हरिद्वार जाने से पहले ये पढ़ लो, लुटने से बच जाओगे!

धर्म को व्‍यापार बनते देखना है तो किसी धार्मिक स्‍थल का दौरा कर लेना चाहिए। यहां के दौरे से आपको धार्मिक पोंगा पंडितों की बदसूरती नजर आएगी। हालांकि मेरी हर‍िद्वार यात्रा धर्म और इसके व्‍यापार बनने की खोज न थी। लेकिन जब वहां से लौटा तो सिर्फ यही एक बात खल रही है तो लिखना इसी पर बेहतर समझा। मैं आपको कुछ ऐसी बातें बताने वाला हूं जिससे आप जैसे भले मानुष इस बाजारू दुनिया के शिकार न हों और लुटने से बच जाएं। वैसे तो हर इंसान के अपने-अपने अनुभव होते हैं। लिहाजा ये भी मेरा अपना है। शायद ये आपके साथ न घट‍ित हो, लेकिन हो तो इससे बचने के उपाय यहां हैं।

मैं दिल्‍ली से हरिद्वार के लिए कश्मीरी गेट बस अड्डे से निकला। यहां से आपको बस आसानी से मिल जाएगी। चूंकि हरिद्वार की दिल्‍ली से दूरी 210 किमी है तो ये सफर यही कोई 5 घंटे का था। अगर आप भी ट्रैफिक के झाम में न फंसे तो इतने ही घंटे का सफर होगा। तो हम (मैं और 3 दोस्‍त) हर‍िद्वार शाम 6 बजे के करीब पहुंचे। इतनी देर से पहुंचने का सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ वो ये था कि गंगा आरती हम मिस कर गए थे। लेकिन इसके बाद भी हरिद्वार पहुंचने की खुशी बहुत थी। अब यहीं से हमें लूटने की कोश‍िशें शुरू हो गई। आप भी पढ़ें कैसे,

स्पीड से ज्यादा तो इनके रेट हैं

ई-रिक्‍शा वालों की लूट

हम सब जैसे ही हरिद्वार के बस अड्डे पर उतरे वहां ई रिक्‍शा वाले हमें भरमाने (बेवकूफ बनाने की क्रिया) लगे। हम सबसे पहले ‘हर की पौड़ी’ (हर‍िद्वार का मुख्‍य धार्मिक स्‍थल) जाना चाहते थे। जब हमने ये बात ई रिक्‍शा वालों से बताई तो उन्‍होंने 100 से 150 रुपए मांगे। उनसे जब दूरी पूछी गई तो कहा गया यहां से बहुत दूर है। हालांकि, हम सब उनसे थोड़ा तेज निकले और जीपीएस से दूरी देख ली। बस अड्डे से यही कोई ढाई से तीन किमी की दूरी रही होगी। ऐसे में हमने नए शहर को देखते हुए हर की पौड़ी जाने का फैसला लिया। अगर आप भी कभी बस अड्डे पर उतरें तो टहलते हुए हर की पौड़ी जा सकते हैं। अगर आपकी उम्र ज्‍यादा है तो ई रिक्‍शा वाले से कोतवाली तक चलने को कहें। वो 10 रुपए सवारी के तौर पर लेगा। यहां से आप बाजार देखते हुए हर की पौड़ी जा सकते हैं।

गंगा की धार की तरह ही तेज हैं यहां के टीकाधारी

जेब पर डांका डालते टीका वाले

हम टहलते हुए हर की पौड़ी पहुंच गए थे। इस जगह में कुछ ऐसा करिश्‍मा है कि आप यहां पहुंचते ही सफर की सारी थकान भूल जाएंगे। घाट पर बैठ कर कल-कल बहती गंगा को देखना और उसकी आवाज को सुनना इतना गजब का एहसास है जो और कहीं नहीं मिलेगा। ये गंगा आपको बताती है कि असल में ताकतवर कौन है। हम जो ताकतवर होने के भ्रम में जी रहे हैं या वो जो बस बहते हुए सबको समेटे आगे बढ़ रही है। वैसे तो हमारा प्‍लान गंगा में नहाने का था, लेकिन शाम काफी हो गई थी इस लिए ये प्‍लान वहीं गंगा में बहा दिया गया।

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हम सबने बस गंगा के पानी से हाथ पैर धुले और वहां किनारे गंगा के पानी में पैर डाल कर बैठ गए। कुछ देर ऐसे ही खामोशी से बैठने के बाद हम सब घाट पर घूमने निकले। अब यहीं से लुटेरे एक्‍ट‍िव हो गए। एक महिला हमारे पास आई और बिना बात किए या पूछे हमारे माथे पर टीका लगा दिया। मैंने बचपन से सीखा है कि दान स्‍वैच्‍छ‍िक होता है। लेकिन यहां टीका लगाने का मतलब है कि आपको उसे कुछ देना ही होगा। और ये स्‍वैच्‍छ‍िक तो कतई नहीं हैं। अगर आपने 10 रुपए से नीचे दिया तो वो आपको भला-बुरा भी कह सकती है। तो टीका संभल कर लगवाएं।

पर्ची वाले लुटेरे

इसके अलावा घाट पर गंगा आरती के नाम पर भी लूट मची हुई है। गंगा आरती के लिए चंदा देने के नाम पर पर्ची काटने का चलन है। आप कहीं भी हों आपको खोज कर ये पर्ची वाले आपके पास आ धमकेंगे और आपसे आरती में सहयोग करने की डिमांड करने लगेंगे। कहेंगे, ‘ये रुपए सीधा शंकर को समर्पित हो रहा है।’ आप अगर जाल में फंसे तो 500 से 1000 रुपए का चूना लगना तय है।

कमरे के नाम पर खींचा-खींची

घाट पर हम टीका लगवाकर और पर्ची वाले लुटेरे को भरमाकर आगे बढ़ गए थे। अब बारी आती है हरिद्वार में ठहरने की व्‍यवस्‍था खोजने की। तो हुआ ये कि यहां लूट तो नहीं है, लेकिन आपको खींच कर होटल दिखाने की प्रथा जरूर है। आप जैसे-जैसे बाजार में बढ़ेंगे होटल वाले आपसे कमरा देखने की डिमांड करने लगेंगे। कई तो दूर तक आपका पीछा भी करेंगे। मानते हैं ये मार्केट है और सब अपने लाभ में लगे हैं। लेकिन आप किसी को परेशान करें ये कैसा मार्केट?

अगर आप हर‍िद्वार जाने का प्‍लान कर रहे हैं तो वहां धर्मशालाओं में रुक सकते हैं। यहां लखनऊ धर्मशाला, सिंधी धर्मशाला और गोरखनाथ धर्मशाला जैसी कई धर्मशालाएं हैं। इनमें से लखनऊ धर्मशाला हमें सबसे किफायती लगी। हालांकि हम होटल में रुके थे, क्‍योंकि हमें घाट पर देर रात तक घूमना था और धर्मशाला 9 बजे तक बंद हो जाती है। ऐसे में होटल ही बेहतर था। ऑफ सीजन में होटल अच्‍छे रेट पर मिल जाएंगे।

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दूध चढ़वाने का कारोबार

रात होटल में गुजारने के बाद हम सब सुबह 5 बजे फिर घाट पर पहुंच गए। इसका एक और आख‍िरी मकसद था गंगा आरती को देखना। हम थोड़ा जल्‍दी पहुंच गए थे तो हमने वहां फोटो खींचनी शुरू कर दी। घाट पर लोग नहा रहे थे। कोई वहीं पूजा कर रहा था तो कोई पिंड दान। गंगा अपनी पूरी वेग के साथ बह रही थी। ये सब देखते हए कब डेढ़ घंटे बीत गए पता ही न चला। इसके बाद आरती हुई जो हमने देखी। लगा यात्रा पूरी हो गई है। लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी था। इसके बाद मेरा घाट से उगते हुए सूर्य को देखने का भी काफी मन था। आरती होते-होते दूसरी ओर सूर्य भी निकल आया था। हम घाट पर बैठकर उगते हुए सूर्य को दखते रहे। आसमान में छाई लालिमा और दूरे बादलों की ओर से निकलता सूर्य। ये दृश्‍य बेहद मनोरम था।

इसके बाद हमने अपना प्‍लान जो बीती रात गंगा में बहा दिया था, उसे फिर से खोज निकाला। अब हम सब नहाने को तैयार हो गए। अभी हम प्‍लान कर ही रहे थे, एक औरत एक डिब्‍बे में दूध जैसी कोई चीज (दूध जैसी कोई चीज इस लिए कि वो जो भी था दूध तो नहीं था) हमारे पास लाई और कहा, ‘सुबह पानी गर्म रहता है तुरंत नहा लो.’ हम सबको लगा ये औरत श्रद्धालु है, हम सब उसकी बात अभी मानते ही कि पास ही एक आदमी नहाने लगा। ये औरत तुरंत उसकी ओर लपकी और उसे एक ग्‍लास में वही दूध जैसी चीज दी और कहा, ‘लो दूध चढ़ा दो’ उस भले मानुष ने दूध चढ़ा दिया। फिर ये महिला इंतजार करने लगी और जैसे ही वो आदमी नहाकर निकला उससे 20 रुपए ले लिए।

फिर वो महिला हमारे पास आई। हम अबतक समझ चुके थे। तभी दो महिलाएं और आ गईं वो हमें यही दूध चढ़ाने की बात कहने लगीं। देखते ही देखते ये तीनों महिलाएं इलाके को लेकर आपस में भ‍िड़ गईं। उन सबको लड़ता छोड़ हम वहां से कट लिए और कहीं और जाकर गंगा में डुबकी लगाई।

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मंदिरों में लूट लिए जाओगे

हम सब घाट पर नहाने के बाद मनसा देवी की ओर गए। यहां उड़नखटोले (रोप-वे) पर बैठ हम मनसा देवी पहुंचे। ये मेरा पहला अनुभव था रोप-वे का। इसमें बैठकर बहुत ही मजा आया। जब हम मनसा देवी पहुंचे तो वहां खुली लूट चल रही थी। ऐसा मैंने बनारस में होते देखा है। पंडा कब आपको किस देवी के सामने सिर झुकाने को कह दें पता नहीं। ये पंडा आपको उस देवी को रुपए चढ़ाने को भी कहेंगे। मतलब मनसा देवी के दर्शन से पहले आपको करीब तीन चार जगह मत्‍था टेकवा दिया जाएगा। हम जब गए थे तो एक विदेश‍ियों का दल भी हमारे आगे था। उनसे तो खुली लूट चल रही थी। विदेश‍ियों को किसी भी तस्‍वीर के दर्शन को कहा जाता और स‍िर्फ एक शब्‍द कहते, ‘दान दक्ष‍िणा’।

इतना सुनते ही विदेशी 100 रुपए की नोट निकाल कर रख देते। ये ऐसा था जैसे किसी को रटा दिया गया हो कि दान-दक्ष‍िणा का मतलब है कि आप 100 की नोट निकाल लें। मैं तो सोच रहा था कि अगर कोई इन विदेशियों से राह चलते कह दे कि दान-दक्ष‍िणा तो ये रुपए निकाल कर दे देंगे। ऐसा ही हाल चंडी देवी का भी है।

तो कुल मिलाकर ये कहा जाए कि धर्म के नाम पर खुली लूट मची है तो गलत न होगा। कब आपकी जेब पर डांका डालने कोई आ जाए पता नहीं। इस लिए हमेशा सावधान रहें। जहां थोड़ा सा थी अजीब लगे, तुरंत उस काम से किनारा कर लें। बाकी इतना कुछ नेगेटिव बताने के बाद मैं अंत में आपको एक अच्‍छी चीज बताता हूं। वो ये कि हर‍िद्वार इन सब बुराइयों के बाद भी अलग है और यहां एक बार जाना बनता है। क्‍यों कि असल में जीवन क्‍या है वो यहां आकर जान सकते हैं। और जब भी जाएं समय लेकर जाएं। कम से कम दो दिन और इन दो दिनों में गंगा आरती और गंगा स्‍नान जरूर हो। यही तो यहां के मजे हैं।


ये अति जरूरी बातें हमें लिख भेजी हैं रणविजय सिंह ने। रणविजय पत्रकार हैं। काफी संजीदा व्यक्तित्व है, खूब बड़े दिल वाले हैं, दोस्तियां शिद्दत से निभाते हैं। एक बार जिसको अपना मान लिया, उसका साथ कभी नहीं छोड़ते। घूमने के शौकिन हैं। नजरें पैनी रखते हैं, दिल से देखते हैं, दिमाग से परखते हैं।

 


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