इस महिला को नहीं पहचानते तो भारत की एक अद्भुत कला से अपरिचित हैं आप

कहते हैं न कि कला किसी विशेष अवसर की मोहताज नहीं होती है। यदि आप में प्रतिभा है तो आपको सफलता जरूर मिलती है। मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ के ग्राम पिटोल निवासी भूरीबाई ऊपर लिखी बातों का जीता जागता उदाहरण है। जब हमें पता चला कि मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा पिटोल में एक भील जनजाति पर आधारित चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है तो हम भी पहुंच गए ग्राम पिटोल। वहां पर चित्रों के साथ भीली पोशाक पहने एक औरत खड़ी थी। विभाग के अधिकारियों ने जब उनसे परिचय कराया तो पता चला कि यह हैं भूरी बाई। इस कलाकार के जीवन को जानने के लिए उत्सुकता जागी मन में।

ये वाली फोटो खिंचाना, सबके भाग्य में नहीं होता.

भूरीबाई का कहना है कि उनके जीवन को समझना है तो कोई बात कहने की जरूरत नहीं है। बस आप चित्रों को देख लें। फिलहाल वह भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय में कनिष्ठ चित्रकार हैं। वो खुद भी भील जनजाति से हैं और भीली चित्रकारिता ने ही उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। वर्ष 2016 में वह अमेरिका में आयोजित एक प्रदर्शनी का हिस्सा भी बनीं। विभाग के प्रोग्राम सहायक विनोद गुर्जर ने बताया कि भूरी बाई और लाडोबाई दोनों ही पिटोल के पास ग्राम बावड़ी की रहने वाली हैं। भूरीबाई द्वारा बनाए गए चित्र विश्व की लगभग दस आर्ट गैलेरियों में लगे हुए हैं। इन चित्रों की प्रदर्शनी को लेकर भूरीबाई ने पूरे भारत का भ्रमण किया है।

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ऐसे हुई शुरुआत

भूरी बाई की बनाई एक कलाकृति

भूरीबाई का कहना है कि बचपन के साथ ही शादी के बाद का जीवन बहुत कठिनाईयों से भरा हुआ था। जब पति के साथ मजदूरी करने भोपाल गईं तब वहां पर भारत भवन का निर्माण चल रहा था। वहां पर काम करते हुए एक दिन पास स्थित मंदिर के चबूतरे पर वे मिट्टी से कुछ चित्र बना रही थीं। उनकी इस कला को जे स्वामीनाथन ने देखा। भूरीबाई कहती है कि जब स्वामीनाथन साहब ने उनसे कैनवास पर चित्र बनाने का कहा तो वह काफी डर गई थीं क्योंकि उन्होंने कभी भी ब्रश कलर देखे नहीं थे। वे कहती है कि हम तो गांव में शादी ब्याह और त्यौहारों पर मिट्टी, हल्दी, कुमकुम आदि से चित्र बनाते थे। धीरे-धीरे ब्रश और कलर को लेकर उनका डर दूर हुआ। उसके बाद से तो उनका जीवन ही बदल गया।

70 फीट की दीवार पर बनाई खुद की बायोग्राफी

एक कलाकृति में बनी रेलगाड़ी

विभाग के श्री गुर्जर कहते है कि लोग अपनी बायोग्राफी लिखते हैं। परंतु भूरीबाई ने तो 70 फीट लंबी दीवार पर अपने जीवन को उकेर दिया है। उन्होंने बताया कि भूरीबाई ने बचपन में देखी एक रेलगाड़ी और उससे लकड़ी बेचने गुजरात के दाहोद में जाने के नजारे को भी चित्र से दिखाया है। अमेरिका यात्रा से लेकर भील जनजाति के नृत्य, पर्यावरण प्रेम, भगोरिया पर्व, विवाह, गातला, पिथोरा प्रथा सहित अनेक रितीरिवाजों और संस्कृतियों को कैनवास पर उतारने का सफल प्रयास किया है।

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निरक्षर होने के बाद भी बोलती हैं शुद्ध हिंदी

जब हमने उनके पहनावे को देख कर भीली भाषा में बात की तो वह हमारे प्रश्नों के उत्तर शुद्ध हिंदी भाषा में दे रही थीं। उनकी भाषाई कौशलता को देखर जब हमने उनसे कहा कि आप कहां तक पढ़ी लिखी है तो उनका जवाब था कि उन्होंने स्कूल का कभी मुंह ही नहीं देखा। जब चित्रों को लेकर जनजातीय संग्राहलय के अधिकारियों से बातचीत होती थी तो उनके साथ रह कर हिंदी बोलना सीखा। आज वह गर्व महसूस करती है कि वह भीली भाषा के साथ साथ हिंदी भाषी है।

मप्र गौरव सम्मान सहित मिले है कई पुरस्कार

भूरीबाई का कहना है कि यदि उनके पास यह कला न होती तो वह इसी आदिवासी अंचल में सिर्फ मजदूरी कर रही होतीं। परंतु भीली जनजाति पर चित्रण की वजह से मुझे न केवल सरकारी नौकरी मिली अपितु कई बड़े सम्मान भी मिले। विभाग के श्री गुर्जर ने बताया कि उनकी इस कला के लिए उन्हें मप्र गौरव सम्मान, राष्ट्रीय तुलसी सम्मान, राष्ट्रीय देवी अहिल्या सम्मान, शिखर सम्मान सहित राज्य व देश के कई सम्मान मिले है।

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चलत मुसाफ़िर की सदा यही कोशिश रहती है कि अपने देश की लोक कलाओं के रूप में बिखरी पड़ी खूबसूरती सब तक पहुंच सके, इसी कड़ी में भील-कला की अनूठी झलक हमें लिख भेजी है धर्मेंद पांचाल ने। धर्मेंद्र पत्रकार हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ से हैं। आंचलिक विषयों पर काफी सक्रिय रहते हैं। आदिवासी जनजीवन से खासे प्रेरित हैं। लोक कलाओं में गहरी रुचि है। सामाजिक संरचनाओं के भीतरी तह तक पहुंचने की जुगत में रहते हैं हमेशा। 


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