‘दिल्ली अभी दूर है’ कहावत के पीछे की कहानी

अभिनव गोयल टीवी पत्रकार हैं लेकिन झूमझाम और सनसनाती हुई पत्रकारिता से खुद को बचाए रखने की भरसक कोशिश करते हैं। जमीन से जुड़े हैं। किसी विषय पर तब मत व्यक्त करते हैं जब गहनता से उसकी पड़ताल कर लेते हैं। इतिहास में काफी रुचि है। दिल्ली पर काफी कुछ पढ़ रहे हैं, दिल्ली को परत दर परत समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसी सिलसिले में हमें एक दिलचस्प खोजबीन लिख भेजी है। पढ़िए और ज्ञान बढ़ाइए।


जाने अनजाने बहुत बार ये कहा सुना होगा कि दिल्ली अभी दूर है या कहीं दीवारों पर राजनीतिक नारों के बीच कहीं लिखा देखा होगा या बहुत बार जुबां छिलती आवाजों में सुना होगा कि अभी दिल्ली दूर है। इस कहावत के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है। ये शब्द इतिहास के एक सूफी फकीर के मुंह से निकले थे। जो बाबा फरीद के शिष्य रहे थे। जिन्होंने कहा कि दुखी रहना इस संसार में अपना कीमती समय बर्बाद करना है। प्रेम के बिना आदमी बिना पंखों का पक्षी है।

निजामुद्दीन औलिया कनेक्शन-

कहावत के पीछे की कहानी के लिए आज से करीब सात सौ बरस पीछे चलते हैं। इतिहास में तुगलक वंश का एक शासक हुआ जिसका नाम था गयासुद्दीन तुगलक। गयासुद्दीन ने भारत में तुगलक वंश की स्थापना की। गयासुद्दीन 1320 में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। ये वो समय था जब मंगोल भारत के अंदरूनी इलाकों में लगातार हमले कर रहे थे। उसी समय एक फकीर हुए जिन्हें हम निजामुद्दीन औलिया के नाम से जानते हैं। जो चिश्ती घराने के चौथे संत रहे थे। निजामुद्दीन का जन्म 1236 में हुआ था।

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निजामुद्दीन औलिया का एक भित्ति चित्र, साभार: विकीपीडिया

मां बीबी जुलेखा ने गरीबी में निजामुद्दीन औलिया की परवरिश की। हमेशा इस बात का ध्यान रखा वो पढ़ने लिखने में सबसे आगे रहे। निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली के ग्यासपुर में अपनी रिहाइश बनाई। निजामुद्दीन औलिया का शहर में इतना नाम था कि सुल्तान को एक फकीर से परेशानी होने लगी। पहले तो निजामुद्दीन ऑलिया को कोर्ट में बुलाया गया। बहुत सी कोशिशों के बाद भी उन्होंने सत्ता से दूरी बनाए रखी। कहते हैं, जब एक बार सुल्तान ने ये कहा कि वो खुद निजामुद्दीन से मिलने आएंगे तो उन्होंने कहा कि उनके घर में दो दरवाजे हैं अगर सुल्तान एक दरवाजे से आएगा तो वे दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाएंगे। वो सत्ता जिसके करीब होने के चलते अमीर खुसरो उसका वारिस ना बन पाया।

जब सूफी फकीर की बात हुई सच-

1325 में दिल्ली का शासक गयासुद्दीन तुगलक सोनारगांव की लड़ाई जीतकर दिल्ली वापस आ रहा था। सोनारगांव, जो आज के समय में ढाका के नजदीक है। वापसी में गयासुद्दीन ने दिल्ली से लगभग 70 किलोमीटर दूर यमुना नदी के किनारे अपना खेमा लगाया। खेमा लगते ही जश्न की तैयारियां शुरू होने लगी। ये वो समय था शहर में निजामुद्दीन के चर्चे सुल्तान को परेशान कर रहे थे। अब गयासुद्दीन तुगलक निजामुद्दीन ऑलिया के बारे एक शब्द भी सुनना नहीं चाहता था।

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निजामुद्दीन औलिया की दरगाह

निजामुद्दीन का उस समय दिल्ली में इतना नाम था कि सुल्तान गियासुद्दीन तुगलक सरे-बाजार उसे शहर से निकाल नहीं सकता था। उसकी एक आसान सी वजह थी, शहर का हर आदमी इस फकीर के पास अपने दुख लेकर आता था। निजामुद्दीन ने कभी किसी को अपने घर से नहीं लौटाया। बशर्ते वो कोई राजा ना हो।गयासुद्दीन तुगलक ने सूफी संत निजामुद्दीन ऑलिया के यहां एक संदेशा भिजवाया। संदेश में साफ था या तो इस शहर में सुल्तान रहेगा या फिर एक फकीर। संदेशा सुनकर औलिया ने शांत मन से कहा कि सुल्तान से जाकर कहो कि ‘हुनुज दिल्ली दूर अस्त’ यानि कि दिल्ली अभी दूर है।

अभी गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली से 70 किलोमीटर दूर था जहां जीत का जश्न मनाया जा रहा था। यहीं लकड़ियों का एक बड़ा खेमा तैयार किया गया। जश्न के दौरान मस्त हाथी खेमे जा टकराये। तभी अचानक गियासुद्दीन तुगलक भारी खेमे के नीचे दब गया और कभी दिल्ली लौट नहीं पाया। कहते हैं सूफी फकीर जो बात कह देते थे वो सच हो जाती थी। गयासुद्दीन तुगलक को लेकर निजामुद्दीन ऑलिया की कही बात कि ‘दिल्ली अभी दूर है’ सच साबित हुई। उसी दिन से ये कहावत प्रचलन में आई कि दिल्ली अभी दूर है।


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