बस्तर 3: आदिवासी महिलाओं का ‘सशक्त’ होना एक मिथ्या अवधारणा है

(इस हेडिंग और लेख को और बेहतर समझने के लिए, इससे पहले का विवरण यहां पढ़ें)

इस बार गाड़ी कल के दिन से दूसरी दिशा में आगे बढ़ाई गई. ओरछा ब्लॉक ऑफिस से बाएं तरफ को कटती एक सड़क पर बढ़ चले. बारिश तेज थी इस बार. यहां भी वही हाल हुआ, एक दूरी पर जाकर सड़क खत्म. गाड़ी आगे नहीं जा सकती थी. उधर बाइक पर दो जने आ रहे थे, हमने आगे का रास्ता पूछने के लिए रोका. वो अंदर के एक गांव गुदाड़ी के प्राथिमिक शाला के शिक्षक थे.उन्होंने बताया, वो उस पहाड़ी तक यहां से 35-40 किलोमीटर के रास्ते पर कई गांव हैं. लेकिन दादा लोग सड़क ही नहीं बनने दे रहे. सड़क बन जाएगा तो अस्पताल-स्कूल गांव में पहुंचेगा. जब गांव वालों तक सुविधा पहुंच ही जाएगा तो वो लोग इनसे डरना बंद कर देगा. और लोगों के अंदर से ये डर वो लोग कभी खत्म नहीं होने देना चाहता.

उन्होंने हमको बताया कि पैदल ही आगे का सफर तय करना होगा. और जाना वहीं तक, जहां से सूरज ढलने से पहले वापस आ जाओ. आगे पहाड़ी की तरफ कई लोगों को पकड़कर ले गया है वो, ध्यान रखना आप. उन शिक्षक को शुक्रिया कहके मैं आगे बढ़ चली. लाल मिट्टी पानी के सानिध्य में बहुत ही फिसलन भरी हो गई थी. चप्पल उतारकर हाथ में लेना पड़ा, नंगे पैर चलना भी दुश्वार हो रहा था. गांव की खूबसूरती और अंदर गांव में पहुंचने की जल्दी ही इस रास्ते पर भी तेजी से कदम बढ़वा रही थी.

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पांच किलोमीटर चलने के बाद गुदाड़ी गांव पहुंचती हूं. सामने वो स्कूल दिखता है, जहां के शिक्षक हमें रास्ते में मिले थे. ये एक आवासीय स्कूल था. आज रविवार था, इसलिए स्कूल की छुट्टी थी. मिड डे मील नहीं बना था और बच्चे पूरे दिन से भूखे थे. इस गांव में लड़कियों के लिए एक भी स्कूल नहीं था. इस गांव से और इसके अंदर और भी गांव से लड़कियों के पास एक ही विकल्प था, पंद्रह किलोमीटर चलकर ओरछा ब्लॉक में बने स्कूल में जाएं. लेकिन लड़कियों को क्यों ही पढ़ाना, इसलिए ये यहां के स्थानीय लोगों के लिए समस्या की कोई बात नहीं है.

एक खुशफहमी का टूट जाना

पता चला कि इस गांव की मुखिया एक महिला हैं. तो चेहरे पर एक चमक आई. स्कूल के सामने ही उनका घर था. लेकिन उनसे मिलने के बाद पता चला कि वो केवल चुनाव जीतने के लिए एक शक्ल थीं, असली सरपंच तो उनके पति ही थे. मीटिंग्स में आने-जाने, योजनाएं बनाने तक का सारा वही करते हैं. मुझे घोर निराशा हुई, ये तो वही बाकी के गांवों की तरह यहां भी हाल था. काहे की जेंडर इक्वलिटी, काहे का सशक्तिकरण. यहां भी औरतों का काम चूल्हा चौका करना, और पेट्रीआर्की के इशारों पर नाचना.

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उनके घर से निकले तो एक खूबसूरत सा घर दिखा. घर की दीवार पर औरतों के बारे में बड़ी दमदार बात लिखी थी. फिर से उत्साह जगा की शायद यहां कुछ सकारात्मक मिले. उस वक्त घर में दो औरतें थीं. घर की बड़ी बहू और छोटी बहू. दोनों घरेलू कोरस में बझी थीं. मैंने उनसे नमस्ते पानी किया. और माहवारी, सेहत, शिक्षा पर कुछ सवाल किए. जिस तरह से वो हर बात पर लजा जा रही थीं, साफ दिख रहा था कि उनमें आत्मविश्वास की कितनी कमी थी.

बड़ी बहू की कोई संतान नहीं थी. छोटी बहू की एक बिटिया थी. मैंने पूछा, आप तो पढ़ नहीं सकीं, अपनी बच्ची को तो पढ़ाओगी न. वो आंचल से मुंह छुपाते हुए बोलीं, अब वो सब तो ‘ये’ (पति) सोचेंगे. बस इससे आगे कुछ और पूछने की इच्छा नहीं हुई मेरी. मैं उनकी घर की सजावट की तारीफ करते हुए वहां से निकल गई.

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वक्त काफी गुजर चुका था. बारिश बारहा वापस आए जा रही थी. आगे का गांव पांच किलोमीटर की दूरी से भी ज्यादा पर था. आगे बढ़ने का कोई मतलब नहीं था. इस क्षेत्र की, आदिवासी समाज के बराबरी वाले झूठे सच को साथ लिए मैं मुख्य सड़क पर आ गई. शहर में पहुंची. खाना खाकर सो गई. अब अगला पड़ाव बस्तर डिवीजन का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला बीजापुर होने वाला था. आराम कर लेना भी जरूरी था.

(आगे का विवरण पढ़ने का पता यहां है)


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