दिल्ली मेट्रो: लोग एक दिन में लगाते हैं पूरी दुनिया का चक्कर

दिल्ली मेट्रो | आंकड़ों की नजर से दिल्ली मेट्रो जितना एक दिन में सफर करती उतने में तकरीबन पृथ्वी का चक्कर लगाया जा सकता है। इस तरह एक दिन मेट्रो में घूमना बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप सारी दुनिया घूम रहे हो। टेक्निकली तो शायद ये पॉसिबल नहीं लेकिन बावजूद इसके कुछ हद तक दिल्ली मेट्रो का सफर दुनिया की सैर जैसा ही है।

अलग अलग रंगों में रंगे दिल्ली मेट्रो रूट, अपनी एक अलग पहचान लेकर पटरियों पर दौड़ते हैं। रोजमर्रा दफ्तर की भीड़ से लेकर नए नवेले लोग जिनके कदम एस्कलेटर की सरकती सीढ़ियों पर ठिठक जाते हैं। हर कोई इस दिल्ली मेट्रो के सफर का एक अभिन्न हिस्सा है।


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हर शख्स अपनी एक कहानी के साथ इस पर चढ़ता है। ऑफिस जाने वाले हर एक व्यक्ति को बखूबी पता है कि हौजखास और राजीव चौक जैसी भारी भरकम भीड़ में भी कैसे हाफ-गर्लफ्रेंड और बाहुबली के मजे लेने है।

हर दिन मेट्रो में सफर करने वाले लोग दिल्ली मेट्रो में जरा सी भी बची जगह को लेकर रॉबर्ट वाड्रा से भी ज्यादा सचेत होते हैं। तभी तो वो दो पंजों के बीच में बची तीन इंच की जगह पर भी 15 इंच के लैपटॉप बैग को सेट करने का हुनर रखते हैं।

ताकि बार-बार होती अनाउंसमेंट ‘कृपया सहयोगी यात्री लैपटॉप कन्धों पर न टांगें’ सुनकर अन्दर से गिल्ट न हो। यह कला किसी की एक दिन की कमाई नही, बल्कि कई महीनों के सफर के बाद निखर कर आया अनुभव है।


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बचपन से पढ़ा है, समय बहुत कीमती है इसे बर्बाद न करें लेकिन इसका अहसास तब होता है जब बढ़ते एस्कलेटर पर दौड़ लगाने के बावजूद आपके आंखों के सामने हौले से ट्रेन दरवाज़े बंद होते नजर आएं और आप महज कुछ इंच दूर होकर भी उन दरवाजों  के उस पार अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कर सकें।

अंत में अगली मेट्रो का इंतजार करना ही सही निर्णय लगता है। जिस तरह से हर रोज दिल्ली मेट्रो का सफर एक किस्से की तरह है ठीक वैसे ही हर मेट्रो स्टेशन भी अपने आप में एक कहानी समेटे बैठे है। कुछ मेट्रो स्टेशन की कहानियां कुछ ऐसी हैं।

 

 


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1 thought on “दिल्ली मेट्रो: लोग एक दिन में लगाते हैं पूरी दुनिया का चक्कर”

  1. मेट्रो की ज़िन्दगी भी आसान नहीं है, दिल्ली में रहना है तो मेट्रो से दोस्ती तो करनी ही पड़ती हैं…
    दिल्ली की लाइफ लाइन !

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