गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री: लाहौल-स्पीति का सदियों पुराना इतिहास

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री, लाहौल यात्रा का दूसरा दिन | पहले दिन वाले ब्लॉग में आपने रोहतांग दर्रे के रोमांचक सफर से लेकर लाहौल घाटी की अनोखी आतिथ्य परम्परा के बारे पढ़ा। आज के ब्लॉग में मैं आपको ले चल रहा हूं, लाहौल की पहाड़ियों में स्लोप पर बने तकरीबन 800 साल पुराने इतिहास को समेटे गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री के ट्रेक पर।

तो उस दिन, सुबह जब नींद खुली और मैने बाहर झांका तो देखा। पहाड़ों पर गहरी धुंध छाई हुई थी, जो चोटियां कल साफ-साफ दिख रही थीं, वो अब धुंध के घूंघट में छिपी हुई थीं। सुबह तो कब की हो चुकी थी पर सूरज भगवान बादलों के साये में अब भी आराम फरमा रहे थे।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

निखिल (मेरा दोस्त, जो वहीं लाहौल में ही रहता है) के पापा ने बताया कि चोटियों पर बर्फ गिरने का सिलसिला अक्टूबर के दूसरे हफ्ते से ही शुरु हो जाता है, एक दिन पहले भी ऊपर बर्फ गिरी थी। खैर, करीब आठ बजे हम सब एकदम तैयार होकर केलांग जाने वाली बस का इंतजार कर रहे थे, हम मतलब मैं, निखिल और निखिल की बहन नेहा।


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लाहौल में घूमने से पहले ये जरूरी काम

केलांग टाउन लाहौल स्पीति जिले का जिला मुख्यालय है, इसलिए जिले के तमाम सरकारी कार्यालय यहीं पर हैं। पिछली रात को तय हुआ था कि पहले हम केलांग जाएंगे, जहां पर नेहा और निखिल एम्प्लॉयमेंट ऑफिस में रजिस्ट्रेशन करवाएंगे और फिर हम सब घूमने निकलेंगे।

रालिंग से केलांग तक का सफर भी खूबसूरत है, बीच में तांदी पड़ता है और तांदी ही वो जगह है जहां पर चंद्रा और भागा नदी आपस में मिलती हैं और यहां से इसका नाम चेनाब हो जाता है। तो मतलब ये कि तांदी चेनाब का उद्गम स्थल है। तांदी से हम चंद्रा नदी को छोड़कर भागा नदी के साथ हो लेते हैं।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

लगभग 40 मिनट की यात्रा के बाद हम रालिंग से केलांग बस अड्डे पहुंच गए। केलांग ज्यादा बड़ा तो नहीं है लेकिन हां, वहां काफी सुविधाएं और बाजार है और हिमालयी गांवों से इतर वहां काफी जनसंख्या निवास करती है। दस बजे के बाद ऑफिस खुला तो निखिल और नेहा ने अपना काम निपटाया।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

वो लोग जब अपना काम निपटा रहे थे तब मैं उस ऑफिस की छत पर खड़े होकर सामने के पहाड़ों की फोटो खींचने में व्यस्त रहा। इसके बाद नेहा को हम वापस बस अड्डे पर छोड़ आए क्योंकि उसके कॉलेज की छुट्टियां खत्म हो रही थीं तो वो यहीं से कांगड़ा के लिए निकल गई। फिर मैं थोड़ा बहुत उस टाउन में घूमा और इसके बाद हमने वहां का मशहूर थुपका खाया। कुछ देर बाद निखिल का ममेरा भाई विशाल भी आ गया और तय हुआ कि हम गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री जाएंगे। गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

गुरुघंटाल मॉनेस्ट्री (मठ) की चढ़ाई

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री का रास्ता तांदी पुल से ही शुरु होता है। हमको केलांग से वापस तांदी पुल पर आना था। थोड़ी देर में विशाल के कजिन मिल गए, वो केलांग से घर की तरफ जाने वाले थे। उनका घर तांदी पुल के पास ही पड़ने वाले तांदी गांव में है तो हमलोग उनकी गाड़ी में बैठकर निकल दिए।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

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लगभग दो बजने को थे और हम निकल चुके थे एक ऐसे बौध्द मठ की तरफ जिसके बारे में माना जाता है कि वो 1200 साल के इतिहास के साथ लाहौल रीजन का सबसे पुराना मठ है (कहीं-कहीं पर 800 साल भी बताया जाता है)।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

शुरुआत एकदम आसान रही, दस बारह मिनट चलने के बाद ही हम तुप्चिलिंग मॉनेस्ट्री पहुंच गए। गुरु घंटाल का रास्ता तुप्चिलिंग होकर ही जाता है।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री की चाभी

तुप्चिलिंग मॉनेस्ट्री काफी सुकून वाली जगह है, यहां पर एक बड़े से मठ के साथ एक बड़ा सा मने भी बना हुआ है। गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री में स्थायी रूप से कोई भिक्षु नहीं रहता है, वे तुप्चिलिंग में रहते हैं तथा समय समय पर जाते रहते हैं। गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री की चाभी यहीं होती है मॉनेस्ट्री की देख-रेख गांव वाले भी मिलकर करते हैं।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

थोड़ी देर हम तुप्चिलिंग में रुके और ‘मने’ भी घुमाया। मने, लकड़ी का एक बेलनाकार वस्तु होता है जिसपर तमाम धार्मिक प्रतीक व शब्द लिखे रहते हैं, बौध्द मठों में मने घुमाने की परंपरा है। उसके बाद हम निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर। हमें यहां से चाभी नहीं मिल पाई थी, बताया गया था कि कोई पहले से ही ऊपर गया हुआ है।


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हम इस असमंजस के साथ आगे बढ़ रहे थे कि क्या पता हमें चाभी मिले या ना भी मिले। खैर, थोड़ी देर बाद असल चढ़ाई शुरु हुई और कुछ मिनटों बाद वो लोग भी मिल गए जो चाभी लेकर ऊपर गए थे। अब मुझमें और उत्साह आ गया।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

एक बार चढ़ाई शुरू हुई तो लगातार चढ़ते ही जाना है। खड़ी चढ़ाई वाली पगडंडियां काफी पतली हैं और कहीं-कही पर कंकरीली हैं तो हमें बहुत संभाल कर चलना होता है। खड़ी चढ़ाई होने की वजह से सांस बहुत तेजी से फूलने लगती है लेकिन आप बहुत तेजी से ऊपर भी पहुंच जाते हैं।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

हम जैसे-जैसे ऊपर जा रहे थे, वैसे-वैसे नीचे का नजारा शानादर होता जा रहा था। भागा नदी, नदी के बगल पहाड़ों के कोर पर बनी सड़क और पहाड़ के ऊपर बने कुछ घर, ये सब एक ही फ्रेम में दिखने लगे जो कि किसी सीनरी के चित्र जैसे लग रहे थे।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

तांदी का वो पुल जहां से हमने ये हाइक शुरु की थी, वो अब एकदम छोटा सा दिखाई देने लगा था। नदी के उस पार की पहाड़ियों पर बादलों का डेरा और बादलों से छिपती निकलती बर्फ से ढकी पहाड़ियों को सामने से देखने पर काफी अगल तरह का नजारा मिल रहा था।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

इधर बीच-बीच में कहीं कहीं पर सीढ़ियां भी बनी हुई हैं जिससे एकदम खड़ी चढ़ाई से थोड़ी देर के लिए राहत मिलती है लेकिन ऐसी सीढ़ियां बहुत कम ही हैं।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री के करीब

हम रुक-रुक बढ़ते रहे और लगभग 45 मिनट बाद मुझे मॉनेस्ट्री की पहली झलक दिखाई दी, अभी भी हमें 15-20 मिनट चलना था। ऊपर काफी तेजी से हवाएं चल रही होती हैं इसलिए ज्यााद गर्मी नहीं लगती फिर भी लगातार चलते रहने की वजह से थोड़ा बहुत पसीना तो होता ही है।

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गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

आराम से चलते हुए हम लगभग 20 मिनट में मॉनेस्ट्री तक पहुंच गए। बाहर से देखने पर यह कुछ खास नहीं दिखता लेकिन अन्दर काफी कुछ नई चीजें मेरा इंतजार कर रही हीं। दो मंजिले इस मठ में घुसते ही पता चला कि बाहरी दीवारों छोड़कर ये पूरा का पूरा मठ लकड़ी पर बना हुआ है।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री की बनावट

मठ के अन्दर कई प्रमुख लामाओं की लकड़ी और चीनी मिट्टी (क्ले) से बनी मूर्तियां हैं। इनमें से भगवान बुद्ध और और गुरु पद्मसम्भव की मूर्तियां प्रमुख हैं। इसकी स्थापना के बारे में ठीक-ठीक तो लिखा नहीं मिलता लेकिन कहा जाता है कि इसकी स्थापना गुरु पद्मसम्भव ने की थी। लेकिन 1857 में मंदिर के अंदर मिले एक मूर्तिशीर्ष को इतिहासविदों ने पहली शताब्दी से जुड़ा हुआ माना था।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

मठ के अन्दर एक दूसरे कमरे में मां काली की मूर्ति भी है जिसकी बराबर पूजा होती है और वहां दीपक प्रज्जवलित करने की परम्परा है। लकड़ी का एक बड़ा सा मने भी मठ में मौजूद है। मठ का मौजूदा स्वरूप 2002 में बनाया गया था । लकड़ी की कलाकारी और बौध्द कला से जुड़ी पेंटिंग वाला यह मठ अन्दर से काफी खूबसूरत है लेकिन उचित देख-रेख न होने की वजह से पेंटिंग का रंग उतरने लगा है।

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

हमने कुछ देर तक ‘मने’ घुमाया, भगवान बुध्द को नमन किया और फिर मां काली के लिए दीप प्रज्जवलित किए। मां काली को अगल कक्ष में बेहतर सुरक्षा के साथ अवस्थित किया गया है, शायद उनकी मूर्तियों के चोरी होने का खतरा होता है।

इसके बाद हम मठ के दूसरे मंजिले पर भी गए, वहां लगी एक खिड़की से दूर-दूर दूसरी पहाड़ियों पर स्थित गांवों का शानदार नजारा दिखता है। निखिल ने बताया कि मूर्तियों की फोटो क्लिक करना या वीडियो बनाना मना है, इस लिए मैने मूर्तियों की कोई तस्वीर नहीं उतारी।


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गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री से बाहर के नजारे

कुछ देर बाद हम बाहर निकल आये, तभी मुझे अंदाजा हुआ कि ये मठ पहाड़ी स्लोप पर तो बना है पर ये त्रिकोणीय स्लोप है। मतलब ये कि ये मठ ठीक पहाड़ी कोने पर बना हुआ है जिससे यहां से दो तरफ के नीचे के नजारे देखे जा सकते थे। गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

एक तरफ से भागा नदी आते हुए दिखती है तो दूसरी तरफ से चंद्रा और भागा का विशाल संगम स्थल। नीचे नदी, नदी के बगल एक छोटा सा गांव और गांव के बगल दूर-दूर तक सेब के बागान और खेत, ये सबकुछ एक ही फ्रेम में कैद करने लायक दिख रहे थे।

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री से वापसी

मैं तो तस्वीरें क्लिक करने में लगा हुआ था। कुछ देर फोटो खींचेने और खिंचवाने के बाद हम तीनों दोस्त मठ के पास ही एक जगह पर बैठे और साथ लाए फलों और स्नैक्स से भूख शांत की। अब थोड़ी-थोड़ी शाम हो रही थी, साथ में हवा की रफ्तार भी बढ़ी जा रही थी। इसलिए हल्की-हल्की ठंड का एहसास हो रहा था। अब पांच बजने को थे और हमने वापस उतरना शुरु कर दिया। यहां से उतरना काफी आसान और कम समय लेता है।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

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नीचे पहुंचने तक शाम हो चली थी, तांदी पुल के आस-पास ठंडी हवाओं की बहार थी और इस माहौल में मोमोज खाने का मजा ही कुछ और है। अभी हम पुल के बगल ही मौजूद एक छोटी सी दुकान पर मोमोज़ खा ही रहे थे कि हमारी बस आ गई पर हम तीनों आराम से मोमोज का लुफ्त उठाने में लगे रहे।

नाश्ते के बाद विशाल अपने घर चला गया क्योंकि उसका घर तो तांदी में ही है। खैर, अब कोई बस नहीं आने वाली थी तो मै और निखिल पैदल ही निकल लिए, इस उम्मीद में कि हमें कोई न कोई लिफ्ट मिल जाएगी। अभी हम केलांग के पेट्रोल पंप के पास ही पहुंचे थे कि एक कार सवार भाई साहब ने हमे लिफ्ट दे दिया।

थोड़ी सी बात-चीत हुई तो पता चला कि कार वाले भाई साहब निखिल के परिवार वालों से बखूबी परिचय में हैं। पहाड़ों में यही होता है, इतनी कम जनसंख्या होने की वजह से कहीं न कहीं से कोई जान-पहचान अक्सर ही निकल आती है।गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री

गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री के बारे में सूचनाएं

बस, सफर का दूसरा दिन यहीं समाप्त होता है, इसके अगले दिन एक लंबी यात्रा इंतजार कर रही थी। अगले दिन लाहौल के एकदम दूसरे छोर पर स्थित कुछ धार्मिक जगहों पर जाना था, जिसका सीधा सम्बन्ध पांडवों से है। जाते-जाते आपको गुरु घंटाल मॉनेस्ट्री ट्रेक (हाइक) के बारे में कुछ जरूरी टिप्स दिए जा रहा हूं।

वैसे तो आप यहां किसी भी मौसम में जा सकते हैं लेकिन दिसम्बर से लेकर फरवरी तक यहां बर्फ जमी होती है, इसलिए यह बंद रहता है। फिर आप मार्च से नवम्बर तक कभी भी जा सकते हैं लेकिन अप्रैल तक रोहतांग पास बंद रहता है तो आप लाहौल ही नहीं पहुंच पाएंगे।


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हालांकि अटल टनल के जल्द ही खुलने का आसार है और ये टलन खुलने पर आप मार्च में भी लाहौल जा सकेंगे। इसलिए फिलहाल मई से लेकर अक्टूबर तक को सही समय माना जाता है। जाने से पहले दो चीजें निश्चित कर लें, पहला तो ये कि तुप्चिलिंग मॉनेस्ट्री से गुरुघंटाल मॉनेस्ट्री की चाभी लेकर जाएं, नहीं तो आपको अंदर नहीं जाने मिलेगा।

हो सकता है कि आपके जाने पर चाभी ना मिले इसलिए साथ में किसी लोकर व्यक्ति को लेकर जाएं। दूसरी बात ये कि साथ में पानी ले जाना मत भूलना क्योंकि ऊपर पानी का कोई स्त्रोत नहीं मिलेगा। इतना समय लेकर जाएं कि अंधेरा होने से पहले आप नीचे उतर चुके हों क्योंकि पगडंडियां काफी खड़ी चढ़ाई वाली हैं और अंधेरे में गलती से भी पैर फिसलना एक बड़ी मुसीबत को दावत दे सकता है।


ये अनुभव हमें लिख भेजा है मनीष साहू ने। लाहौल यात्रा का ये दूसरा भाग है। मनीष ने इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। पेशे से कंटेंट राइटर और कॉपी एडिटर हैं। मनीष को घुमक्कड़ी के साथ ही फोटोग्राफी में खासी दिलचस्पी रखता हूं। इनका Allahabadi Ghumakkad नाम से एक यूट्यूब चैनल भी है। 


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