गोलघर: बिहार की वो इमारत, जो भुखमरी से लड़ने के लिए बनी थी

पटना, एक खूबसूरत जगह है जो कि बिहार राज्य की राजधानी है। इसे कभी पाटलिपुत्र, पाटलीग्राम या कुसुमपुर भी कहा जाता था। पटना, गंगा के किनारे बसा एक ऐसा शहर है जिसकी खूबसूरती देखते ही मन मोह लेती है। पटना संसार के गिने-चुने उन विशेष प्राचीन नगरों में से एक है जो कि प्राचीन काल से आज तक आबाद है।

पटना में कुछ ऐसी भी इमारते हैं जो कि नगर के ऐतिहासिक गौरव की मौन गवाह हैं तथा नगर ही प्राचीन गरिमा को आज भी प्रदर्शित करती हैं। इन सभी इमारतों में से एक है गोलघर।

गोलघर, जिसके नाम का शाब्दिक अर्थ होता है गोलाकार आकृति वाला घर। गोलघर पटना में गांधी मैदान के पश्चिम में स्थित है। यह एक अद्भुत नमूना है जिसके निर्माण में कहीं भी स्तंभ नहीं है। गुंबदाकार आकृति के कारण इसकी तुलना 1627 में बने मुहम्मद आदिल शाह के मकबरे से की जाती है।

1770 में आई भयंकर सूखे के दौरान लगभग एक करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हुए थे। तब गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने गोलघर के निर्माण की योजना बनाई। ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन जॉन गार्स्टिन ने अनाज के भंडारण के लिए इसका निर्माण 20 जनवरी 1784 को शुरू करवाया था। इसका निर्माण कार्य 20 जुलाई 1786 को ब्रिटिश राज में संपन्न हुआ था।

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गोलघर, पटना की स्थापत्य कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका आकार 125 मीटर और ऊंचाई 29 मीटर है। इसकी दीवारें आधार में 3.6 मीटर मोटी है। इसमें 140000 टन अनाज एक साथ रखा जा सकता है। गोलघर के शिखर पर लगभग 3 मीटर तक ईंट की जगह पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इसके शीर्ष पर 2 फीट 7 इंच व्यास का छिद्र था, जो की अनाज डालने के लिए छोड़ा गया था, पर इसे बाद में भर दिया गया। गोलघर के अंदर एक आवाज 27 से 32 बार प्रतिध्वनित होती है।

गोलघर के ऊपरी सिरे पर जाने के लिए 145 घुमावदार सीढ़ियां बनी हुई है। उन सीढ़ियों के ऊपर चढ़कर पास हीं बहने वाली गंगा नदी और इसके परिवेश का शानदार अवलोकन किया जा सकता है। बच्चों के खेलने के लिए इस गोलघर के परिवेश में एक पार्क भी है।

1979 में गोलघर को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। इसे देखने हर दिन लगभग 1000 पर्यटक आते हैं। यहां पर लेजर लाइट शो भी होता है और महीने के अंतिम शुक्रवार को झुग्गी झोपड़ी के बच्चों को नि:शुल्क दिखाया जाता है। गोलघर के ऊपर से पटना शहर और गंगा के विहंगम दृश्य को देखने का अनूठा अनुभव किया जा सकता है।

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पटना की इस ऐतिहासिक इमारत के बारे में लिखा है हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहीं शिवांजलि छाया ने।  शिवांजलि पत्रकारिता की छात्रा हैं। अपने बारे में वो बताती हैं, मुझे कोई भी काम एक जगह बैठकर करना पसंद नहीं है, इसलिए मेरी जिंदगी का एक ही मकसद है ‘घूमना।’ मेरे लिए घूमना एक शौक ही नहीं, बल्कि लोगों को जानने का, उनके जीवन शैली को समझने का, दुनिया के विभिन्न स्थानों, भोजनों, संस्कृतियों, परंपराओं से अवगत होने का एक जरिया है। मैं वह हूं जो अभी सीख रही हूं और अपने ज्ञान और अनुभव से दुनिया की खूबसूरती को औरों तक पहुंचाना चाहती हूं।


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