दूसरी सदी की एक तकनीक कैसे पैदा कर रही है लाखों रुपए?

सदियों पुराना एक विज्ञान आज इक्कीसवीं सदी में हजारों लोगों के जीवनयापन का स्रोत बन चुका है। एक ऐसी टेक्नीक जो देश के पहाड़ी इलाकों से निकलकर दूरदराज के राज्यों तक फैल गई है। ‘घराट परियोजना’, जिस टेक्नीक को उत्तराखंड के लोगों ने फालतू समझ कर त्याग दिया था, घराटों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था, आज वही घराट ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में बसे परिवारों के लिए खुशहाली की वजह हैं। घराट को मुख्यधारा में लाने का श्रेय जाता है हेस्को को। हेस्को यानि कि हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजरवेशन ऑर्जेनाइजेशन। ये उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से संचालित होता है।


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अमीर खुसरो ने क्यों पहना था पीला लहंगा?

यकीन मानिए, ये कहानी जानकर आपका दिल खुश हो जाएगा. हमने निजामुद्दीन दरगाह जाकर जो महसूस किया, उसने हमारे भीतर बचा-खुचा स्याहपन मिटा दिया है. अभी वीडियो देखिए, अगले साल आप भी पहुंचिएगा इसी जगह पर.


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चांदनी चौक में मिलने वाली बर्फी, जिससे तोड़ने के लिए पलंग का इस्तेमाल हुआ

पलंगतोड़ बर्फी सिर्फ दूध, खोया और चीनी से बनी मिठाई है। चांदनी चौक में गुरूद्वारे के पास है मोटे लाला की दुकान। यहीं मिलती है फेमस पलंगतोड़ बर्फी। खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है। पहली बार इसे तोड़ने के लिए पलंग का सहारा लेना पड़ा था, जिससे इसका नाम पलंगतोड़ मिठाई पड़ा।


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वो लोकसंगीत जो आज भी भारत, बांग्लादेश को एक कर सकता है

बाउल संगीत, बंगाल की आत्मा है। बाउल गायक ज्यादातर बंगाल के बोलपुर में पाए जाते हैं। शांतिनिकेतन भी बोलपुर में ही है। रवींद्रनाथ टैगोर भी बाउल के मुरीद थे। हर साल अपने घर पर होने वाली कवि सम्मेलन में बाउल गायकों जरूर बुलाया करते थे। बाउल को यूनेस्को ने खतरे में पड़ी विरासत की सूची में डाला है। इतनी महान कला के साधक मुफलिसी में जी रहे हैं। हम अपनी परंपराओं, कलाओं के प्रति इतना उदासीन कैसे हो सकते हैं? फिर लापरवाही के साथ ये भी कहते हैं, इस देश में रखा ही क्या है।


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पुराने लखनऊ के एक किलोमीटर में कई सदियां जीती हैं

टैगोर की कर्मभूमि ‘शांतिनिकेतन’ से घूमने से पहले जानें ये बातें

शांतिनेकतन पहुंच जाना, अपने आप में एक सपने के पूरे हो जाने सरीखा होता है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में बोलपुर इलाके में बसा है शांतिनिकेतन। शांतिनिकेतन जाकर हर कोई रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन को करीब से महसूस करना चाहता है, वो स्कूल देखना चाहता है जहां आज भी बच्चों को पेड़ों के नीचे पढ़ाया जाता है।

कई सारी ऐसी बातें हैं जो आपको वहां जाने से पहले जान लेनी चाहिए। यहां पर आपका गूगल देखे बिना सफर करने वाला दर्शनशास्त्र हानिकारक साबित हो सकता है।


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पुरानी दिल्ली की ये रंग-बिरंगी कुल्फियां नहीं खाईं अबतक तो जीवन व्यर्थ है आपका

अगर कोई बेहतरीन कुल्फियों की तलाश में हैं तो उसे एक बार पुरानी दिल्ली जरूर आना चाहिए। एक काम करिए आज ही चावड़ी बाजर मेट्रो स्टेशन पर उतर जाइए, वहां से पूछते-पाछते कूचापति राम गली में चले आइए। वहां पहुंचकर किसी से भी पूछ लीजिए, कुरेमल कुल्फी कहां मिलेगी। लोग आपको वहां तक खुद छोड़ आएंगे। सौ साल पुरानी इस दूकान में कुल्फी को फलों के अंदर ही जमाया जाता है। अनार,सेब,संतरा और शरीफा जैसे फलों वाली कुल्फी का लुफ्त उठा सकते हैं। ये बहुत स्वादिष्ट हैं और निःसंदेह हेल्दी भी।


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दिल्ली की इस बेहद पुरानी मिठाई का पाकिस्तानी कनेक्शन

गंगा में चलने वाली पहली सोलर बोट

सोनू बनारस के गंगा घाट परर बोट चलाते हैं। उनका काम हैं पर्यटकों को घाट की सैर करवाना। अब आप सोच रहे होंगे कि हम ये सब क्यों बता रहे, इसमें खास क्या है। ऐसे तो सैकड़ों बोट चलाने हैं वहां पर। लेकिन सोनू कोई आम चालक नहीं हैं। उनके पास बानारस की पहली और इकलौती सोलर बोट। जिसमें बैठ कर गंगा की सैर का मजा दोगुना हो जाता है। जिसमें शोर न के बराबर होता है और पेट्रोल का धुआं भी नहीं होता। बाकी डीटेल वीडियो देखकर पाइए और वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करिए। साथ ही हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा।


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वो चीज, जिसे देखने के लिए विदेशियों की बनारस में लगती है तगड़ी भीड़

बनारस की वो चीज जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग खिंचे चले आते हैं

बनारस की गंगा आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। दुनियाभर से लोग बनारस के घाटों को देखने आते हैं। वैसे गंगा के कई घाटों पर आरती होती है लेकिन राजेन्द्र घाट पर होने वाली संध्या आरती बहुत शानदार होती है। आरती देखने के लिए देशी-विदेशी पर्यटकों के साथ वीवीआईपी, सेलिब्रेटीज भी आते हैं। आरती के शुरू होने से अंत होने तक एक अलौकिक वातावरण सा बंध जाता है। आरती खत्म होने पर लोग गंगा से एक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।


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गंगा-वरुणा के संगम पर बनी एक मजार, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं

बनारस में गंगा-घाटों के बारे में सबने बहुत सुना है। गंगा के पहले घाट ‘आदिकेशव’ के पास है चंदन सयैद की मजार। वहां आने वाले लोगों का मानना है  कि चंदन सयैद ने मजहब और मानवता के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी है। इस जगह के बारे में बहुत कम लोगों को ही जानकारी है। यहां जो जोड़ी कव्वाली गायी जाती है उसका तो जवाब नहीं। आवाज ऐसी कि रूह छू जाए। इस जुगलबंदी को सुनकर कई लोग तो अपने आंसू रोक ही नहीं पा रहे थे।


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