बोकारो: एक उद्योग नगरी जो रात के नौ बजते ही सो जाती है

बोकारो। झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस नई दिल्ली स्टेशन से 22 घंटे की यात्रा पूरी कर एक स्टेशन पर रुकती है। बाहर झांकने पर प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर पीले रंग का एक बड़ा से चौकोर बोर्ड दिखा। इस पर काले रंग से लिखा था बोकारो स्टील सिटी। यानी मेरा डेस्टिनेशन। स्टेशन परिसर से बाहर निकलते ही एक क्रम में खड़े लाल और सफेद रंग की चिमनियां और उससे हर वक्त निकलने वाले धुएं अपना परिचय उद्योग की इस नगरी से कराते हैं।

बोकारो, स्टील प्लांट

1965 में बना सेल (स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड) का यह प्लांट देश का दूसरा सबसे बड़ा स्टील प्लांट है। यहां लगभग 23 हजार से ज्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं। प्लांट के चहारदीवारी के बगल से गुजरने वाली सड़क से लगभग 10 किलोमीटर चलने पर आता है मुख्य शहर। जहां सेल के सिंबल वाला नीले कलर का तोरण द्वार अपने आगंतुकों का बोकारो इस्पात नगर में स्वागत करता है।

बोकारो
बोकारो रेलवे स्टेशन

झारखंड के इस शहर में प्रवेश करते ही नजारा अन्य मेट्रो सिटी से बिलकुल अलग सा दिखता है। यहां की सड़कों पर पटना, दिल्ली या मुंबई की तरह गाड़ियों का रेला नहीं है। लोगों में हॉर्न बजाने की होड़ भी नहीं है। सड़कें पूरी तरीके से खाली है। लोग अपनी मस्ती में आ जा रहे हैं। न ट्रैफिक है और न ट्रैफिक लाइट्स।

हर मोड़ पर राष्ट्र के नाम शहीद हुए राष्ट्रभक्तों की आदमकद प्रतिमा है। ऐसा जैसे हम किसी राष्ट्रवादी शहर में आ गए हों। इस भ्रम को अगले ही पल दूर कर देता है एक नियमित अंतराल पर लगे सेल के होर्डिंग और फ्लैक्स। जिसमें सेल के सिंबल के साथ लिखा होता है। हमसे है बोकारो, हममें है बोकारो, हम हैं बोकारो।

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बोकारो

अलहदा सा शहर: बोकारो

शहर में ट्रैफिक का यही नजारा सुबह से लेकर शाम तक दिखाई देता है। हां, प्लांट में एंट्री और एग्जिट की टाइमिंग को छोड़कर। जब कर्मचारियों का एक रेला प्लांट का दरवाजा खुलते ही बाहर निकलता है या उसमें प्रवेश करता है तो चंद मिनटों के लिए सड़क पर चीटियों की बारात सा नजारा होता है। लगभग दो से तीन किलोमीटर तक केवल बाइक और साइकिल ही नजर आते हैं। बस दस मिनट के लिए। इन्हें अलग-अलग दिशा में जाते ही सड़कें एक बार फिर से वीरान हो जाती है।

छह लाख की आबादी वाले इस शहर का मिजाज देश के अन्य औद्योगिक शहरों से बिलकुल अलहदा है। यहां की सुबह भले ही अन्य शहरों की तरह सूर्योदय के साथ होती है। लेकिन इस शहर में रात नौ बजने के पहले ही हो जाती है। नौ बजते-बजते शहर की अमूमन दूकानों के शटर गिर जाते हैं। बाजार में केवल आवारा जानवर दिखते हैं। 10 बजते ही लोगों को नींद अपनी आगोश में ले चुका होता है।

बोकारो

उद्योग से इतर शिक्षा में पहचान

सेल का यह शहर देश भर में भले ही स्टील के उद्योग के लिए जाना जाता हो। लेकिन शहर के हृदयस्थली सिटी सेंटर पहुंचते ही यह शिक्षा की नगरी में तब्दील हो जाता है। सेक्टर चार के हर कोने में केवल और केवल स्कूलों की बड़ी-बड़ी और भव्य इमारतें (दिल्ली पब्लिक स्कूल से लेकर डीएवी समेत 8-10 स्कूल) दिखाई देती हैं।

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देश में आईआईटी और मेडिकल की तैयारी कराने वाले इंस्टीट्यूट (फाउंडेशन क्लासेज) के हर बड़े नाम का एक ब्रांच यहां भी दिखाई देता है। इस्पात नगरी का यह पूरा इलाका बच्चों और बच्चियों की चहलकदमी से गुलजार रहता है। रुस और इंडिया के इंजीनियरों ने इस शहर को 10 अलग-अलग सेक्टर व्यवस्थित तरीके से भले बसाया है लेकिन बोकारो मतलब तो सिटी सेंटर ही है।

नया मोड़ की चाय

शहर में तीन सितारा होटल से लेकर हर चौक-चौराहे पर चाय की दुकान है। लेकिन जो मजा नया मोड़ के चाय की है वह पूरे शहर में कहीं नहीं। शहर के बाहरी हिस्से में स्थित सबसे व्यस्ततम चौराहा है नया मोड़। इसी मोड़ के कोने की झुग्गी में स्थित है दो भाइयों की चाय दुकान।

दिन-रात यहां अपने आकार से चार गुना बड़ी केतली में चाय उबलती रहती है। इस चाय के सामने मुंबई की मसाला चाय से लेकर दिल्ली की कटिंग सभी चाय फेल है। इसके अलावा मॉर्निंग वाक के लिए शहर का एकमात्र पार्क सिटी पार्क और बच्चों के लिए जवाहर लाल नेहरु जैविक उद्दान दो पसंदीदा स्पॉट हैं।

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बोकारो

दुंदीबाद की दुकानें

वैसे तो इस शहर को आधुनिक शहर का दर्जा है। यहां मॉल भी है और सिटी सेंटर जैसा मार्केट भी जहां हर ब्रांड्स के आउटलेट्स हैं। लेकिन इन सबसे इतर यहां सेक्टर-12 का दुंदीबाद बाजार भी है। दर्जनों एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्र में फैले फुटपाथ के इस बाजार में सब्जी, फल, सीजनल प्रोडक्ट हर चीज हॉलसेल से लेकर फुटकर दाम में मिलते हैं। यहां सेल के बड़े अधिकारी से लेकर छोटे कर्मचारी तक खरीदारी करने जाते हैं।


शंभूनाथ पेशे से पत्रकार हैं। इनको घूमना हद से ज्यादा पसंद है इसलिए वक्त मिलते ही निकल पड़ते हैं। बस वो जगह इनके लिए एकदम नई होनी चाहिए, फिर चाहे वो झारखंड का कोई आदिवासी इलाका हो या फिर मुंबई का मरीन ड्राइव। लोगों से गप्पें मारना, उन्हें खुशी देना इनका पसंदीदा शगल है। दिलों के राजा है और दिल से इन्होंने अपनी बोकारो नगरी के बारे में लिख भेजा है, आप बस पढ़ डालिए।


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1 thought on “बोकारो: एक उद्योग नगरी जो रात के नौ बजते ही सो जाती है”

  1. बहुत ही प्यार वर्णन है बोकारो का, बचपन से देखा है इस शहर को, दौड़-भाग करती इस दिल्ली की ज़िंदगी में ठहराव और सुकुन की अनुभव कराता है मेरा ये शहर…लिखने के लिए धन्यवाद

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