फगुनाहट का सबसे खूबसूरत रंग है वृंदावन की विधवा-होली

आपने होली के कई रंग देखे होंगे; हरा, नीला, लाल, गुलाबी। पर हम आपको वृंदावन की ऐसी होली के बारे में बताने जा रहे हैं जिसका रंग सफेद है। आप भी सोच रहे होंगे कि सफेद भी कोई रंग होता है, वो भी होली का! ये रंग किसी और ने नहीं बल्कि हम सबने मिलकर कुछ औरतों को दिया है। लेकिन अच्छी बात ये है कि ये सफेद रंग एक दिन में कुछ घंटों के लिए ही सही, बाकी के सारे रंगों से घुल-मिल जाता है। मैं बात कर रहीं हूं वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर में मनाई जाने वाली विधवाओं की होली की। गोपीनाथ मंदिर वृंदावन के पुराने गोपीनाथ बाजार में हैं। यह मंदिर वृंदावन के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है।

सुलभ इंटरनेशनल संस्थान की पहल

2013 से लेकर हर साल सुलभ इंटरनेशनल गोपीनाथ मंदिर में विधवाओं की होली आयोजित करता है। इस मौके पर वृंदावन की सभी विधवाओं को गोपीनाथ मंदिर में आमंत्रित किया जाता है। सुलभ इंटरनेशल के चेयरमैन बिंदेश्वर पाठक खुद वहां मौजूद होते हैं। बिंदेश्वर पाठक ने वृंदावन के कई विधवाश्रमों को गोद लिया है और उनका खर्चा भी उठा रहे हैं।

मंदिर परिसर में एकत्रित विधवाएं

चारों और सफेद साड़ी में बैठी स्त्रियां

जब मैं अपनी दोस्त के साथ गोपीनाथ मंदिर तक पहुंची तो वहां चारो और सफेद साड़ी पहने औरतें घूम रही थीं। ज्यादातर विधवाओं का मूल निवास पश्चिम बंगाल था। उनके अलावा वहां और भी लोग थे पर लोकल लोगों के आने पर मनाही थी। साफ शब्दों में कहें तो मनचलों का आना बैन था। मंदिर के परिसर में सौ से भी ज्यादा विधवाएं थीं जो होली खेलने के लिए बेकरार बैठी थीं। मीडिया वालों, डॉक्यूमेंट्री वालों की भरमार थी वहां। सभी उन विधवाओं के होली खेलने वाले उस पल को कैमरे में कैद करने के लिए तैयार थे।

फूल, अबीर-गुलाल की पूरी व्यवस्था करता है सुलभ इंटरनैशनल

एक ओर महिलाओं और पुरुषों का समूह होली के गाने गा रहा था। दूसरी ओर फूलों और रंगों से भरी थालें सजाई जा रही थीं। कुछ ही देर में वहां रंगों और फूलों का ढेर लग गया था। उन रंगों को देख कर उन विधवाओं की आंखों में आई चमक को शब्दों में बयान कर पाना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है। उनकी आंखों की चमक किसी सूर्य के प्रकाश से कम नहीं थी।

खुशी और गम का एहसास एक साथ

होली की शुरुआत होते ही सभी विधवाएं हाथों में फूल और गुलाल लिए एक दूसरे को रंगने लगी। उन सफेद साड़ी में लिपटी औरतों को रंगों में देखने से ज्यादा सुखद एहसास इस दुनिया में कोई नहीं। उन औरतों की खिलखिलाहट से सारा माहौल खुशनुमा हो गया था। हम पर तो जैसे फूलों और रंगों की बारिश हो रही थी। होली का असली रंग तो यहां देखने को मिला था। सभी खुश थे। होली का मजा ले रहे थे। कुछ समय के लिए तो मैं अपने काम को भूलकर उनके बीच में मगन हो गई। मुझ जैसा इंसान जिसने सालों से होली नहीं खेली थी। पर यहां खेलने का मन कर रहा था। उनमें से एक बनने का मन कर रहा था।

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होली कितनी खास है जिसने हम अनजान लोगों को भी अपना बना लिया था। बिना नाम, जाति, धर्म जाने हम सब एक ही रंग में रंगे हुए थे और हममें से किसी को इन बातों से फर्क भी नहीं पड़ता था। पर जब-जब मैं उन मुस्कुराते चेहरों को देखती थी तो मेरे अंदर से एक ही आवाज आती थी कि यह सफेद रंग मैने ही तो दिया है इन्हें। जानती हूं सीधे रूप से न सही, पर अब तक इसका विरोध न कर कहीं न कहीं एक मूक समर्थन तो था ही मेरा। मेरा दिल बैठा जा रहा था। आंखें डबडबा रही थी।

होली है पर मुस्कान कहीं गायब है

एक बात और थी। वहां विधवाओं से ज्यादा मीडिया के लोग थे। जो आउटस्पोकन थीं वो तो होली के मजे ले रही थी पर जो इंट्रोवर्ट थी वो मीडिया को देख अपनी जगह से नीचे नहीं उतर रही थीं। कितना दुखद यह एहसास इस कैमरा और पब्लिसिटी के जमाने में जिनके लिए आयोजित हुआ था प्रोग्राम, वही इसका मजा नहीं ले पा रहीं थीं। काश कैमरे में कैद करने से ज्यादा सभी उनके साथ होली खेलते और उनसे बाते करते। सच में स्वार्थी है इंसान। अपने फायदे से ज्यादा उसे कुछ नहीं सूझता।

हमसे बात करतीं अम्मा, जो अपने आंसू चाह कर भी रोक न पायीं

क्यों बात करना एक उपकार हो गया

होली खेलते-खेलते हम सभी महिलाओं से मिल रहे थे। सभी हमें ऐसे गले लगा रही थीं जैसे बरसों से हमें जानती हों। हमारे साथ खुलकर नाचतीं और एक सांस में अपने जीवन की सारी व्यथा कथा हमें सुना देतीं। उनकी होंठों पर आयी मुस्कान किसी नवजात बच्चे की मुस्कान से कम नहीं थी। इसी भीड़ में हमें एक 70 साल की बुजुर्ग महिला मिलीं जो हमसे बात करते-करते इतनी भावुक हो गईं कि रो पड़ीं। उनकों रोता देख हमने उन्हें गले से लगा कर चुप कराना चाहा, तो एक बच्चे के समान वो हमसे लिपट गईं। अचानक हमारे पैर छू कर हमें शुक्रिया कहने लगी। मुझ पर तो लानत का पहाड़ टूट पड़ा। लगा जैसे उनके दुःखों का कारण मैं ही हूं। वो अकेली नहीं थी। उनके जैसी बहुत सी थी जो मेरी पूरी उम्र से भी ज्यादा समय से वहां रह रही थी।

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क्यों हमने समाज के दो जेंडर के लिए दोहरा जीवन चुना है। जहां पुरूष पत्नी के मर जाने पर दोबारा शादी कर नया जीवन जी सकता है वहीं औरतों के लिए अंतहीन और काला-पानी से भी बदतर सजा मुकरर्र की जाती है। किसने अधिकार दिया हमें किसी के जीवन मे इतना अकेलापन भरने का। इतना ज्यादा अकेलापन कि किसी अंजान का उनसे प्यार से बात करना भी उन्हें खुद पर किया उपकार लगे।

हम सभी डिबेट, टीवी, फेसबुक पर महिलाओं के अधिकार की बातें तो करते रहते हैं। पर एक ही पल में मुझे ये सब दिखावा लगने लगा। शायद वो सब कोरी बातें थीं, केवल बातें। अगर उनमें सच होता तो इन औरतों के जीवन में इतना आकेलापन नहीं होता।

इनकी खूबसूरती ने छू लिया मेरा दिल

एक ऐसा सवाल जिसने हिला दिया मेरा वजूद

कैमरा एक अद्भुत आविष्कार है, जो लोगों को दिखावा करने का मौका भी देता है और उसे सबके सामने परोस भी देता है। इसलिए ये भी मानिए कि स्क्रीन पर हर दिखने वाली चीज सच नहीं होती। इसी होली के माहौल में हमें एक 80 साल की महिला मिलीं। देखने में बहुत ही खुशमिजाज थीं वो। भजन गातीं, नाचतीं, खूब सारी बातें करतीं। वो वृंदावन के वृद्धाश्रम में लगभग 27 सालों से रह रहीं हैं। कहने के लिए उनके पास चार बेटे और सात-आठ नाती पोते थे। पर कई सालों से उनसे मिलने कोई नहीं आया था। उनकी आंखों में आंसू नहीं थे न ही दुःख का कोई निशान। मेरी दोस्त के हाथ में कैमरा था। उन जैसी खुशमिजाज अम्मा मैने अभी तक तो नहीं मिली थीं यहां।

कुछ देर बाद मेरी दोस्त कैमरा ले गई और मैं उनके पास बातें करने के लिए बैठ गई। अब अलविदा कहने का वक्त था। मैने उन्हें गले लगाकर बाए कहना चाहा। उन्होंने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लिया। अब वो थोड़ी उदास थीं, मेरे हाथों को उन्होंने और जोर से पकड़ लिया। उन्होंने मेरी तरफ मासूम सा चेहरा बना कर एक सवाल किया, ‘मैं कैसी दिखती हूं?’ सवाल बहुत मासूम सा था और उससे भी मासूम था उनका चेहरा। बच्चों जैसी उम्मीद भरी निगाहें मुझ पर ही टिकी थीं। उनके एक साधारण से सवाल ने मुझे हिला कर रख दिया था। एक साथ कई सवाल उठ खड़े हुए थे मेरे अंदर। कुछ सेकंड रुककर मैंने जवाब दिया, ‘आप बहुत सुंदर हैं।’ अपने आपको सांत्वना देते हुए बुदबुदाते हुए कहती ‘हां, अब बहुत कुछ खा नहीं सकती इसलिए कमजोर हो गई हूं।’

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चाहते हुए भी मैं अपनी आंखों से आंसू बहने से रोक नहीं पायी। मैं उन्हीं औरतों के जैसी हो गई थी। जो दिख तो शांत रही थी पर उनके अंदर तूफान चल रहा था। वो सब बहुत कुछ कहना चाहती थीं पर सुनता कौन? हम जैसे लोग किसी एक दिन होली के बहाने उनसे मिलने आ जाते हैं। बाकी 364 दिनों का क्या?

गोपीनाथः धूम मची होली की

क्यों जाएं गोपीनाथ की इस होली में

मैनें कई सारे लोगों को होली खेलते हुए देखा है। भांग, शराब के नशे में लड़कियों से छेड़ते हुए या सड़क पर मनमानी करते हुए। क्या सच में होली का यही रूप है या हमने अपने फायदे के लिए होली को बदरंग कर दिया है। शोर, हुड़दंग, खराब माहौल के बीच हम सब कहीं न कहीं अपनेपन वाली होली के भाव को मिस करते हैं। होली के असली रंग को देखना चाहते हैं तो वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर के इस होली में जरूर आएं। आपके पास तो बहुत लोग हैं होली खेलने के लिए। पर कई लोग ऐसे भी हैं जिसे हमारे समाज ने अलग-थलग कर दिया है। आपके साथ बिताए दो मिनट उनके लिए कई महीनों की खुशी बन सकती है। सही मायनों में भी तो यही मतलब है न होली का, प्यार बांटना बिना किसी धर्म, जाति, लिंग देखे। बिल्कुल खालिस प्यार जिसमें कोई मिलावट न हो।

क्या हम दे सकते हैं ऐसा प्यार, जिससे हमारा कोई फायदा जुड़ा न हो। सच मानिए जितना आप देंगे उससे कई ज्यादा आप अपने साथ ले जाएंगे। और मैं शर्त लगा सकती हूं लाइफ की बेस्ट होली होगी ये आपकी।

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