दूसरी सदी की एक टेक्नीक कैसे दिला रही है हजारों को रोजगार

सदियों पुराना एक विज्ञान आज इक्कीसवीं सदी में हजारों लोगों के जीवनयापन का स्रोत बन चुका है। एक ऐसी टेक्नीक जो देश के पहाड़ी इलाकों से निकलकर दूरदराज के राज्यों तक फैल गई है। ‘घराट परियोजना’, जिस टेक्नीक को उत्तराखंड के लोगों ने फालतू समझ कर त्याग दिया था, घराटों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था, आज वही घराट ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में बसे परिवारों के लिए खुशहाली की वजह हैं। घराट को मुख्यधारा में लाने का श्रेय जाता है हेस्को को। हेस्को यानि कि हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजरवेशन ऑर्जेनाइजेशन। ये उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से संचालित होता है।

पद्मश्री से सम्मानित अनिल जोशी ने हेस्को की नींव 1981 में रखी थी। हेस्को के अस्तित्व में आने से पहले अनिल जोशी एक कॉलेज में पढ़ाते थे। हेस्को की शुरुआती टीम बनाने में उनके शिष्यों और साथी शिक्षकों ने बहुत साथ दिया। अनिल जोशी हेस्को को एनजीओ कहने की बजाय आंदोलन कहना ज्यादा पसंद करते हैं।

हेस्को आखिर है क्या?

हेस्को, अपने सार में प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों के सही रखरखाव और इस्तेमाल का एक प्रक्रम है। ये प्रक्रम न केवल जिंदगियां संवारने में प्रकृति की मदद लेता है बल्कि प्रकृति की भरपूर सेवा करने में भी यकीन रखता है। ये प्रक्रम लोगों को ये याद दिलाने की मुहिम में लगा हुआ है कि प्रकृति का दोहन नहीं करना बल्कि उसके साथ किसी दोस्त की तरह रहना और तरक्की करना है। हेस्को गांवों के जीवन, संसाधनों से प्रेरणा लेता है और ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए तैयार रहता है। हेस्को का मूल उद्देश्य है, गांव से पलायन रुके। गांव के लोग यहीं रहकर अपने पैरों पर खड़े हों और सम्मानजनक जिंदगी बिताएं।

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पद्मश्री अनिल जोशी

बीते दशकों में डॉ अनिल जोशी और उनकी टीम ने हेस्को के माध्यम से हिमालय की छांव में बसे गांवों में जीवन की एक नई उमंग जगा दी है। उनके द्वारा चलाए गए प्रोजेक्टों और निकाले गए समाधान से बेहतरीन परिणाम प्राप्त हुए हैं। इसी करण हेस्को को राष्ट्रीय पहचान मिली है। हेस्को पर्यावरण विज्ञान को सही मायनों में समझने और कम लागत वाली तकनीक ईजाद करने के लिए प्रसिद्ध है।

हेस्को की टीम हिमालय के अंचल में क्षेत्रीय शोध करती है। ये लोग ग्रामीणों की सेवा करते हैं, ग्रामीणों सा जीवन जीते हैं और अपनी जरूरतों के लिए पूर्ण रूप से पहाड़ों और उनके संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। हेस्को के काम के उद्देश्य और प्रभाव को समझने के लिए, हमें उस व्यापक गरीबी को समझना चाहिए जो पहाड़ी इलाकों में ज्यादातर है। भारत के ग्रामीण पहाड़ी गांवों और सीमा क्षेत्रों में लोगों के दिन-प्रतिदिन जीवन की समस्याएं। पलायन, पहाड़ों का कटाव, जल स्रोतों का अभाव और जीविका में काफी तंगी। इन्हीं सब बातों पर हेस्को काम कर रहा है।

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घराट परियोजना

पर्यावरण और विज्ञान के सही जोड़: हेस्को प्रोजेक्ट्स

हेस्को के कई प्रोजेक्ट हैं जिन्होंने पहाड़ी गांवो को नई शक्ति दी है। हेस्को वर्षा नदियों पर और जल संरक्षण को साथ में लेकर काम कर रहा है। घराट की मदद से पहले सिर्फ गेंहू पीसा जाता था। हेस्को द्वारा थोड़ी फेर बदल के बाद अब इस से गेंहू तो पीसा ही जाता है, साथ-साथ सुविधा के अनुसार बिजली भी उत्पन्न की जाती है। घराटों ने स्थानीय लोगों की रोजगार क्षमता को भी बढ़ाया है, जहां एक व्यक्ति प्रति माह 5000-6000 ही कमा पा रहा था, अब उसकी कमाई 20,000-25,000 हो गई है। इन आंकड़ों से आप समझ सकते हैं कि अगर यह तकनीक हमारे देश के हर गांव में आ जाए तो गांवों की अर्थव्यवस्था कमजोर न रहेगी। न काम की कमी होगी जिसकी वजह से पलायन झेल रहे युवाओं को बहुत कुछ बुरा सहना पड़ता है।

रीबर्थ प्रोेजेक्ट के बारे में बताते अनिल जोशी

पर्यावरण और लोगों की भावना को दिया नया रूप

ये तो बात हुई गांवों में रोजगार को बढ़ाने की। इसके अलावा अनिल जोशी के बेहतरीन प्रोजेक्टों में से एक है: प्रोजेक्ट रीबर्थ। अनिल जोशी का कहना है कि हमारी नदियों में अब वो ताकत नहीं रही जिससे वो हर चीजों को शुद्ध रख सकती थीं। इसलिए नदियों को बचाने के लिए एक मास्टर प्लान तैयार करना ही पड़ेगा। प्रोजेक्ट रीबर्थ के तहत शव-दहन के बाद बची हुई अस्थियों को प्रियजन मृतक के पसंदीदा पेड़ के बीजों के साथ मिट्टी में मिला कर रोप देते हैं। ये एक बेहतरीन प्लान है, जिससे नदियों को प्रदूषित होने से भी बचाया जा सकता है, वहीं अपने प्रियजनों हमेशा के लिए अपने साथ रखा जा सकता है। हेस्को के कर्मचारियों ने बताया कि लोग उस पेड़ को अपने प्रिय जन की तरह ही प्रेम करते हैं।

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आप लोग भी सोचिए न, छोटे-छोटे ही सही, सार्थक कदम उठाकर हम सब अपने पर्यावरण की किस तरह सुरक्षा कर सकते हैं। बहानेबाजी छोड़िए, प्रकृति को संजोकर रखने में अपने हिस्से का प्रयास कर डालिए।


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