बस्तर 4: नक्सली आतंक और सुरक्षाबलों से सकुचाहट के बीच पिसता बीजापुर

ईमानदारी से बताऊं तो बस्तर डिवीजन जाने की प्लानिंग करते वक्त मुझे बीजापुर जिले की दुरूहता का बिल्कुल भी एहसास नहीं था। अब तक की छत्तीसगढ़ में नक्सली मुद्दों से जुड़ी खबरों में ज्यादातर सुकमा और दंतेवाड़ा के नाम ही सुने थे। निस्संदेह ये मेरी अनभिज्ञता थी।

बीजापुर, जहां सीआरपीएफ कैंप के एक किलोमीटर के दायरे में ही नक्सलियों ने बिजली के खंभे तहस-नहस कर डाले हैं। जहां कैंप के पांच किलोमीटर के दायरे के बाद सड़क का नामोनिशान नहीं है। जहां पर कैंप के आस-पास गांवों से आगे बढ़ने पर स्कूलों की संख्या घटते-घटते शून्य पर आ जाती है और अस्पतालों का अस्तित्व समाप्त होने लगता है। जहां पर कैंप की परिधि से बाहर ‘दादा लोग’ का राज चलता है।

शिक्षा से दर वंचित बीजापुर

बीजापुर की सीमाएं दक्षिण-पश्चिम में तेलंगाना से जुड़ती हैं। यहां पर छः भाषाएं गोंडी, हल्बी, तेलुगू, दोरली, हिंदी और मराठी बोली जाती है। 11 मई 2007 को बस्तर जिले से दो नए जिले बनाए गए थे। एक नारायणपुर और दूजा बीजापुर। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, बीजापुर देश में दूसरा सबसे कम साक्षर दर वाला जिला है। पहले नंबर पर मध्यप्रदेश का अलीराजपुर है।  बीजापुर जिले में कुल चार ब्लॉक हैं- भैरमगढ़, भोपालपटनम, बीजापुर और उसूर। मैंने सोचा, क्यों न बीजापुर ब्लॉक में ही गाड़ी आगे बढ़ाई जाए। चलते-चलते हम गंगालूर नाम के एक गांव में पहुंच गए।

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गंगालूर के एक स्थानीय युवक ने बताया कि अब यहां पर बहुत कम ही लोकल नक्सली कमांडर हैं। सब बड़े दादा लोग बाहर से ही आते हैं। अब बस जड़-जंगल-जमीन की खाली बातें ही होती हैं। सब अपना-अपना हित देखते हैं। गांव वाले बेचारे पिस रहे हैं। अब तो कहीं-कहीं गांव के लोग डरना भी छोड़ दिए हैं। दादा लोग खाली तोड़-फोड़ करता है।

सुरक्षाबलों पर लोगों का बढ़ता भरोसा

कुछ अन्य हिंदी भाषी ग्रामीणों से बात करने पर पता चला कि अभी कुछ ही दिन पहले कैंप से एक किलोमीटर की दूरी पर बिजली के खंभे लगाए गए थे। नक्सलियों ने उन्हें बुरी तरीके से क्षतिग्रस्त कर दिया था। सीआरपीएफ के जवानों ने वहां लगातार खड़े होकर खंभों की मरम्मत करवाई थी।

बीजापुर में सीआरपीएफ की सी-85 बटालियन तैनात है। ये बटालियन देश की सबसे धाकड़, फुर्त और सख्त बटालियनों में से एक है। यहां के एक जवान ने बताया कि आदिवासी लोग बहुत ही भोले और शर्मीले होते हैं। उनका विश्वास बनाए रखना बड़ा ही संवेदनशील काम है। ये जिला इस वक्त सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित है। सुरक्षा बलों जवानों की एक-एक टीम तीन-चार दिनों तक लगातार पेट्रोलिंग करती है।

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कैप्टन चंद्रभान सिंह और बच्चों के साथ प्रज्ञा

कैंप में असिस्टेंट कमांडर की कमान संभाल रहे चंद्रभान सिंह इस कैंप को सुचारु रूप से संचालित करने के अलावा एक और शानदार काम कर रहे हैं। वो अपने खाली वक्त में आदिवासी बच्चों को कोचिंग पढ़ाते हैं। उनका पढ़ाया एक बच्चा नवोदय स्कूल में भी सेलेक्ट हो गया है। उनके दोस्ताना रवैये से गांव वालों में सुरक्षा बलों पर यकीन बढ़ रहा है।

नक्सलियों की मैग्जीन- प्रभात

गांव वालों ने हमें एक सफेद पन्नों की एक मैग्जीन दिखाई। जिसका नाम ‘प्रभात’ था। मैग्जीन की टैगलाइन थी- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का तिमाही मुख-पत्र। पता चला कि ये मैग्जीन नक्सलियों की ओर से बांटी जाती है। ये मैग्जीन हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भी छपती है। इसमें कई सारी आपत्तिजनक बातें दर्ज थीं। मुठभेड़ में मारे गए नक्सलियों को शहीद और वीर योद्धा कहकर संबोधित किया गया था।

मैग्जीन के एडिटर या किसी भी लेखक का नाम नहीं छपा था। जीएसटी के विरोध में लिखे गए एक आर्टिकल में मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान का एक व्यंग्य भी छपा था। जाहिरन तौर पर इस कार्टून चोरी करके ही लगाया गया था। शिरीष नाम के एक और व्यंग्यकार का भी बनाया कार्टून छापा गया था। मारे गए कमांडरों की हथियारबंद तस्वीरों के साथ उनका महिमामंडन दर्ज था। पुलिस के खिलाफ कई सारी बातें लिखी गईं थीं। मसलन, पुलिस की गश्त तीन दिनों तक जारी रही। उनके मुताबिक पुलिस की गश्त का मतलब ही गांवों में आतंक मचाना है।

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(बीजापुर में इससे आगे की यात्रा यहां पढ़ें)


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