गंगा में समाये हरिद्वार और ऋषिकेश की रोमांचक यात्रा का सफर

साल 2017 के अप्रैल महीने के बात है। अपनी रोजाना की जिंदगी से मैं उकता गयी थी। मेरी जिंदगी घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक ही सीमित रह गयी थी। इसी बीच मैं और मेरी दोस्त ने एक शॉर्ट ट्रिप पर जाने का प्लान बनाया। हम दोनों ही रोजमर्रा की भागम-भाग से थक चुके थे। बॉस हमें लंबी छुट्टियां तो देने से रहा, तो हमने दो से ढाई दिनों वाला घूमने का प्लान बनाया। हमारी खोज हमें ऋषिकेश ले गई। हमने अपने बैग पैक किए और जाने के लिए रवाना हुएं।

हमें आईएसबीटी से दोपहर 1 बजे हरिद्वार के लिए बस मिल गयी थी। बस का किराया मात्र 250-275 रुपए के बीच था। अगर आप कभी भी हरिद्वार के लिए बस से रवाना होते हैं तो पानी की व्यवस्था जरूर कर लें। दिल्ली पार होते ही बहुत देर तक पानी नहीं मिलता और जो मिलता है उसका स्वाद खारा होता है। इसलिए इतना पानी रख लें जो 6-7 घंटों के लिए काफी हो।

पूरे रास्ते हम गर्मी, धूल और पानी की कमी से परेशान होते रहे। कभी-कभी सामान बेचने वाले भी बस में चढ़ जाते थे। जिनसे हमारा मनोरंजन भी हो रहा था। पेन, टेबल शीट, चूरण, पानी और पता नहीं क्या-क्या। सबके विज्ञापन करने का तरीका एक-दूसरे से अलग था। जिसमें से एक का तो दावा था की सिर्फ रूमाल के जरिए दांत तोड़ सकता है।

 हरिद्वार में हर की पौढ़ी

शाम 5:30 बजे हम हरिद्वार पहुंचे। एक जानने वाले ने रहने के लिए शांति निकेतन का सुझाव दिया था। हम शांति निकेतन पहुंचे ही थे कि वहां के गेटकीपर ने हमें रोक दिया। वो हमसे तरह-तरह के सवाल करने लगा जैसे कहां से आए हो, क्यों आए हो, क्या काम है? उसने लगभग डांटते हुए हमें कहा कि यहां सिर्फ पूजा के लिए रुका जाता है, ये कोई होटल नहीं हैं। कहते-कहते वो हमें ऊपर से नीचे तक घूरने लगा, जैसे हम कोई बिगड़ैल बच्चे हों। हमारे कपड़ों से हमें जज किया जा रहा था। लेकिन हमने बहुत ही सामान्य कपड़े पहने हुए थे दो ने सादे से टी-शर्ट पैंट पहने थे और एक ने कुर्ता-सलवार पहन रखा था। युवाओं को लेकर लोगों का ऐसा व्यहवार हमेशा मुझे चोट पहुंचाता है पर कहते है ना, जो होता है अच्छे के लिए होता है।

हरिद्वार के हर-की-पौढ़ी में हमें गंगा किनारे अच्छा कमरा मिल गया। वहां से गंगा सिर्फ 4 कदम की दूरी पर है। सामान रख कर हम टहलने के लिए बाहर निकले। चारों तरफ लोग ही लोग थे। शाम की आरती का वक्त था। घंटियों की आवाज और मंत्रों के जाप से गंगा जीवित हो उठी थी। लोग गंगा में डुबकी लगाने के लिए कतार में खड़े थे। हम भी गंगा के पास जाकर बैठ गए। गंगा के साथ यह मेरी पहली मुलाकात थी। पहली नजर में ही गंगा ने मेरे दिल में एक अलग जगह बना ली थी। गंगा आरती और लोगों की चहल-पहल वहां बहुत अच्छी लगती है। तरह-तरह की दुकानें जिसके बाहर सिंदूर के ढ़ेर लगे हुए थे। जो बहुत ही लुभावने लग रहे थे।

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गंगा किनारे

हम जी खोल कर बच्चों कि तरह पानी में खेलने लगे आस-पास बहुत से पंडित भी घूम रहे थे। जो लोगों को पूजा और दान करने के लिए उत्साहित कर रहे थे। हमारी एक दोस्त ने उत्साहित होकर पूर्वजों के लिए पूजा करने की ठानी। कुछ ही देर में उसके परिवार के नाम का एक दीया गंगा में तैर रहा था। वो अकेला दीया नहीं था उस जैसे हजारों दीये गंगा में तैर रहे थे। कुछ ही देर में गंगा दीये की रोशनी से जगमगा उठी। भूख अब हमें परेशान करने लगी थी। चोटीवाला हरिद्वार में खाने के काफी मशहूर है, पर मेरी राय मानें तो आपको किसी छोटी दूकान में बेहतर खाना मिलेगा।

हरिद्वार
हरिद्वार के पंडित सेवाशर्मा दूध वाले की दुकान

अगर एक शब्द में कहूं चोटीवाले के लिए तो ऊंची दुकान फीके पकवान थे। बेस्वाद खाने के बाद हमारा तो मन खराब हो गया। बुदबुदाते हुए हम कमरे की ओर बढ़े। गंगा के इतने पास होते हुए हम कमरे में कैसे बैठे रह सकते थे। जल्द ही हम गंगा किनारे आके बैठ गए। रात के साढ़े 10 बजे होंगे और गंगा अब बिल्कुल शांत नहीं थी। शाम के मुकाबले रात में गंगा का बहाव बहुत बढ़ जाता है। पानी बहुत ठंड़ा हो जाता है। पानी की धार इतनी तेज थी कि हमारे पैर पानी में बहे जा रहे थे।

हरिद्बार
गंगा नदी में बच्चों की तरह खेलती हुई लड़कियां

इतने तेज बहाव में किसी का ठहर जाना आसान नहीं था। हम एक-दूसरे का सहारा बने और पानी में डुबकी लगाने के लिए चल पड़े। उसके बाद डुबकी के बाद डुबकी हम लगाते गए। रात 11 बजे थे। अब न गंगा शांत थी और न हम। गंगा किनारे हमने खुद को बंधन मुक्त महसूस किया। हर-की-पौढ़ी में चहल-पहल तो अभी भी थी। लोग गंगा किनारे बिस्तर बिछा कर सो रहे थे और हमें अब वापस कमरे में जाना था।

ऋषिकेश की रिवर राफ्टिंग

अगली सुबह मेरी आंख जल्दी खुल गयी थी। 5 बजे गंगा आरती का वक्त था। वैसे मेरी कोई खास रुचि नहीं है आरती में पर गंगा में तो थी। हम लोग गंगा के पास बने आरती स्थल की तरफ भागे। आरती अभी चल ही रही थी। मेरी दोस्त आरती लेने के लिए आगे बढ़ी और मैं गंगा की ओर। मुझे गंगा बुला रही थी। मैंने ना आगे देखा ना पीछे और गंगा में छलांग लगा दी। गंगा ने मुझे जोर से गले लगा लिया।

हमारी अगली मंजिल थी, ऋषिकेश। ऋषिकेश की रिवर राफ्टिंग बहुत मशहूर है। सही मायनों में वो इस तारीफ की हकदार भी है। मात्र 45 रुपए/प्रति व्यकित कि दर से ऋषिकेश के लिए ऑटो मिल जाता है। ऑटोवाले ने हमें एक रिवर राफ्टिंग आयोजित करने वाली एजेंसी के पास उतारा। आपको ऐसे दर्जनों एजेंसियां वहां मिल जाएंगे, जो राफ्टिंग करवाते हैं। 2500 से बात शुरू होकर 1200 पर तय हुई।

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अगर आप अच्छी भाव-तोल करना जानते हैं तो इससे भी कम में रिवर राफ्टिंग का मजा ले सकते हैं। हमारे साथ पांच लोग और थे, ना उन्होंने ना हमने किसी ने बात करने की कोशिश नहीं की। हम 8 लोग गाड़ी में बैठ कर गंगा तट तक पहुंचे। उससे पहले हमें हेलमेट और सेफ्टी जैकेट पहना दिए गए थे। जैकेट के कलर को लेकर हम पहले ही ट्रेनर से काफी बहस कर चुके थे।

हरिद्बार
ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग के लिए बोट में बेठी दो कुड़ियां

इंस्ट्रक्टर हमें राइड से पहले के इंस्ट्रक्शन बता रहा था। जब आप जाएं तो निर्देशों को ध्यान से सुने, क्योकिं यही राफ्टिंग में आपकी मदद करेंगी। बोट को लेकर हम पानी में उतरे और हमारा सारा ध्यान इंस्ट्रक्टर के निर्देशों पर था। जैसा-जैसा वह कहता हम करते जाते। राफ्टिंग के बीच कुल 6 रैपिड आते हैं, जो राफटिंग के रोमांच को बढ़ाता है। पहला स्वीट सिक्सटीन जो आपको हल्का सा अनुभव देता है राफ्टिंग के खतरों का। उसके बाद क्रॉस फायर, थ्री ब्लाइंड माइस, द वॉल मध्यम दरजे के डर पैदा करने वाले रैपिड हैं। एक अनुभवी इंस्ट्रक्टर के साथ राइड का मजा दोगुना हो जाता है। हमारा इंस्ट्रक्टर बहुत ही समझदार था। उसे हमारी सुरक्षा पूरा ख्याल था। आप कभी भी जाएं तो अच्छी एजेंसी और बेहतर इंस्ट्रक्टर के साथ जाएं। कम अनुभवी इंस्ट्रक्टर के साथ राइड जानलेवा साबित हो सकती है। सही बहाव को देखकर इंस्ट्रक्टर ने हमें पानी में उतरने के लिए कहा और उतर कर हम बोट के साथ बहते जाते थे। वो एहसास थोड़ा डरावना था। हमें बोट पर वापिस चढ़ना था।

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ऋषिकेश रिवर राफ्टिंग

जिसमें हम तीनों को काफी कठिनाई आ रही थी क्योंकि इसके लिए बहुत ताकत चाहिए। हमारे साथ आए लड़कों ने हमारी मदद की। हमारे बीच की शांति अब टूटने लगी थी। हमारे बीच हंसी-मजाक अब शुरू हो गया था। शायद हम लोगों के डर ने ही हमें एक साथ कर दिया था। उसके बाद दो बड़े रैपिड आए, रोलर कोस्टर और गोल्फ कोर्स, जिसमें लगभग हमारी नाव पलट ही गयी थी, पर हमें अपने इंस्ट्रक्टर पर पूरा भरोसा था।

ऋषिकेश में क्लिफ जम्पिंग

रोमांच अभी खत्म नहीं हुआ था। तभी हमारे इंस्ट्रक्टर ने हमें एक क्लिफ दिखायी जिसकी उंचाई किसी 6 मंजिला इमारत से ज्यादा थी। जहां से सब लोग नीचे पानी में कूद रहे थे। हमें भी क्लिफ जम्पिंग का मौका मिला। हम सब उस ऊंची पहाड़ी के ऊपर कतार से खड़े हो गए। कुछ तो तुरंत ही कूद गए और कई लोगों ने कूदने से मना कर दिया। मेरी दोस्त तो बड़ी मूश्किल से नीचे कूदी। अब मेरी बारी थी। मैंने भी अपनी सारी शक्ति समेट कर पानी में छलांग लगा दी। कुछ पलों में मैंने 6 मंजिला इमारत की दूरी पार कर ली थी।

पानी हमें अपने साथ बहाये ले जा रहा था। पकड़ने के लिए पथरीली चट्टान थी जिससे हमारे हाथ छिल गए थे। बड़ी मशक्कत कर के हम किनारे तक पहुंचे थे। आपको किल्फ जम्पिंग का मौका मिले तो कूदते वक्त अपने हाथ पैर को अपने शरीर से साथ सटा कर रखें और पानी में बिल्कुल सीधे छलांग मार दे, वरना आपको काफी चोट लग सकती है। इसके बाद गंगा बहुत शांत हो गई। हम गंगा में उतरने के लिए तैयार थे। इंस्ट्रक्टर से पूछ कर हम सबने गंगा में छलांग मार दी और बोट से थोड़ा दूर निकल गए। मेरी दोस्त थोड़ा डर गयी थी इसलिए उसने हमसे दूर बोट पर रहने की ठानी। कुछ देर बाद उसका संकोच टूटा गया और वो भी हमारे पास आ गयी।

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हम गंगा के बहाव में बह जा रहे थे। जैसे गंगा हमें अपनी गोद में खिला रही हो। रामझूला बिल्कुल हमारे ऊपर से गुजर गया। ऊपर खड़े लोग हमें देख रहे थे। इस तरह गंगा को हमने अलविदा कहा। हमारे पास समय नहीं था इसलिए हमने लक्ष्मण झूला जाने का प्लान छोड़ कर बस अड्डे का रुख किया। प्राइवेट बस से हम दिल्ली के लिए रवाना हुए। 500 रुपए में एसी बस हमें किफायती लग रहा था। पर आधे रास्ते में जाकर बस की सच्चाई सामने आयी। बस का एसी काम ही नहीं करता था।

गंगा ने बुलाया और हम चल पड़े

हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते लोगों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया और बस रुकवा दी। बस-ड्राइवर और लोगों के बीच विवाद चल ही रहा था कि हमारा ध्यान पास बहती नदी पर गया जो शायद गंगा का ही एक भाग था। वहां कुछ लोगों का घर था। कुछ बच्चे पानी में नहाने के लिए छलांग लगा रहे थे। गंगा का कोई भी हिस्सा आप देखें तो सुंदर ही लगता है।

आखिरकार ड्राइवर ने सबको 400 रुपए वापिस किए। अब समस्या थी घर जाने कि क्योंकि हम सब को अगले दिन ऑफिस भी जाना था। बहुत सोचने के बाद रात को बस लेने का मन बनाया। अब हमारे पास बहुत समय था। शायद गंगा हमें वापस बुला रही थी। हम लक्ष्मण झूला देखने के लिए बढ़ चले। वहां से गंगा झिलमिल सी दिख रही थी। हमने पुल पार किया और किनारे पर बैठकर आइसक्रीम के मजे लिए। वहीं कुछ लोग गिटार बजाकर गाना गा रहे थे। हम वहीं बैठे गए।

फिर वापस लौटे, 11 बजे की बस पकड़ कर हम घर कि और रवाना हो गए। बस हमारा सफर इतना सा ही था। छोटा सा 2 दिन का ट्रिप। हममें से बहुत से लोग हैं जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में फंस से गए हैं। तो अपने लिए जरूर समय निकाले। ऋषिकेश छोटे टूर के लिए बिल्कुल सही जगह है। गंगा का स्पर्श मिनटों में आपकी थकान को खत्म कर देती है और राफ्टिंग आपकों एक नया एहसास देता है।

(ये ब्लॉग ‘चलत मुसाफ़िर’ के साथ इंटर्नशिप कर रहीं शिल्पी ने संपादित किया है)

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