दिल में उतर जाते हैं बुंदेलखंडी लोक कलाओं में बसे तमाम रंग

बुंदेलखंडी संस्कृति, क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारण अनेकों रंगों से भरी हुई है। इसी कारण यहां की लोक कलाओं में विविधता देखने को मिलती है। बुन्देली लोक कला की समृद्धता और मोहकता यहां होने वाले विविध पर्व-त्योहार, व्रत, उत्सव पर देखने को मिलती है। आलेखन, भित्तिचित्र, भूमि चौक, मांगलिक चिन्हों के द्वारा लोक कलाओं का खूब प्रदर्शन होता है। नागपंचमी, हरछठ, टेसू और झिंझिया का विवाह, अघोई आठें, दिवारी, गोधन, करवाचौथ आदि अवसरों पर लोक कलाओं की झांकी मन को मोहती है। इन अवसरों पर गोबर, जौ, चावल, गेरू, आटा जैसे सामान्य घरेलू सामान सजावट इस्तेमाल किए जाते हैं।

यहां पर मैं आपको कुछ बुंदेली लोकोत्सवों के बारे में बता रहा हूं।

टेसू और झिंझिया का विवाह

आश्विन माह में मनाये जाने वाले इस त्यौहार में युवक और युवतियां अपने-अपने अलग-अलग समूह बनाकर उत्सव मनाते हैं और फिर शरद पूर्णिमा को, जिसे बुन्देलखण्ड में टिसुआरी पूनों के नाम से जाना जाता है, दोनों समूह मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह रचाते हैं। बांस की खपच्चियों के ढांचे को चमकीले कागज से सजाकर पुरुष आकृति बनाते हैं जिसे टेसू कहा जाता है। इस पुतले को राजसी वस्त्रावरण प्रदान किया जाता है। तीर-कमान, तलवार-ढाल आदि के अलावा सर पर मुकुट या साफा बंधा होता है जो टेसू के राजा होने का संकेत करता है। झिंझिया में मिट्टी के छोटे से घड़े में अनेक छेद होते हैं। इस मटकी की में कुछ अनाज रखकर उसमें जलता हुआ दीपक रख दिया जाता है। छेदों से बाहर निकलती दीपक की रौशनी अत्यंत मनमोहक लगती है। बालिकाएं इस जगमगाती मटकी को अपने सिर पर रखकर समूह में घर-घर जाकर नेग स्वरूप कुछ न कुछ मांगती हैं।

ये किशोरियां झिंझिया गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं। उधर टेसू के रूप में सजे पुतले को लेकर युवा घर-घर, बाजार-बाजार जाते हैं और गीत गाकर उसके बदले में अनाज या कुछ धन की मांग करते हैं। इनके द्वारा गाये गीत के माध्यम से पता चलता है कि टेसू वीर योद्धा था। “टेसू आये बानवीर, हाथ लिए सोने का तीर, एक तीर से मार दिया, राजा से व्यवहार किया” गाते हुए लड़के शरद पूर्णिमा की रात्रि तक कुछ न कुछ मांगते/एकत्र करते रहते हैं। बालकों द्वारा बड़े ही विनोदात्मक तरीके से गीतों को गया जाता है जिससे उनके इस उत्सव में एक तरह की रोचकता बनी रहती है। कई बार तो लड़के आशु कवित्व के रूप में कुछ भी उलटे-पुल्टे शब्दों को जोड़कर गायन करते रहते हैं। किसी घर, दुकान आदि से कुछ भी न मिलने पर इनके द्वारा “टेसू अगड़ करें, टेसू बगड़ करें, टेसू लैई के टरें” या फिर “टेसू मेरा यहीं खड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा, दही-बड़ा में पहिया, टेसू मांगे दस रुपईया” आदि गाकर मनोरंजक रूप में कुछ न कुछ प्राप्त कर लिया जाता है।

ये भी पढ़ें:  बस्तर 11: और अब तक तो बस्तर से मोहब्बत हो चुकी है
हर पीढ़ी का सहयोग

बाद में शरद पूर्णिमा की रात को इन्हीं लड़कों द्वारा बड़ी ही धूमधाम से टेसू की बारात निकाली जाती है। शरद पूर्णिमा की रात्रि को टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाएं सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं। इस नृत्य की प्रकृति बहुत कुछ गुजरात के गरबा नृत्य के जैसी होती है। झिंझिया-नृत्य में बालिकाएं गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है। वृत्ताकार खड़ी बालिकाएं तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं। इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है। इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है। यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाओं में प्रसन्नता को दर्शाता है।

ऐसी किंवदंती है कि टेसू महाभारत काल के बब्रुवाहन का प्रतीक है जिसे मरणोपरांत शमी वृक्ष पर रखे अपने सिर के द्वारा महाभारत युद्ध देखने का वरदान मिला हुआ था। बांस की तीन खपच्चियों का ढांचा उसी शमी वृक्ष का और सिर बब्रुवाहन का प्रतीक समझा जाता है। टेसू-झिंझिया विवाह से एक किंवदंती और भी जुड़ी हुई है कि सुआटा नामक एक राक्षस कुंवारी कन्याओं को परेशान करता था, उनका अपहरण कर लेता था और जबरन अपनी पूजा करवाता था। उसी राक्षस ने झिंझिया नामक राजकुमारी को भी बंदी बना लिया था। टेसू नामक राजकुमार ने शरद पूर्णिमा को ही सुआटा राक्षस का वध करके झिंझिया को मुक्त करवाया तथा उससे विवाह रचाया था। बुन्देलखण्ड में बालिकाएं किसी दीवार पर गोबर से सुआटा राक्षस की आकृति बनाती हैं जिसका वध टेसू द्वारा किया जाता है और तत्पश्चात टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है।

दीवार पर बनाया गया सुआटा

कजली
महोबा के राजा परमाल के शासन में आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बांकुरों की विजय की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है। किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली लोक-पर्व को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था। जब यहां के गर्म-तप्त खेतों को सावन की फुहारों से ठंडक मिल जाती थी तो किसान वर्ग अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था। सावन के महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था। घर-परिवार की महिलाएं खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी। नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी। सावन की पूर्णिमा को इन दोनों में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था। बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी।

ये भी पढ़ें:  गंगा में समाये हरिद्वार और ऋषिकेश की रोमांचक यात्रा का सफर

ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है। महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों को सिराने (विसर्जन करने) जाया करती थी। सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये। पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल एक साजिश का शिकार होकर महोबा से निकाले जा चुके हैं और महोबा को उनकी कमी में जीतना आसान होगा।

अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया। उस समय महोबा शासन के वीर-बांकुरे आल्हा और ऊदल कन्नौज में थे। रानी मल्हना ने उनको महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया। सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुंच गए। परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया। इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुंच गया।

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा। सेना रणभूमि से भाग गई, इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया। इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था। ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया।

इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया। तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है। वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है। यहां के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बांकुरों को याद करते हैं।

ये भी पढ़ें:  मध्यमहेश्वरः जहां चढ़कर पहाड़ भी खत्म हो जाते हैं

नाग पंचमी

श्रावण शुक्ला पंचमी को महिलाओं द्वारा नागों की पूजा का प्रचलन है। इस अवसर पर घर के मुख्य द्वार पर दोनों ओर आलेखन रूप में पांच नागों की आकृति बना कर महिलाओं द्वारा पूजा की जाती है। यह पर्व परिवार को नुकसान न होने की कामना से मनाया जाता है।

हरछठ

बुन्देलखण्ड में यह पर्व उन महिलाओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है जो पुत्रवती होती हैं। पुत्रों की दीर्घायु की कामना करती हुईं माताएं इस व्रत को भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को मनाती हैं। इस अवसर पर दीवार पर चित्रांकन कर उसका पूजन किया जाता है। हरछठ के चित्रांकन में लोक कलाओं के लगभग सभी प्रतीकों का प्रयोग होता है।

दिवारी (दिवाली)

दीपावली का पर्व पूरे देश भर में मनाया जाता है। बुन्देलखण्ड में इसे दिवारी के नाम से संबोधित किया जाता है। इस पर्व की पारम्परिक पूजा में भूमि को गोबर अथवा मिट्टी से लीप कर ‘सुरौती’ का चित्रांकन किया जाता है। इस भूमि अंकन के सामने आटे से चैक पूर कर घी से भरे सोलह दिये जला कर विधपूर्वक पूजन किया जाता है।

गोधन

गोबरधन पूजा को गोधन नाम से जाना जाता है। यह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। मकान के आंगन में गोबर से गोबर्धन पर्वत बना कर उसी पर अन्य प्रतीकों को बनाया जाता है। भूमि अलंकरण के इस रूप में सारा चित्रांकन गोबर से ही किया जाता है। पूजागृह से जोड़े रखने की दृष्टि से गोधन के चित्र से लेकर पूजागृह तक खड़िया अथवा गेरू से दो समानान्तर रेखाओं को खीचा जाता है।

करवाचौथ

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को यह पर्व विवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। पति की दीर्घायु की कामना से सम्पन्न होने वाले इस व्रत में भूमि पर अथवा दीवार पर आलेखन किया जाता है। इस आलेखन में समस्त प्रतीकों की उपस्थिति दिखायी देती है। रात्रि को महिलाओं द्वारा पूजन के समय प्रयुक्त पात्र (करवा) को विविध प्रतीकों, बेलों आदि से अलंकृत करती हैं।


ये बेहतरीन जानकारियां हमें लिख भेजी हैं, अब्दुल आलम ने। अब्दुल झांसी में रहते हैं। बुंदेलखंडी संस्कृति पर बड़ा नाज है। नजरें बड़ी चौकस रखते हैं। इतिहास में खासी रुचि है। पुरानी इमारतों, लोगों के बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। झांसी बुलाते रहते हैं सबको, झांसी की शानदार विरासत के बारे में खूब बताते हैं।


ये भी पढ़ें:

सनातनी अपमान का भीटा

2 thoughts on “दिल में उतर जाते हैं बुंदेलखंडी लोक कलाओं में बसे तमाम रंग”

Leave a Comment