फुलवरिया में हमारे पुश्तैनी शिव मंदिर

शंभुनाथ महादेव मंदिर की स्थापना सन् 1886  में हुई थी यानि कि एक सौ चौंतीस साल पहले। मंदिर हेतु बनाए गए एक शिला-पट्टिका में अंकित तिथि 1942 फागुन सुदी (शुक्ल) तीन सोमवार की है इसके साथ ही पट्टिका में सन् 1223 की एक और संवत् का जिक्र है जिसे फसली कहते हैं फसली संवत् की शुरुआत सन् 1556 में शहंशाह अकबर ने की थी जो कि ऋतुचक्र से संयुग्मित थे ताकि यह किसानों के लिए ज्यादा उपयोगी हो, इसीलिए इसका नाम ही फसली सन् रखा गया यानि कि फसलों पर आधारित संवत्।

चूँकि अकबर अपनी परिकल्पना को मूर्त रूप देने में अग्रणी थे उनके दीवान टोडरमल, जो भारत की नयी राजस्व व्यवस्था के विश्वकर्मा थे। फसली संवत् हिजरी संवत् की तरह सिर्फ चंद्रमास पर नहीं, बल्कि भारतवर्ष के पारंपरिक हिंदु पंचांगों की तरह सौर वर्ष पर भी आधारित था। महीनों की काल-गणणा कैसे होती थी पता नहीं, लेकिन माना जाता है कि इसकी शुरुआत हर साल एक जुलाई से होती थी, यानि कि सौर वर्ष की गणणा को ग्रेगोरियन कैलेंडर से भी जोड़ा गया था।

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मोटे तौर पर सन्  590 ईस्वी वर्ष घटाने पर हमें फसली सन् का पता चलता है। लेकिन सम्राट अकबर ने तो इस संवत् को 1556 में शुरु किया था,न कि सन् 590 ईस्वी में, इसका कारण यह है कि अकबर ने फसली सन् का आरंभ पिछली तिथि से यानी सन् 622 ईस्वी  अर्थात पैगम्बर मुहम्मद साहब की हिजरत और हिजरी सन् से ही माना, और इस संवत् की शुरुआत के असली साल यानी सन् 1556 ईस्वी को फसली सन् 963 घोषित किया ( ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से सन् 1556 में हिजरी सन् शुरु हुए 934 साल ही बीते थे, लेकिन हिजरी संवत् में सौर वर्ष की अवधारणा ही नदारद है, और नौ सौ सालों में यह सालों का यह अंतर आ गया होगा)।

जो भी हो, दीन-ए-ईलाही की तरह फसली सन् भी एक सरकारी मामला ही रह गया, और प्रजा में ज्यादा लोकप्रिय और स्वीकार्य नहीं हुआ। पारंपरिक भारतीय संवतों की ऋतुचक्र से संयुज्य अद्वितीय वैज्ञानिकता के सामने यह एक महत्त्वाकांक्षी लेकिन गैरजरूरी प्रयास बन कर रह गया। अलबत्ता यह प्रकट है कि मालगुजारी आदि के सरकारी दस्तावेजों में, जहां मुगलों की फारसी रवायतें एक अरसे तक बची रहीं तो वहीं फसली सन् सौ-सवा सौ साल पहले तक उपयोग में लाया जा रहा था। मैंने हैदराबाद में जमीन के कुछ कागजातों में भी इसका जिक्र देखा है शायद  यह निजामशाही शासन में यह मानक रहा हो।

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