भोपाल के बारे में वो बातें, जो आपको गूगल पर भी ढूंढें न मिलेंगी

दरअसल मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं इसलिए सिर्फ लखनऊ को ही नवाबों का शहर समझता रहा, लेकिन जब मध्य प्रदेश के भोपाल आने का मौका मिला तब जाना भोपाल भी नवाबों का शहर है। हर कोई भोपाल को अलग-अलग विशेषणों से पुकारता है, कोई इसको ‘झीलों की नगरी’ कहता है, कोई इसे ‘मध्य प्रदेश का दिल’ कहता है। सही मायने में ये ये एक ऐतिहासिक शहर है।

भोपाल का नाम दुनियाभर में बहुत से लोग जानने लगे हैं। पर कुछ जगहें ऐसी भी हैं जिनसे बाहर वाले तो क्या खुद भोपाल में रहने वाले ही अनजान हैं। कुछ ऐसी जगह जिनका कल कुछ और था और आज कुछ और है। कुछ ऐसी जगहें जो आज अपने नाम से बहुत प्रसिद्ध है लेकिन उन जगहों से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

आज मैं आपको भोपाल की उन्हीं जगहों से रूबरू करवाऊंगा।

बड़ा तालाब और छोटा तालाब

भोपाल की सबसे खूबसूरत जगह अगर कोई है तो वो है बड़ा तालाब। भोपाल की इस खूबसूरत जगह के होने के पीछे बहुत बड़ा कारण है। बड़े तालाब को पुराने समय में भोजताल के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि भोपाल को मालवा के एक मशहूर राजा भोज द्वारा 1005 और 1055 दशक पहले बनाया गया था। कहा जाता है, राजा भोज एक बहुत बड़ी बीमारी से ग्रसित थे उनकी त्वचा दिन पर दिन खराब होती जा रही थी। बहुत से इलाज किये गए पर उनकी त्वचा पर कोई असर नही हुआ।

उनको एक संत ने सलाह दी कि एक बड़ा सा गड्ढा बनाकर 365 सहायक नदियों के पानी को इकठ्ठा करना होगा। उस पानी से नहाना होगा, यही उनकी बीमारी का एक मात्र इलाज है। तभी राजा भोज ने एक तालाब का निर्माण करवाया था जो उनके महल के चारो तरफ था, उसका नाम भोजताल रखा गया। वही भोजताल आज बड़े तालाब के नाम से मशहूर है। आज भी राजा भोज का महल उसी तालाब के अंदर दबा हुआ है।

ताज-उल-मस्जिद

भोपाल की एक और ऐतिहासिक जगहों में से एक जगह ताज-उल-मस्जिद भी है, जो भोपाल की खूबसूरती में चार चांद लगाती है। ये जगह मोतिया तालाब के पास मौजूद है जो इसकी सुंदरता को और बढ़ा देती है। ताज-उल-मस्जिद भारत की सभी मस्जिदों में से सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती है। ये इतनी बड़ी है कि इसमें तकरीबन 175,000 घरों को बसाया जा सकता है। इस शानदार मस्जिद के निर्माण का कार्य 1844 और 1860 के बीच मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के शासनकाल के दौरान शुरू किया था। मस्जिद को बनाने का काम 1985 में जाकर खत्म हुआ था।

इस मस्जिद को नवाब साहब ने अपनी मरी हुई बेगम की याद के रूप में बनाया था जहां पर उनके अलावा किसी को जाने की इजाजत नहीं थी। इस मस्जिद के अंदर मुगल काल की एक खुफिया जेल भी हुआ करती थी, जो अब एक मकबरे में तब्दील हो गई है। आज ये मस्जिद दुनिया भर के लिए एक दर्शनीय स्थल बन चुका है और वहां पर किसी को भी जाने के लिए कोई रोक नहीं है।

गौहर महल

गौहर महल का निर्माण मुगल और हिन्दू तरीके से किया गया है। गौहर महल का नाम भोपाल पर शासन करने वाली सबसे पहली महिला कुदसिया बेगम के नाम पर रखा गया था। जो गौहर बेगम के नाम से भी मशहूर थीं। गौहर बहुत ही कला प्रेमी थीं। इस महल की स्थापना 1820 में की गई थी। उस वक्त यहां पर गौहर बेगम द्वारा बनाये गए कलात्मक चित्रों को सजाया जाता था। गौहर बेगम ने शासन के बाद अपनी बाकी की बची हुई जिंदगी इसी महल में गुजारी थी। यहां पर कई पुरानी और नई वस्तुओ का बाजार भी लगता है। साथ-साथ कई तरह के उत्सवों का आयोजन भी किया जाता है।

गोलघर

गोलघर भोपाल शहर में शाहजहांनाबाद इलाके में स्थित है। यह गोलाकार भवन पहले गुलशन-ए-आलम के नाम से भी जाना जाता था। इसका निर्माण नवाब शाहजहां बेगम द्वारा सन 1868 से 1901 के मध्य करवाया गया था। इस भवन में दो दर्जन दरवाजे हैं, इसके गोल भाग में सीढ़ियां हैं जो ऊपर की ओर जाती है, ऊपरी कक्ष में गुंबद है, स्तंभ बेलनाकार है,गुंबद की साज सज्जा हेतु विभिन्न रंगों का जैसे बेगनी पीला नारंगी लाल भूरा एवं हरे रंग का उपयोग किया गया है, बहुत ही खूबसूरत चित्रकारी भी है। ऊपरी ओर गोलाकार बरामदा जोकि टीन शीट से बना हुआ है, लकड़ी के खंभों पर साधा गया है। मूल रूप से इसमें पर्शियन शैली का एक बगीचा था जिसे जन्नत बाग नाम से जाना जाता था।

पूर्व में इसमें शाहजहां बेगम का कार्यालय था जिसे बाद में चिड़ियाघर के रूप में उपयोग किया गया, इसमें विभिन्न पक्षियों का संग्रह किया जाता था, कहा जाता है कि नवाब शाहजहां बेगम के काल में इस कक्ष में सोने चांदी के धागे रखे जाते थे जिन्हें बुनकर चिड़िया घोंसला बनाती थी। मनोरंजन के लिए नवाब कालीन बैंड द्वारा रोज शाम को संगीत बजाया जाता था। 16 नवंबर 1968 को भोपाल रियासत की सत्ता संभालते ही शाहजहां बेगम ने भोपाल का विकास कार्य किया, उन्होंने कई भवनों तथा मस्जिदों का निर्माण भी करवाया; जिनमें सिटी अस्पताल, ताज महल, नूर मस्जिद, बेनजीरमंजिल, नूरमहल, निशातमंजिल, नवाबमंजिल, आमीमंजिल ताजुल मस्जिद, जेलखाना और लाल कोठी शामिल हैं। बाद में गोलघर का उपयोग नवाब वंशजों ने अपने कार्यालय के रूप में किया गया।

कमल पार्क

भोपाल की ऐसी ऐतिहासिक जगह जिसका रहस्य शायद ही कोई जनता हो, मैं बात कर रहा हूं, रानी कमलापति महल की। जिसे आज हम सब कमल पार्क के नाम से जानते है। वो दरअसल पहले एक महल था। जिसको गोंड आदिवासी शासक निजाम शाह ने अपनी पत्नी रानी कमलापति के लिए बनवाया था। कहा जाता है कि कमलापति बहुत ही सुंदर थी। पूरे भारत में उनकी खूबसूरती छाई हुई थी। लोगों की मानें तो भोपाल पहले एक बहुत छोटा सा गांव हुआ करता था, जिसका शासक निजाम था। पर उसके कुछ दुश्मनों की नजर उसकी पत्नी पर थी वो उसको हासिल करना चाहते थे।

उन्होंने निजाम को जहर दे कर मार दिया और रानी पर हमला कर दिया तब रानी ने अपने पति के दोस्त मोहम्मद खान से मदद मांगी और बदले में भोपाल का शासन देने का वादा किया। मोहम्मद खान ने उन दुश्मनों को मार दिया । पर उसकी भी बुरी नजर कमलापति पर थी। तब रानी ने अपनी जान बचाने के लिए पास की झील में कूद कर अपनी जान दे दी। इस तरह भोपाल पर मोहम्मद खान का राज फैल गया। आज ये महल एक पार्क के नाम से जाना जाता है। जिसका नाम कमल पार्क रखा गया औ कई लोग दूर-दूर से यहां घूमने के लिए आते हैं।

भोपाल का ताज महल

भोपाल में भी एक ताज महल है। लेकिन इस ताजमहल में कोई मकबरा नहीं है। कोई प्रेम कहानी भी इस ताज महल से नहीं जुड़ी हुई है। भोपाल का ताजमहल भी मुगल वास्तु कला का अद्भुत नमूना है। भोपाल के इस खूबसूरत ताजमहल का निर्माण बादशाह शाहजहां ने नही बल्कि बेगम शाहजहां ने कराया था। वो 1861 से 1901 तक भोपाल रियासत की बेगम रही थीं। उन्होंने ताजमहल का निर्माण अपने खुद के निवास के लिए कराया था।

इस ताजमहल में 120 कमरों के अलावा आठ बड़े हॉल हैं। दावतें और बैठकें इन्हीं हॉल में हुआ करती थीं। इस ताजमहल के निर्माण में कुल तेरह साल लगे। साल 1871 में इसका निर्माण चालू हुआ था। 1884 में यह बनकर तैयार हुआ। शाहजहां बेगम ने इसे राजमहल नाम दिया था। इसकी खूबसूरती ने इसका नामकरण ताजमहल के तौर पर कर दिया। सत्रह एकड़ में बना यह ताजमहल बाहर से पांच मंजिल और अंदर दो मंजिल हैं। भवन के निर्माण पर उस दौर में कुल तीन लाख रुपए का खर्च आया था। महल बनने के बाद तीन साल तक बेगम ने जश्न मनाया। भोपाल का शाहजहांबाद इलाका, इन्हीं बेगम के नाम पर है।

मध्यप्रदेश के इस ताजमहल की कई खूबियां हैं। इसकी पहली खूबी इसका दरवाजा है। इसके दरवाजे का वजन एक टन से ज्यादा है। कई हाथियों की ताकत भी इस दरवाजे को तोड़ नहीं सकतीं थीं। दरवाजा इतना विशाल है कि 16 घोड़ों वाली बग्गी भी 360 डिग्री में घूम सकती थी। इस दरवाजे की नक्काशी में रंगीन कांच का प्रयोग किया गया था। इस कारण इसे शीशमहल भी कहा जाता है। ताजमहल की एक अन्य खूबी सावन-भादौ मंडप है। यह मंडप कश्मीर के शालीमार बाग की तरह है। यहां लगे कृत्रिम झरने के नीचे बैठकर बेगम शाहजहां सावन-भादौ के महीने में होने वाली बारिश का अनुभव करतीं थीं।

कांच पर पड़ने वाली सूरज की रोशनी से उत्पन्न होने वाली चमक लोगों की आंखों पर पड़ती थी। इस कारण महल के अंदर प्रवेश करने के लिए हर व्यक्ति को अपना सिर नीचा कर दरवाजा पार करना होता था। एक अंग्रेज अफसर को यह पसंद नहीं था कि वो महल में सिर नीचा कर प्रवेश करे। उसने बेगम को कांच हटाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि बेगम ने अंग्रेज अफसर का आदेश मानने से इंकार कर दिया। अंग्रेज अफसर ने आदेश न मानने पर बेगम को चेतावनी भी दी और कहा कि आदेश की अवहेलना होने पर खुद इसे उड़ा देंगे। बेगम ने अंग्रेज अफसर को मुख्य द्वार के कांच तोड़ने के लिए दस अवसर प्रदान किए। अंग्रेज अफसर ने कांच तोड़ने के लिए सौ से ज्यादा फायर किए लेकिन, कांच तोड़ नहीं पाए।


भोपाल के बारे में ये दिलकश जानकारियां हमें लिख भेजी हैं, अब्दुल आलम ने। अब्दुल झांसी में रहते हैं। अभी भोपाल घूमने आए हैं। बुंदेलखंडी संस्कृति पर बड़ा नाज है। नजरें बड़ी चौकस रखते हैं। इतिहास में खासी रुचि है। पुरानी इमारतों, लोगों के बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं। झांसी बुलाते रहते हैं सबको, झांसी की शानदार विरासत के बारे में खूब बताते हैं।


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