कश्मीर 3ः गैर कश्मीरी होना, तिस पर भी लड़की!

(ये इस यात्रा का तीसरा भाग है, पहले दो भाग यहां पढ़ें)

प्लान के मुताबिक अगले दिन सुबह मुझे और मेरी फ्रेंड को नॉर्थ कश्मीर यानि कि बारामूला जाना था लेकिन पंचायत चुनाव के विरोध में अलगवादियों ने बंद बुलाया था। जिसकी वजह से पूरा कश्मीर बंद था। दूसरे दिन मुझे और मेरी दोस्त को अकेले ही ट्रैवल करना था। नई जगह के बारे में कुछ आइडिया नहीं था इसलिए हमने एक और दिन श्रीनगर में गुजारने का फैसला किया। हालांकि हम खुश नहीं थे। छह दिन की ट्रिप में हम सारे कश्मीर को समेट लेना चाहते थे।

फिर भी जॉस्टल में बैठने से अच्छा था कि हम श्रीनगर को ही जानें। बंद होने की वजह से उस दिन बहुत कम ही गाड़ियां चल रही थीं। जॉस्टल से बाहर निकलने के बाद हमें एक शेयरिंग कैब मिल गई थी, जिसमें बैठकर हमें डल झील के नेहरू पार्क पहुंचना था। यहां पर हमारे दूसरे दिन के गाइड ‘अब्दुल्ला’ मिलने वाले थे। इन्हें भी मेरे दोस्त ने ही भेजा था।

ये हैं अब्दुल्ला

अब्दुल्ला को देखकर आप उन्हें चीनी समझने की गलती कर सकते हैं लेकिन वो हैं कश्मीरी। मूलतः वो तिब्बत से हैं लेकिन बहुत पहले ही उनकी फैमिली कश्मीर आ गई थी। तो अब वो पूरे कश्मीरी हैं। अब्दुल्ला के साथ हमने डल झील को अच्छे से घूमने का प्लान बनाया।

कश्मीर और हमारा मीडिया

कश्मीर में घूमने के दौरान मैं और मेरी दोस्त वहां से कुछ ऐसी कहानियां लेकर आना चाहते थे जो कि मीडिया में ना के बराबर आती हैं। हमारी प्लानिंग थी कि हम डल झील पर रहने वाले लोगों की जिंदगी के बारे में वीडियो या स्टोरी करेंगे। लेकिन वहां ऑन कैमरा कोई बात नहीं करना चाहता है। लोगों को कैमरा और मीडिया से भागते देखना हो तो कश्मीर जाइए। यहां के लोग इस हालात के लिए इंडियन आर्मी से ज्यादा नेशनल मीडिया को जिम्मेदार मानते हैं।

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डल झील

शिकारा में बैठने के बाद हमने शिकारा वाले भाई से डल झील के पास बसे उनके गांव, पानी पर बना उनका मार्केट और लोगों से बात करने की डिमांड रखी। भाई ने हमें गांव दिखाया, मार्केट दिखाया लेकिन बातचीत के लिए कहा- ‘मैडम कोई कुछ बोलेगा ही नहीं, क्या करोगी बात करके। हम बोलेंगे कुछ और आप लोग जाकर दिखाओगे कुछ और।’ उनकी इस लाइन से हमें पता चला चुका था कि हमारी मीडिया ने क्या इज्जत हासिल की है?

कश्मीर यूनिवर्सिटी

बातचीत के दौरान उन्होंने हमें कश्मीर के मौसम और मुंबई के फैशन का कनेक्शन बताया। जैसे कि मुंबई का फैशन और कश्मीर का मौसम कब बदल जाए, पता ही नहीं चलता। साथ ही ये भी कि कैसे उन लोगों का बिजनेस, राजनीति का भेंट चढ़ जाता है। डल झील घूमने के बाद हमने हजरत बल और कश्मीर यूनिवर्सिटी घूमने का प्लान बनाया और तय हुआ कि पहले पैदल चलेंगे फिर कोई ऑटो लेंगे। पैदल चलने के पीछे भी वजह थी, हम वहां से भागना नहीं चाहते थे बल्कि कश्मीर और उसकी खूबसूरती को समेटना चाहते थे।

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कश्मीर यूनिवर्सिटी 

पैदल चलने के दौरान ऐसा हुआ कि एक काले रंग की सूमो ने हमें दो बार फॉलो किया और हूटिंग करते निकल गए। इस घटना के बाद एहसास हुआ कि कहीं भी चले जाओ, लड़के एक जैसे ही होते हैं। फिर हमने ऑटो लिया और हम कश्मीर यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहां पहुंचकर दो दिन में पहली बार मैंने लड़के-लड़की को साथ बैठकर बात करते देखा। दिल्ली या बाकी जगह अगर आप लड़का-लड़की की दोस्ती देख-देखकर परेशान हैं तो कश्मीर में आपकी आंखे तरस जाएगी लड़का-लड़की को साथ देखने के लिए। यहां की कैंटीन में खाने के बाद, फोटो क्लिक करने के बाद हमने हजरत बल जाने का सोचा।

हजरतबल

कश्मीर यूनिवर्सिटी से निकलते समय मुझे चार-पांच की झुंड में बुर्के में लड़कियां दिखाना शुरू हो गईं। बता दूं कि यहां बिना हिजाब, बुर्का तो कोई लड़की दिखी ही नहीं लेकिन यहां मैं जो बताना चाह रही हूं वो ये था कि झुंड में जो लड़कियां थीं वो सर से पांव तक बुर्के में दिख रही थी। मुझे अजीब इसलिए लगा रहा था कि आप यूनिवर्सिटी में हैं, पढ़-लिख रही हैं, उसके बाद बुर्के को ऐसे आगे बढ़ाना मेरी समझ से परे था। ऐसा लग रहा था कि इन लड़कियों की शक्ल में इंसान नहीं, पुतला देख रही हूं।

हजरतबल

वहां से निकलने के बाद हम हजरतबल गए। वहां पर हमने अंदर जाने की कोशिश की लेकिन हमें एंट्री नहीं मिली क्योंकि हमारे पास दुप्पटा नहीं था। वहां मौजूद एक महिला ने जिस टोन के साथ दुप्पटे वाली बात कही, हमें बहुत बुरी लगी और हमने फैसला किया कि हम अंदर नहीं जाएंगे। वहां से निकलने के बाद हम लोकल मार्केट घूमने लगे। उस दौरान हम वहां का खाना, बेकरी, हैंडमेड सामान को देखने और समझने का कोशिश कर रहे थे।

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एक चीज जो हमें असहज कर जा रही थी, लोगों की नजर। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि लोग हमें लड़की होने की वजह से घूर रहे थे या हम तीनों कश्मीरी नहीं (अब्दुल्ला कश्मीरी हैं लेकिन लगते नहीं) हैं, इस वजह से। मैं बता दूं कि अब्दुल्ला एक बेहद ही आजाद ख्याल के लड़के हैं। काफी मस्तमौला टाइप, जो कश्मीर के होते हुए भी यहां की राजनीति में ना पड़कर अच्छी बातों पर, पॉजिटिव बातों में अपना समय देना पसंद करते हैं।

(यात्रा के अगले भाग यहां पढ़ें)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।

 


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