्कृतियों और कलाओं को दर्शाती नक्काशी एक अमिट छाप छोड़ रही थी।

गणेश पोल

गणेश पोल एक गेट (दरवाजा) है जिससे होकर आगे बढ़ा तो अगले भाग में शीशमहल का दीदार हुआ जिसका इंतजार लंबे समय से था। शीशे के टुकड़ों से की गई नक्काशी का ऐसा बेजोड़ नमूना मैंने आजतक सिर्फ फिल्मों में देखा था। दीवारों से लेकर छत तक हर तरफ शीशे ही शीशे। वाकई इसको बनाने वालों को सलाम है।

शीश महल का एक हिस्सा

इसके बाद एक फ्लोर और ऊपर गया तो ऊपर से पूरे महल को देखने पर एक अलग ही नजारा दिखा। वहां से दिखने वाले दीवान-ए-आम सहित किले का एक भाग, फिर शहर और उसके बाद पहाड़ ने मुझे लगभग दस मिनट तक रुकने पर मजबूर कर दिया।

किले के ऊपरी भाग से दिखने वाला नजारा

इसके बाद मैं पहुंचा इस महल के आखिरी हिस्से में जोकि उस समय महिलाओं के लिए बनाया गया था। चारों तरफ से कमरों से घिरे एक बड़े से आंगन वाले इस भाग में मुख्यतः महिलाएं यानी रानिया और महारानियां रहा करती थीं। आंगन के चारों तरफ तमाम छोटे-बड़े कक्ष बने हैं, मेरी समझ से इसे रानियों-महारानियों में कद के हिसाब से आवंटित किया जाता रहा होगा।

रानी-महारानियों का चैम्बर

अबतक शाम हो चुकी थी और समय खत्म होने की वजह से मैं बाहर आ गया। इसके बाद मैं लौटते समय हवा महल पहुंचा। हवा महल तो बंद हो चुका था लेकिन बाहर से ही वो बहुत खूबसूरत दिख रहा था।

हवा महल

दूसरा दिन

अगले दिन सुबह से ही घूमक्कड़ी की शुरुआत कर दी और ठीक दस बजे जयपुर के सिटी पैलेस पहुंच गया था। आमेर पैलेस से इतर यह समतल जगह पर स्थित है और इसे मानसिंह द्वितीय ने बनवाया था। भव्यता में बड़े-बड़े किलों को मात देते इस किेले की खूबसूरती आमेर किले से काफी ज्यादा लग रही थी। सिटी पैलेस में काफी चीजें देखने को मिली और शुरुआत हुई टेक्सटाइल गैलरी से। इस गैलरी में राजा मानसिंह व उनके शाही परिवार के परिधान व दूसरी चीजों का एक कलेक्शन रखा गया है। इतने बड़े-बडे़ कपड़े कि उसमें मेरे जैसे दो-तीन लोग समा जाएं।

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सिटी पैलेस के अंदर पोज मारता मैं

इस दौरान एक चीज और जो मुझे बड़ी अच्छी लगी वो ये कि महल के अन्दर वाले गेट पर दरबान पूरे वेश-भूषा के साथ आने जाने वालों का स्वागत कर रहे थे। विदेशी पर्यटकों में तो इन दरबानों के साथ फोटो खिंचवाने का तो मानो अलग ही क्रेज दिख रहा था।

महल के भीतर बना एक गेट

इसके आगे बढ़ा तो एक और गैलरी मिली जहां पर दुनिया का सबसे बड़ा गंगा जली जार रखा गया है। इस गैलरी की इमारत में की गई कलाकृति ने तो जैसे मन ही मोह लिया। मन किया तो थोड़ी देर वहीं बैठ गया।

गंगा जली जार
वो गैलरी, यहां ये जली जार रखा है

वहां बैठा ही था तभी राजशाही भोंपू की आवाज सुनी, मुड़ा तो देखा कि एक शाही बग्घी में सवार होकर एक परिवार महल में दाखिल हो रहा था। रथ चलाने वाले और भोंपू बजाने वाले का शाही परिधान इस पूरे क्रियाकलाप में शाही अंदाज का रंग भिगो रहे थे। पूछा तो पता चला कि 500 रुपए का टिकट लेकर इस शाही सवारी का मजा लिया जा सकता है।

शाही सवारी

अब बारी थी दीवान-ए-आम में जाने की जिसे सभा निवास भी कहते है। इसमें की गई सुनहले रंग की नक्काशी और बड़े-बड़े झूमर तो वाकई एकदम अद्भुत थे। रेड कारपेट पर सोने सी चमक रही सुनहले रंग की दो कुर्सियां राज दरबार के केंद्र में रखी थीं। यहां पर पूरे राजपुताना वंशावली के हर राजा की तस्वीर लगी है और उनके बारे में थोड़ा बहुत बताया गया है। यहां आकर एक मजेदार बात पता चली कि राजा मान सिंह द्वितीय गोल्फ के विश्व चैम्पियन रह चुके हैं। उनकी ट्रॉफी उस सभा निवास की शोभा बढ़ा रही थी इसके अलावा यहां राजा मान सिंह की एक तस्वीर लगी है जिसके जूते की नोक और आंखें 3D में है जो अपने आप में अनोखी लगी। अफसोस है कि यहां फोटो लेना प्रतिबन्धित था।

सभा निवास

सभा निवास से निकलकर निकलकर मैं राजशाही तोपों को देखने गया जहां छोटी-छोटी कई सारी तोपें रखी गई हैं, सच पूछो तो मुझे इसमें कुछ खास नहीं लगा। वहां तमाम दुकानें भी हैं जो राजस्थानी कल्चर के जुड़े परिधान और साज-सज्जा की तमाम चीजें बेच रहे थे।यहां एक अफसोस और हुआ कि ज्यादातर चीजें सिर्फ महिलाओं के लिए ही थीं, पुरुषों के लिए सिर्फ जूते ही थे।

ओपेन डांसिंग एरिया

महल का अगला हिस्सा बेहद शानदार था जो कि एक ओपेन डांसिंग एरिया हुआ करता था। यहां हर दरवाजों में बनीं कलाकृतियां अपनी ओर खासा आकर्षित करती हैं। इस एरिया मे आकर लगा कि पद्मावत फिल्म के घूमर गाने के सेट का आइडिया यहीं से लिया गया रहा होगा। यहां पहुंचकर एक बात और पता चली कि इस महल का एक हिस्सा अभी भी राजशाही परिवार के अधीन है और वहां जाने के लिए स्पेशल टिकट और मंजूरी की जरूरत पड़ती है। मन में थोड़ा दुख हुआ लेकिन इस बात का उत्साह भी था कि यहां से निकलकर दूसरे किलों में भी जाना है।

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पूरे तीन घंटे सिटी पैलेस में बिताने के बाद मैं निकल पड़ा था एक दूसरे किले की ओर, जिसका नाम है जयगढ़ किला। पहाड़ी की चोटी पर बने इस किले का रास्ता एकदम जंगल से होकर जाता है, ये सफर एकदम गजब का था। जयगढ़ के किले को सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाया गया था इसलिए इसको सबसे ऊंची वाली चोटी पर बनाया गया।

किले का एक हिस्सा

यहां पर रखी विश्व की सबसे बड़ी तोप, मेरे यहां आने की मुख्य वजह थी। तोप देखा तो हैरान रह गया…मेरी हाईट से ऊंचे तो उस तोप के पहिए थे। जय बाण नाम की वो तोप वाकई काफी बड़ी है। इस तोप के पास खड़े होकर आस-पास की पहाड़ियों को निहारने का सुख अलग ही है।

यहां की एक खासियत यह भी है कि इंदिरा गांधी ने अपातकाल के दौरान इसी किले में खजाना होने के शक में लंबी खुदाई करवाई थी। कहा जाता है राजा मान सिंह ने अकबर की तरफ से जब अफगानिस्तान को जीता था तब काफी खजाना लेकर वापस आया था और कुछ खजाना उन्होंने चोरी से इसी किले में दबा दिया था। खैर, उस खजाने की कोई पुष्टि नहीं हो सकी।

विजिटिंग लिस्ट तो अभी पूरी नहीं हुई थी लेकिन सूरज ढलने को था और मैं वापस दिल्ली के लिए चल पड़ा फिर से जयपुर आने की ख्वाहिश लेकर।


जयपुर का ये शानदार यात्रा अनुभव हमें लिख भेजा है मनीष साहू ने। मनीष ने इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। पेशे से कंटेंट राइटर और कॉपी एडिटर हैं। इसके साथ ही इनका यूट्यूब पर Allahabadi Ghumakkad नाम का चैनल है जिसके जरिये ये अपनी घुमक्कड़ी दूसरों तक भी पहुंचाते रहते हैं। मनीष बताते हैं, घुमक्कड़ी के साथ ही फोटोग्राफी में खासी दिलचस्पी रखता हूं। एक दो-महीने काम करने के बाद एक लॉन्ग डिस्टेंस ट्रिप की सख्त जरूरत पड़ती है।


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