बस्तर 12: बस्तर की खूबसूरती पर विकास का काला टीका लगना बहुत जरूरी है

(इस यात्रा का पिछला भाग यहां पढ़ें)

अब मैं बस्तर की शान चित्रकोट जलप्रपात के ठीक सामने खड़ी थी। चित्रकोट बस्तर जिले के जगदलपुर ब्लॉक में है। मैं तो झारखंड के जलप्रपातों को देखकर ही लहालहोट हो गई थी। लेकिन बस्तर के जलप्रपात इतने अद्भुत हैं कि उनको देखकर मैं निःशब्द हुई जा रही थी। प्रकृति यहां अपने विराट रूप में थी। चित्रकोट में इसी जगह पर बस्तर की सबसे प्रमुख नदी इंद्रावती चट्टानों से कटकर एक ढाल में तेजी से गिरती है। ये ढाल तकरीबन पंचानबे फीट की है। और ये प्रपात तीन सौ मीटर चौड़ा है। तीन सौ मीटर चौड़ा! विशाल और दैवीय।

सुना है, रात में तो गजब का सुंदर लगता है ये। लेकिन अफसोस रात तक वहां रुकने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। आपको बता दूं, इंद्रावती नदी ओडिशा के कालाहांडी इलाके से शुरू होकर, बस्तर से गुजरते हुए आंध्र प्रदेश में गोदावरी में जाकर मिल जाती है।  इस जगह को एक अच्छे पिकनिक स्पॉट के रूप में विकसित कर दिया गया है। एक जगह सेल्फी खिंचाने वालों के लिए दीवार पर ‘आई लव बस्तर’ का मार्क भी लगाया गया है।

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चित्रकोट के ग्लैमर से निकलकर हम लोहंडीगुड़ा ब्लॉक पहुंच गए। शाम हो चुकी थी इसलिए स्कूलों में शिक्षकों और बच्चों से तो नहीं मिल पाए। लेकिन उपचार केंद्रों पर मौजूद स्वास्थ्य कर्मियों से जरूर बातचीत हुई। चूंकि ये जगह एक बड़े पिकनिक स्पॉट और जिला मुख्यालय जगदलपुर से पास है इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत दूर दराज के गांवों जितनी खराब नहीं थी।

आगे बढ़े, मुण्डागांव में पहुंचे। वहां के उप स्वास्थ्य केंद्र पर शिशुओं का चेकअप करते हुए एक डॉक्टर ने दुखड़ा बताया कि आमतौर पर रूरल में काम करने वालों को एक्स्ट्रा अलाउंस मिलते हैं। लेकिन यहां इस व्यवस्था में काफी घालमेल है। जिससे यहां काम करने वालों का उत्साह टूट जाता है।

लोहंडीगुड़ा में हम वहां मौजूद लोगों से बात कर ही रहे थे। तभी हमारे एक स्थानीय सहयोगी ने बताया कि बस्तर के राजमहल में जाने का प्रबंध हो गया है। अब मैं बस्तर के मौजूदा राजा कमलदेव भंज से मिलने वाली थी। कहानियों में सुनती आई थी कि बस्तर के आदिवासी लोग केवल अपने राजा की ही सुनते हैं। वास्तविकता या वर्तमान की वास्तविकता का मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था।

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(यात्रा जारी है, इसके आगे का वृतांत यहां पढ़ें)


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